नवाज़ शरीफ के लिए छह बुनियादी सवाल

  • 12 मई 2013
इससे पहले पाकिस्तान में 2008 में चुनाव हुए थे जिसमें पीपीपी को जीत मिली थी

पाकिस्तान में ट्विटर इस्तेमाल करने वालों ने चुनाव का स्वागत किया है और इसे लोकतंत्र की दिशा में एक बढ़ा हुआ कदम बताया है. हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने कुछ जगहों पर 'धांधली' के आरोप लगाए हैं और इसकी निष्पक्षता को लेकर सवाल भी उठाए हैं.

ट्विटर इस्तेमाल करने वाले कई लोगों का मानना है कि ये चुनाव तालिबान के लिए झटका है. पाकिस्तान में ट्विटर पर चल रहे ट्रेंडस में रिगिंग यानी धाँधली काफी ऊपर था.

पाकिस्तान में मौजूद बीबीसी संवाददाता ओरला गुएरिन के मुताबिक दक्षिणी पाकिस्तान से धांधली की खबरें आई हैं लेकिन उनकी पुष्टि नहीं की जा सकी है.

तहरीक-ए-पाकिस्तान के नेता इमरान खान ने भी चुनावों में धांधली का आरोप लगाया है.

ऐतिहासिक धांधली?

चुनाव में कथित धांधली को लेकर ट्विटर पर कई लोगों ने नाराजगी जाहिर की है. खासतौर से लाहौर और कराची से आई कथित धांधली की खबरों पर.

पाकिस्तान के कुछ बड़े पत्रकारों और तहरीक-ए-पाकिस्तान के समर्थकों ने इस मसले को खूब उछाला. कुछ लोगों का आरोप है कि मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट के लोगों ने कराची और नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन ने पंजाब में चुनावों में धांधली की.

टीवी एंकर सलीम साफी ने ट्वीट किया, “मेरे ज्यादातर सहयोगी पंजाब में चुनाव धांधली के मसले पर एक राय रखते हैं. लेकिन वो इसे नवाज शरीफ से डरने की वजह से खुल कर जाहिर नहीं करते.”

तालिबान की धमकियों के बाद महिलाएं वोट देने के लिए बाहर निकलीं

लेखक और टीवी एंकर शाहिद मसूद ने ट्विटर पर लिखा, “पाकिस्तान के इतिहास में विवादास्पद/अयोग्य चुनाव आयोग की देखरेख में 2013 के चुनावों में सबसे ज्यादा धांधली हुई है.”

एमक्यूएम की आलोचना करते हुए स्तंभकार अहमद कुरैशी ने ट्वीट किया कि एमक्यूएम के लोगों को सामूहिक रूप से इस्तीफे देना चाहिए और उन्हें अगले पांच सालों तक लोकतंत्र का नाम भी नहीं लेना चाहिए.

बलूचिस्तान की सीनेटर सना बलोच कहती हैं, “सबसे खराब प्रबंधन था. सिपाहियों को बलूचिस्तान के खरान में प्रिसाइंडिंग ऑफिसर के तौर पर तैनात किया गया था. बलूचिस्तान में ऐतिहासिक धांधली हुई.”

तालिबान को झटका

तालिबान और दूसरे चरमपंथी संगठनों की ओर से हिंसा की धमकी मिलने के बाद भी ट्विटर का इस्तेमाल करने वालों ने चुनाव का समर्थन किया है.

पत्रकार उमर कुरैशी का मानना है, “ इतने बड़े पैमाने पर लोगों का वोट देने के लिए बाहर निकलना तालिबान के लिए झटका है. ये वैसे ही प्रतिक्रिया है जैसी मलाला गोलीकांड के बाद सामने आई है”

दुनिया न्यूज के समूह संपादक मोहम्मद मलिक इससे सहमत नजर आते हैं. वो कहते हैं, “लंबी लंबी कतारों ने तालिबान और उनके सहयोगियों को हरा दिया है. डर को परास्त करते हुए लोग झुंड के झुंड बाहर निकले. पाकिस्तानी होने पर गर्व है.”

तालिबान समर्थक हैं इमरान?

कुछ लोगों ने ट्टिवर पर खैबर पख्तूनवा प्रांत में इमरान की जीत पर चिंता जाहिर की है. इन लोगों का मानना है कि तालिबान का विरोध करने वाली सरकार को हटाकर वहां पर ऐसी सरकार आ रही है जो तालिबान को लेकर ज्यादा लचीली है. अभी तक इस प्रांत में एएनपी(आवामी नेशनल पार्टी) का शासन था.

पीएम पद के दावेदार माने जा रहे इमरान खान की पार्टी दसरे नंबर तक पहुंची

तालिबान के हमलों में अब तक इस पार्टी के 700 नेता अपनी जान गंवा चुके हैं.

पाकिस्तानी मूल के कनाडाई कॉमेडियन तारेक फतह ने इसे आईएसाई की जीत कहा है. वो ट्विटर पर लिखते हैं, "चुनाव का मकसद एएनपी को खैबर प्रांत से बाहर करना और तालिबान को समर्थन करने वाली सरकार को सत्ता देना है."

लेखक और तलिबान का विरोध करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता मारवी सिरमद कहती हैं, “आवामी नेशनल पार्टी के गुलाम अहमद बिलौर ने तालिबान के खिलाफ कड़े रुख का परिचय दिया. उनकी हर पर हमें गहरा दुख हुआ है.”

इतना ही नहीं असद मुनीर जैसे लोग जो ट्विटर का इस्तेमाल करते हैं, कहते हैं, “चलो अब खैबर प्रांत पर तालिबान को राज करने दो क्योंकि वहां तो लोगों ने उन्हें वो देकर जिताया है.”