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'टैक्सचोरी,जमाखोरी, कालाबाज़ारी करते थे शेक्सपियर'

 मंगलवार, 2 अप्रैल, 2013 को 10:42 IST तक के समाचार

विलियम शेक्सपियर पर अनाजों की जमाखोरी और कालाबाज़ारी का मामला दर्ज हुआ था

विलियम शेक्सपियर दुनिया के सबसे प्रसिद्ध रचनाकारों में गिने जाते हैं. उनके लिखे उपन्यासों पर आधारित नाटक आज भी दुनिया भर में मंचित होते हैं, दुनिया भर की भाषाओं में उनके उपन्यास और नाटकों का अनुवाद हो चुका है.

क्लिक करें शेक्सपियर के लेखन में भूख, अभाव और गरीबी का बडा़ मार्मिक विवरण मिलता है.

पर सवाल है कि ऐसे विवरण के पीछे कोई ख़ास वजह तो नहीं थी? एक नया अध्ययन इस मुद्दे पर रोशनी डालने वाला है.

इस गहन अध्ययन के मुताबिक शेक्सपियर गै़र कानूनी ढंग से अनाज जमा करते थे और अनाजों की जमाखोरी के अलावा उनपर टैक्स चोरी के आरोप भी लगते रहे थे.

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जेल जाने की कगार पर

अबरेस्टवेथ यूनिवर्सिटी के इस अध्ययन के मुताबिक टैक्स चोरी के चलते शेक्सपियर जेल जाने की कगार तक पहुंच गए थे.

"शेक्सपीयर के जीवन की इस घटना को हम भूल चुके हैं. हालांकि उन्होंने इस दौरान जो खुद महसूस किया उसे अपनी रचनाओं में उतारा."

प्रो. जायन आर्चर, अबरेस्टवेथ यूनिवर्सिटी

ज़ाहिर है इन अनुभवों का इस्तेमाल शेक्सपियर अपने साहित्य लेखन में भी बखूबी करते रहे.

उनका एक उपन्यास है 'कोरिओलेनस'. इसमें अकाल के दौरान बड़े कारोबारियों और राजनेताओं की मिली भगत से आम जनता के शोषण का विवरण है. यह उपन्यास 1607 के आसपास लिखा गया था, जब ब्रिटेन में भीषण अकाल पड़ा था.

अबरेस्टवेथ यूनिवर्सिटी के मध्यकालीन और पुनर्जागरण साहित्य के लेक्चरर प्रो. जायन आर्चर इस शोध अध्ययन की प्रमुख हैं.

उन्होंने कहा है कि 16वीं शताब्दी के दौरान शेक्सपियर भी अनाज की जमाखोरी करने लगे थे और उनके व्यक्तित्व के इस पहलू को लोग भूल चुके हैं.

15 साल तक कालाबाज़ारी

इस अध्ययन में दावा किया गया है कि 15 साल की लंबी अवधि तक शेक्सपियर ना केवल अनाजों की जमाखोरी करते रहे बल्कि पड़ोसियों के बीच उसकी कालाबाज़ारी भी करते थे.

डॉ. आर्चर ये भी कहती हैं कि शेक्सपियर का इस पहलू के आधार पर आकलन नहीं होना चाहिए क्योंकि हो सकता है उन्होंने अकाल में अपने परिवार को भूख से बचाने के उद्देश्य से ऐसा किया हो.

आर्चर कहती हैं, “हमें ध्यान रखना होगा कि भूख ने शेक्सपियर को कहीं ज़्यादा मानवीय, कहीं ज़्यादा समझदार के साथ साथ कहीं ज़्यादा जटिल शख्स बनाया.”

"हमें ध्यान रखना होगा कि भूख ने शेक्सपीयर को कहीं ज्यादा मानवीय, कहीं ज्यादा समझदार के साथ साथ कहीं ज्यादा जटिल शख्स बनाया."

प्रो. जायन आर्चर, अबरेस्टवेथ यूनिवर्सिटी

इस अध्ययन में अबरेस्टवेथ यूनिवर्सिटी के अंग्रेजी और रचनात्मक लेखन विभाग के प्रोफेसर रिचर्ड मार्गग्राफ टर्ली और इंस्टीच्यूट फॉर बायोलॉजिकल एंड इनवायरनमेंट स्टडीज़ के प्रोफेसर हॉवर्ड थामस भी सहयोग कर रहे थे.

डॉ. आर्चर ने बीबीसी रेडियो वेल्स से कहा, “हमारी दिलचस्पी साहित्य में खाद्य सुरक्षा और अनाज आपूर्ति की भूमिका को समझने में थी. रिचर्ड और प्रोफेसर थामस ने ये नोटिस किया कि शेक्सपियर के उपन्यास 'किंग लियर' में राजनीति के दांवपेंच में अनाज आपूर्ति की अहम भूमिका थी.”

काम आया अनुभव

आर्चर आगे कहती हैं, “शेक्सपियर ने अपनी रचनाओं में ये बखूबी दर्शाया है कि किस तरह अनाज का उत्पादन होता है, किस तरह कभी कभी अनाज का उत्पादन कम होता है और उससे आम लोगों को क्या क्या मुश्किलें होती हैं.”

इन शोधकर्ताओं के मुताबिक शेक्सपियर के दौर में अनाज आपूर्ति सरकार के ज़िम्मे थी और इसकी व्यवस्था सबसे बडा राजनीतिक मुद्दा बना करता था.

अध्ययन के मुताबिक 1598 में उनपर अकाल के दौरान अनाज की जमाखोरी के लिए मामला दर्ज किया गया था.

इस मसले पर आर्चर कहती हैं, “शेक्सपियर के जीवन की इस घटना को हम भूल चुके हैं. हालांकि उन्होंने इस दौरान जो खुद महसूस किया उसे अपनी रचनाओं में उतारा.”

शेक्सपियर के जीवन पर नई रोशनी डालने वाली इस अध्ययन को मई में आयोजित 'हे फेस्टिवल' में सार्वजनिक किया जाएगा.

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