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धमाकों से गूंजता माली है या मंगल ग्रह

 रविवार, 31 मार्च, 2013 को 16:35 IST तक के समाचार

फ़्रांसीसी सेना की अगुवाई में माली के उत्तरी शहर को इस्लामी चरमपंथियों से मुक्त करा लिया गया है, लेकिन इस रेगिस्तानी इलाके में दोनों पक्षों में घमासान लड़ाई जारी है.

ऐसा लग रहा है कि ये लड़ाई किसी दूसरे ग्रह पर चल रही हो. रात के घने अंधेरे में हेलिकॉफ्टर अपनी रोशनी बंदकर इलाकों के चक्कर काट रहे हैं.

जब हम माली पहुंचे तो हमारे जूतों के नीचे पथरीली चट्टानों का अभास हुआ, लेकिन कहीं कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. मुझे ऐसा लग रहा था कि मानो दुनिया के दूसरे हिस्सों से हमारा संपर्क टूट गया हो.

सुबह में मुझे पता चला कि मैं किसी पथरीले रेगिस्तानी इलाके में हूं जहां चारों तरफ़ पहाड़ और रेत के टीले नजर आ रहे थे.

जैसे-जैसे दिन बढ़ने लगा, सैनिकों का आना शुरू हो गया. बैगी यूनिफॉर्म में एक के बाद एक सैनिक युद्ध के इस जंगल में अपनी ड्यूटी निभाने के लिए पहुंच रहे थे.

'मंगल ग्रह जैसे हालात'

इन सैनिकों में फ़्रांसीसी सेना की ख़ास यूनिट फ़्रेंच फॉरन लीजन के जवान शामिल हैं. इस यूनिट में दुनिया भर के अलग अलग देशों के जवानों को शामिल किया जाता है.

परंपरागत तौर पर इसमें जवानों को शामिल करने से पहले उनकी पृष्ठभूमि और आपराधिक रिकॉर्ड को देखा जाता था.

लेकिन हाल के दिनों में इस यूनिट में पूर्वी यूरोप और दक्षिण अमरीकी नागरिक धड़ल्ले शामिल हो रहे हैं, क्योंकि उन्हें अपने देश की तुलना में यहां ज़्यादा पैसे मिलते हैं.

इस यूनिट में शामिल एक रोमानियाई सैनिक ने कहा, “आप समझ लीजिए हम पृथ्वी छोड़ चुके हैं और अब मंगल ग्रह पर आ गए हैं.”

हम ये बातें करते हुए पहाड़ की चढ़ाई कर रहे थे, जो काफी फिसलन भरी थी.

"आप समझ लीजिए हम पृथ्वी छोड़ चुके हैं और अब मंगल ग्रह पर आ गए हैं."

फ्रांसीसी सेना में शामिल एक रोमानियाई सैनिक

हम सोच रहे थे कि ऊपर पहुंच कर हमें इलाके की घाटी के बारे में पूरी जानकारी मिल जाएगी.

उस वक्त हम बुलेटफ्रुफ जैकेट, हेलमेट पहने हुए थे, साथ में सामान से भरा थैला पीठ पर लदा हुआ था. टीवी और रेडियो उपकरण हमारे साथ थे. पर्याप्त खाना और छह लीटर पानी भी सामान में मौजूद था.

हम सभी अपने वजन से करीब 30 किलोग्राम ज़्यादा वजन ढो रहे थे.

जबकि सैनिकों के पास अपने हथियार और गोला बारूद भी थे. प्रत्येक सैनिक करीब 60 किलोग्राम वजन ढो रहे थे.

सुबह के नौ बजे, हम तीन घंटे चल चुके थे और तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका था.

गर्म हवा के थपेडे़ महसूस हो रहे थे, तब एक ऑस्ट्रेलियाई सैनिक ने मुझसे कहा, “हवा का झोंका ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने ब्लोअर को आपके चेहरे सामने रख कर ऑन कर दिया हो.”

'ये गुरिल्ला युद्ध है'

ये सैनिक इस पथरीले रेगिस्तान में चरमपंथियों के ठिकाने तलाश रहे हैं. इन लोगों ने अबतक चरमपंथियों के कई ठिकानों को तबाह किया है.

इस इलाके में कुछ दुर्लभ कुंए भी दिखाई देते हैं जहां चरमपंथियों ने साग सब्जियों के बगीचे भी लगाए हुए हैं.

इन बगीचों में मिलने वाले ताजे टमाटर और प्याज सैनिकों के बड़े काम आ रहे हैं.

एक सैनिक ने अपने जूते की ओर इशारा किया, पथरीली जमीन पर जूता फट चुका था. लेकिन ये सैनिक इसलिए ख़ुश है कि उसे चरमपंथियों का एक जूता मिल गया है जो वे छोड़कर भाग चुके हैं.

सैनिक अपने जूते को खोलकर चरमपंथी का जूता पहन लेता है और इसे जेहादी जूते के तौर पर संबोधन देता है.

इनमें से ज़्यादातर सैनिक अफ़गानिस्तान में तैनात रह चुके हैं. इसमें एक ने बताया कि जब तक वे चरमपंथियों के साथ युद्ध शुरू करते हैं तबतक वे गांव के लोगों के बीच घुल-मिल जाते हैं.

"हवा का झोंका ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने ब्लोअर को आपके चेहरे सामने रख कर ऑन कर दिया हो."

फ़्रांसीसी सेना में शामिल ऑस्ट्रेलियाई सैनिक

इस सैनिक के चरमपंथी हमेशा सैनिकों के आसपास ही होते हैं और मौत तक लड़ना बखूबी जानते हैं.

इन सैनिकों के साथ हम दो दिन तक रहे, इस दौरान कोई युद्ध तो नहीं हुआ.

हर जगह मौत का सामान

लेकिन हमें चरमपंथियों के छोड़े गए विस्फोटक पदार्थ दिखाई दिए.

हमें उत्तरी शहर गाओ के आत्मघाती बम दस्ते का सामान मिला. इसमें विस्फोटकों से बना बेल्ट भी शामिल था.

एक फ़्रांसीसी खनन इंजीनियर ने बताया कि उनके पास अत्याधुनिक डेटानेटार है जिसके जरिए उन्हें विस्फोटकों के बारे में पता चल रहा है.

कई जगहों पर बम बनाने के लिए नाइट्रेट से भरे ड्रम मौजूद थे, आगे बढ़ने से पहले फ़्रांसीसी सैनिक इसे जला रहे हैं.

अब हम हम रेतीले नदी के तल की ओर पहुचे हैं. ये एक लंबा रेगिस्तानी इलाका जैसा है.

हमें एक पहाड़ी पर पहुंचना था. कैप्टन क्लेमेंट ने हमसे कहा, “अगर इस बीच में कुछ होता है तो किसी को कवर नहीं कर पाएंगे.”

क्योंकि दूसरा विकल्प मौजूद नहीं था, हमें जल्दी से एक झटके में वहां पहुंचना था.

जब हम तेजी से चलते उससे पहले कैप्टन ने हमें चेताते हुए कहा कि कुछ सप्ताह पहले एक सैनिक को गोली मार दी गई.

कड़ाके की सर्दी-गर्मी

हम किसी तरह पर्वत पर पहुंच गए. उसके बाद हम वहां बैठे.

जब हम बैठे तो ऐसा लगा कि हम जलते हुए कोयले के ढेर पर बैठ गए हों.

मेरा मुंह और गला सूखने लगा. ये काफी दर्द भरा था.

तपते हुए सूरज के नीचे पर पूरे दिन चलते रहे. जब अंधेरा बढ़ने लगा था तब अचानक तापमान गिरने लगा और तापमान शून्य डिग्री से भी नीचे चला गया.

हम थक कर चूर हो चुके थे. हमने अपना स्लीपिंग बैग निकाला और तारों से भरे आसमान के नीचे सो गए.

फ्रांसीसी सैनिक बीते कई सप्ताह से चरमपंथी लड़ाकों के पीछे भाग रहे हैं.

उनके लिए ये माली के उत्तर पूर्वी शहर यानि मंगल ग्रह पर ये तो महज आम दिन जैसा ही था.

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