अलग-अलग मारो!

  • 30 अप्रैल 2013
चुनावी हिंसा
चुनावी हिंसा में अब तक सैंकड़ों लोग मारे जा चुके हैं.

नौबत शायद यहां तक आ पहुंची है कि जिन सियासी पार्टियां और उम्मीदवारों के किसी चुनावी दफ़्तर को अब तक निशाना नहीं बनाया गया है उनमें से कुछ-कुछ शुक्र अदा करने के बजाए वोटरों से रूठे-रूठे से लग रहे हैं.

पाकिस्तान के जो तीन प्रांत इस समय चुनावी हिंसा के शिकार हैं उनमें सबसे ज़्यादा हिंसा बलूचिस्तान में हो रही हैं जहां वामपंथी या दक्षिणपंथी, धार्मिक या अधार्मिक, किसी भी तरह के भेद भाव के बिना सभी पर हमले किए जा रहे हैं.

सिंध में केवल मुत्तहिदा क़ौमी मूवमेंट(एमक्यूएम) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी(पीपीपी) को ही निशाना बनाया जा रहा है.

अवामी नेश्नल पार्टी(एएनपी) अकेली ऐसी पार्टी है जिसे पंजाब को छोड़कर हर जगह निशाना बनाया जा रहा है.

इन सबके बीच जहां तक केंद्र या राज्य में अंतरिम सरकारों का ताल्लुक़ है उनकी नीति तो यही लगती है कि, ''भई जो करना है आपस में करो, हमारा नशा मत ख़राब करो.''

हद ये है कि पूर्व गृह मंत्री रहमान मलिक बड़ी शिद्दत से याद आ रहें हैं.

वो भले ही गुड़ नहीं देते थे लेकिन गुड़ जैसी बातें तो करते थे. मौजूदा गृह मंत्री का तो पूरा नाम भी ढाई-तीन पत्रकारों से ज़्यादा किसी को याद नहीं.

दूसरी तरफ़ ये लग रहा है कि चुनावों में शामिल आधी पार्टियों को ये संदेश दिया जा रहा है कि क़दम बढ़ाओ, हम तुम्हारे साथ हैं.

बाक़ी आधी पार्टियों को कहा जा रहा है कि अगर तुमने पश्चिम से प्रभावित लोकतंत्र और शरियत के ख़िलाफ़ अपनी नीति जारी रखी तो फिर तुम हममें से नहीं.

पहले राजनीतिक पार्टियों का चुनाव कथित तौर पर ख़ुफ़िया एजेंसियां करतीं थीं, अब ये काम नॉन-स्टेट एक्टर यानी कि चरमपंथी संगठन के हाथों में आ गया है यानी कि दबाव बरक़रार है सिर्फ़ दबाव डालने वाले बदल गए हैं.

सवाल तो ये भी उठ रहें हैं कि मुस्लिम लीग(नून) और (क़ाफ़), तहरीक-ए-इंसाफ़, जमात-ए-इस्लामी और जमीयत उलमा-ए-इस्लाम के पास ऐसा क्या है जो पीपीपी, एमक्यूएम या एएनपी के पास नहीं है.

लोग ये भी कह रहें हैं कि इस बार अगर पाकिस्तान में चुनाव प्रचार का रौनक़ देखना हो तो पंजाब जाकर देंखें.

धमाकेदार रणनीति

चुनावी हिंसा
एमक्यूएम, पीपीपी और एएनपी ख़ासतौर पर निशाना बनाए जा रहे हैं.

मगर जिन्होंने भी ये धमाकेदार रणनीति बनाई है वो इतने बेवक़ूफ़ नहीं. भला वो क्यों चाहेंगे कि हर जगह लाशें फैलाकर अलग-अलग विचारधारा रखने वाली पार्टियों को एक प्लेटफॉर्म पर जमा होने का मौक़ा मिल जाए जैसा कि इस्लामाबाद में ताहिरूल क़ादिरी के धरने के समय हुआ था.

राजनीतिक पार्टियों की शक्तियों को अलग-अलग रखने की एक ही सूरत है कि हर एक को अलग-अलग लाठी से हांका जाए. बाक़ी काम ये राजनेता खु़द ही कर लेंगे.

ध्यान से देखा जाए तो चरमपंथियों की ये रणनीति बहुत हद तक सफल भी है कि एक-एक को अलग-अलग करके मारो ताकि सब मिलकर तुम्हें न मारें.

तो क्या पाकिस्तानी सरकार को बिल्कुल भी ये अंदाज़ा नहीं था कि चुनावों के दौरान चरमपंथियों की रणनीति क्या होगी?

अब जब कि चुनाव में कुछ ही दिन बाक़ी रह गए हैं अभी तक ये तय नहीं हो सका है कि मतदान केंद्रों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी किसी एक सुरक्षा एजेंसी को दी जाए या सब मिलकर काम करेंगे.

अगर सरकारी संस्थाओं और अधिकारियों का ये हाल है तो दो-तिहाई बहुमत से जीत कर आने वाली पार्टी भी इन संस्थाओं और अधिकारियों के रहते नया क्या कर लेगी?

हालात को क़ाबू में लाने की ख़ातिर कुछ नई सोच के साथ और बुनियादी सच्चाईयों को सामने रखकर फ़ैसला करना होगा लेकिन यहां तो अक्सर नेताओं ने अपनी ही पार्टी का घोषणा पत्र पूरी तरह से नहीं पढ़ा है तो फिर उन्हें क्या पता चलेगा कि आगे क्या होने वाला है.