हाथ में गिटार और होंठों पर शांतिमंत्र

  • 7 मई 2013
आनी छोयिंग डोलमा

दमकते गोल चेहरे और घुटे हुए सिर वाली एक बौद्ध भिक्षुणी मेरे सामने खड़ी थीं. पर उनके हाथ में जाप करने के काम आने वाली माला नहीं बल्कि एक गिटार था.

ऐसा दृश्य मैंने पहले कभी नहीं देखा था. भिक्षु-भिक्षुणियों, पुजारियों और संन्यासियों के हाथ में आम तौर पर जपमालाएँ तो होती हैं, पर गिटार?

ये बौद्ध भिक्षुणी कोई आम-अनाम तिब्बती महिला नहीं बल्कि आनी छोयिंग डोलमा हैं, जिन्हें दुनिया भर में उनके अदभुत मंत्र-संगीत के लिए जाना जाता है.

बौद्ध भिक्षुणी बनना उनके लिए आध्यात्मिक सत्य की खोज का साधन नहीं बल्कि भीषण ग़रीबी और पिता की क्रूरता से बचने का आसान तरीका था.

तिब्बत के एक शरणार्थी परिवार में जन्मी छोयिंग डोलमा काठमांडू के बौद्धनाथ इलाक़े में पली बढ़ीं और वहीं एक कमरे के घर में अपने माता-पिता और दो भाइयों के साथ रहती थीं.

वो कहती हैं कि पिता की मार और अभाव की ज़िंदगी ने उन्हें बचपन में ही एक हद तक ढीठ बना दिया था. पिता के हाथों बार बार खुद पिटते और अपनी माँ को पिटता देख उन्होंने लगभग बचपन में ही शादी न करने का फ़ैसला कर दिया.

सुनिए: तिब्बती मंत्रोच्चार

अपने बचपन की कहानी उन्होंने अपनी आत्मकथा 'सिंगिंग फॉर फ्रीडम' में बहुत विस्तार से लिखी है. उन्होंने लिखा है कि मूर्तियाँ बनाकर परिवार की गाड़ी चलाने वाले उनके पिता उनसे और उनकी माँ से इतनी क्रूरता से पेश आते थे कि छोयिंग को विवाह के नाम से ही चिढ़ हो गई.

उन्होंने कहा, "सभी को सुख चाहिए. जब मुझे महसूस हुआ कि इस जीवन में अगर सुख चाहिए तो किसी को शादी नहीं करनी चाहिए." जब उन्होंने अपनी माँ से ये बात कही तो माँ ने सुझाव उन्हें संन्यासिन बनने का सुझाव दिया.

संन्यास का रास्ता अपना कर आनी छोयिंग डोलमा ने दरअसल अपने पिता की सत्ता के खिलाफ़ विद्रोह किया था.

आध्यात्मिक आवाज़

आनी छोयिंग डोलमा
नेपाल के प्रतिभाशाली संगीतकार न्ह्यू बज्राचारी ने छोयिंग डोलमा के लिए धुनें तैयार की हैं.

इसी विद्रोही संन्यासिन से मिलने काठमांडू के भीड़-भाड़ भरे एक बाज़ार में छोटी-छोटी दुकानों के बीच सँकरी-सी सीढ़ियाँ चढ़कर मैं ऊपर बने एक साधारण से रिकॉर्डिंग स्टू़डियो तक पहुँचता हूँ.

आनी छोयिंग डोलमा मुझे बताती हैं कि वो गणेश स्तुति की रिकॉर्डिंग करवाने आई हैं.

वो अपनी गहरी आध्यात्मिक आवाज़ में गाए गए तिब्बती मंत्रों से श्रोताओं को ध्यानमग्न करने की ताकत रखती हैं और पिछले दस बरस से वो दुनिया के कई देशों में कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुकी हैं. तिब्बती, संस्कृत और नेपाली में गाए उनके गीतों के एल्बम हर जगह उपलब्ध हैं.

उनकी आवाज़ के कंपन में तिब्बती पठारों और हिमालय के पहाड़ों में जन्मी संगीत-परंपरा की निर्मल छाया महसूस की जा सकती है.

सुनिए एक और पेशकश

लेकिन छोयिंग के लिए उनकी यात्रा आसान नहीं रही. बौद्ध संन्यासिन होने के कारण उनसे एक ख़ास तरह के व्यवहार की अपेक्षा की जाती थी. लेकिन वो गाना गाती थीं और बाहर जाकर फ़िल्में देखना पसंद करती थीं तो उनकी कड़ी आलोचना भी की जाती थी.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "शुरुआत में सबके विचार (मेरे प्रति) ठीक नहीं थे. मैं कई बार हतोत्साहित महसूस करती थी और मेरे बारे में जो बातें कही जाती थीं वो दिल को चुभती थीं."

अपनी पीड़ा को बयान करने के लिए वो हिंदी फ़िल्म अमर प्रेम का एक पुराना गाना याद करती हैं और उसे गाती हैं – कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना....

उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, “मैं हिंदी फ़िल्मों को बेहद पसंद करती हूँ, ख़ास तौर पर इस गाने को. क्योंकि मेरे लिए चीजें बहुत आसान नहीं रहीं. एक संन्यासिन होने के कारण बहुत सारे लोगों ने इसलिए मेरी आलोचना की क्योंकि मैंने बहुत सी परंपरागत चीजों को तोड़ा है. इसलिए मुझे ये गाना बहुत पसंद है.”

सुनिए: पूरा इंटरव्यू

वो कहती हैं कि अमिताभ बच्चन उनके सबसे पसंदीदा अभिनेता हैं. छोयिंग ने कहा, "मैं आजतक उनसे मिली नहीं हूँ, लेकिन मुझे विश्वास है कि किसी पवित्र अवसर पर मैं उनसे ज़रूर मिलूँगी."

दरअसल छोयिंग डोलमा के हुनर को अंतरराष्ट्रीय मंच पर लाने का श्रेय अमरीकी गिटारवादक स्टीव टिबैट्स को जाता है. उन्होंने 1994 में छोयिंग के साथ एक साझा एल्बम रिलीज़ की थी.

उसके बाद से छोयिंग ने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

अमरीका के कई शहरों से लेकर चीन, हांगकांग और यूरोप तक छोयिंग ने कई बार कॉन्सर्ट्स दिए और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया.

लेकिन छोयिंग एक बौद्ध संन्यासिन के लिबास में रहते हुए भी उन तमाम वर्जनाओं को तोड़ देना चाहती हैं जो उनके आसपास खड़ी कर दी गई हैं.

मसलन उन्हें ये कहने में कोई एतराज़ नहीं कि वो बहुत खुशी से फ़िल्म देखने जाती हैं और यहाँ तक कि काठमांडू में पिछले दिनों एक कार्यक्रम में बुलाए जाने पर उन्होंने फ़ुटबॉल भी खेली.

नई पीढ़ी

बचपन और किशोरावस्था के अपने संघर्ष और परेशानियों को देखते हुए डोल्मा ने गायिका के तौर पर अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान का इस्तेमाल उन बच्चियों की बेहतरी के लिए करने का संकल्प लिया जो ग़रीबी और भेदभाव के कारण आगे नहीं बढ़ पातीं.

उन्होंने काठमांडू के पास आर्यतारा नाम का एक स्कूल खोला जिसमें अब लगभग 70 बच्चियाँ पढ़ाई करती हैं.

डोल्मा कहती हैं, "मैं सोचती थी कि काश हमें भी औपचारिक शिक्षा की सुविधा मिली होती, हम भी पढ़े होते. तो जब मुझे पता चला कि मैं गा सकती हूँ तब मैंने इसका इस्तेमाल स्कूल खोलने में किया."

आर्यतारा में नेपाल ही नहीं बल्कि भारत में सिक्किम और दार्जीलिंग से भी बच्चियाँ आती हैं.

आनी छोयिंग डोल्मा जब विदेश के दौरों से लौटती हैं तो इसी स्कूल में अपने बच्चों के बीच आकर बेहद खुशी महसूस करती हैं.

वो अपने बचपन को शायद फिर से जी रही होती हैं. पर अब उसमें दुख, भय और यातना की बजाए आध्यात्मिक शांति और आह्लाद होता है.