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पाकिस्तान के गुजरात में चुनाव का रंग

 बुधवार, 8 मई, 2013 को 19:17 IST तक के समाचार
पाकिस्तान गुजरात

पाकिस्तान का गुजरात चुनाव को जा रहे किसी भारतीय इलाक़े से अलग नहीं लगता.

लाहौर से निकलते ही ये अंदाज़ा हो गया कि ग्रांड ट्रंक रोड की 110 किलोमीटर पट्टी को पाकिस्तान का वाणिज्यिक दिल यूं ही नहीं कहते.

शादरा से गुजरात तक छोटे-बड़े क़ारख़ानों की एक न ख़त्म होने वाली क़तार है - जो रावी से चेनाब नदी तक चलती चली जा रही है.

ये वो चेनाब है जिसके बारे में कहा जाता है कि सोहनी महिवाल से मिलने कच्चे घड़े पर ये दरिया पार किया करती थी, आज पानी इतना कम है कि अगर वो आए तो सिर पर घड़ा रखकर नदी को पार कर जाएगी.

गुजरात पाकिस्तान के हर घर में मौजूद है - पंखो की शक्ल में, मिट्टी के बने बर्तनों के ज़रिए. यहां जूते और मोटरसाइकिल तक की फैक्ट्रियां हैं. लेकिन ये सब उस दौर से पहले की हैं जब बिजली 18-18 घंटे नहीं कटती थी.

पचास फ़ीसद क्षमता

इसकी वजह से एक लाख कामगारों को बेरोज़गार कर दिया है तो ढ़ाई हज़ार फैक्ट्री मालिक बुरी आर्थिक स्थिति से जुझ रहे हैं.

व्यवसायी मिर्जा मोहम्मद इम्तियाज़ कहते हैं कि फैक्ट्रियां अपनी पचास फ़ीसद क्षमता पर ही काम कर रही हैं.

जब मैंने पूछा कि किस दल को जिताने पर हालात बेहतर हो सकते हैं तो वो कहते हैं कि 'साल 2020 तक तो मैं यही हालात देखता हूं.'

पाकिस्तान पंजाब का ये ज़िला दूसरे इलाक़ो की बनिस्बत आपको ज्यादा एडवांस और खुशहाल दिखता है. हर तरफ चुनाव का माहौल है, प्रजातंत्र मज़बूत हो रहा है, लेकिन ज़रा सा खुरच कर देखो तो बात दूसरी जगहों से अलग नहीं दिखती.

रिश्ते-नाते से लेकर सब फैसले जाट, गुज्जर, राजपूत, आराईं और कश्मीरी के आधार पर होते हैं.

वकील मसूद अख़्तर पिछले चुनाव का ज़िक्र कुछ यूं करते हैं.

"मुझे अच्छी तरह याद है कि पिछले चुनाव में एक उम्मीदवार को एक इलाक़े में पॉलिंग एजेंट तक नहीं मिल पाए क्योंकि वहां उनकी बिरादरी को कोई शख़्स नहीं रहता था."

विदेशी धन का असर

तीन तहसील वाले इस ज़िले के 1300 गांवो में शायद ही कोई ऐसा ग्राम हो जहां पाउंड और यूरो का असर देखने को न मिले. इन जगहों से बहुत सारे लोग विदेशों में गए, और वहां से आए धन ने इलाक़े की फ़िज़ा में भारी बदलाव लाया है.

लेखक शेख अब्दुर रशीद कहते हैं, "जैसे ही वो बाहर से वापस लौटे तो उन्होंने हथियार ख़रीदे, बड़े घर बनाए, पुरानी दुश्मनियां ताज़ा हुईं. उनके पास दौलत थी, वो कोर्ट-कचहरी में पैसे ख़र्च कर सकते थे. शायद अगर पैसे न होते तो सुलह की गुंजाइश होती."

लेकिन क्या माली ख़ुशहाली का सोचों पर कोई असर तो हुआ होगा?

वकील वकील मसूद अख़्तर कहते हैं कि पैसे ने तो चुनावों को और अधिक ख़र्चीला बना दिया है. उम्मीदवारों की भरमार हो गई है.

वो आगे कहते हैं कि सिर्फ शिक्षा ही सब कुछ नहीं बदल सकती उसके लिए समाज के दूसरे पहलूओं में भी बदलाव की ज़रूरत है जो नहीं हो पा रहा है.

लेकिन गुजरात ने इतने लेखक, और दूसरे रहनुमा पैदा किए हैं क्या इन मुद्दों पर उन्हें नहीं लिखना चाहिए, बात करनी चाहिए? शेख अब्दुर रशीद कहते हैं हंसते हुए कहते हैं कि जो बुद्धिजीवी थे वो तो बाहर जाकर बस गए, लेकिन जो बुरे थे, वो कहां जाते, उन्होंने अपनी बुरी बातें दूसरों में भी फैलाईं.

पहले के चुनावों की तरह इस बार भी कुछ लोग जीतेंगे और हार जाएंगे, लेकिन जिनका दिमाग़ छोटे से बड़ा हो, वो कब जीतेंगे?

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