पाकिस्तान में बजा चुनावी दंगल का बिगुल

  • 20 मार्च 2013
पाकिस्तान चुनाव के प्रमुख प्रतिद्वंदी

पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार संसद के पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद नए आम चुनावों की तारीख की घोषणा कर दी गई है.

राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने आम चुनावों की तारीख 11 मई की तय की है.

कहा जा रहा है कि इन चुनावों में पहली सत्ता का लोकतांत्रिक तरीके से हंस्तातरण किया जाएगा.

पाकिस्तान में सत्ता पर फौज़ के कब्ज़े की घटनाएं अतीत में होती रही हैं पर यह पहली बार हुआ है कि संसद ने पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा किया है.

पाकिस्तान में आम चुनावों के मद्देनजर अंतरिम सरकार के गठन को लेकर बातचीत का दौर जारी है.

जानिए सरकार, विपक्ष और सेना के उन नौ बड़े किरदारों के बारे में जो देश की भावी दिशा-दशा तय करने में अहम भूमिका अदा कर सकते हैं.

राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी

आसिफ अली ज़रदारी
ज़रदारी के लिए पिछला चुनाव अपेक्षाकृत आसान था.

ज़रदारी पाकिस्तान की राजनीति में सबसे विवादित रहे चेहरों में से एक हैं. उनके बारे में कहा जाता है कि वह संयोगवश राष्ट्रपति बन गए.

अपनी पत्नी और पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो की हत्या के बाद उठी सहानुभूति की लहर के बाद ज़रदारी सितम्बर 2008 में सत्ता में आए.

लेकिन उनके कार्यकाल में पाकिस्तान ने राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल देखी जहां अस्थिरता बढ़ने के साथ ही वित्तीय कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार के आरोपों की झड़ी लग गई.

ज़रदारी के कार्यकाल के दौरान ही पाकिस्तान के अमरीका से संबंध बिगड़ते गए और अमरीका भी यह सवाल दागने लगा कि क्या पाकिस्तान चरमपंथ के खिलाफ वाकई पर्याप्त कदम उठा भी रहा है या नहीं.

भ्रष्टाचार के आरोपों के साथ ज़रदारी का नाम इस क़दर जुड़ा हुआ हुआ है कि उन्हें 'मिस्टर टेन पर्सेंट' के नाम से भी पुकारा जाता है.

राजा परवेज़ अशरफ़

राजा परवेज़ अशरफ
राजा परवेज़ अशरफ रिश्वत के आरोपों का सामना कर रहे हैं.

बीते साल जून में यूसुफ़ रज़ा गिलानी की विदाई के बाद राजा परवेज़ अशरफ़ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे.

गिलानी को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी अवमानना का दोषी पाया था क्योंकि गिलानी ने राष्ट्रपति ज़रदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों को दोबारा खोलने से मना कर दिया था.

जनवरी 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया क्योंकि उन पर आरोप लगे कि साल 2010 में ऊर्जा और जल मंत्री रहते हुए उन्होंने बिजली परियोजनाओं के लिए रिश्वत ली थी.

इन आरोपों की वजह से उन्होंने 'राजा रेंटल' नाम से ख्याति अर्जित की. हालांकि वे इन आरोपों से इनकार करते रहें लेकिन साल 2011 में उन्हें अपने पद से हटना ही पड़ा था.

पाकिस्तान पीपुल्ल पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार में वह दो बार मंत्री रहे और साल 2008 से ही ऊर्जा मंत्रालय उनके पास था. पार्टी में भी उनका कद ऊंचा है.

इमरान ख़ान, तहरीक़ ए इंसाफ़ पार्टी के नेता

इमरान खान
माना जाता है कि इमरान खान सेना में भी लोकप्रिय हैं.

पाकिस्तान के पूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खिलाड़ी इमरान ख़ान बीते कई वर्षों से देश के राजनीतिक परिदृश्य पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे हैं.

वह तहरीक़ ए इंसाफ़ पार्टी की अगुआई करते हैं लेकिन राजनीति में अभी बहुत ज्यादा पकड़ नहीं बना पाए हैं.

इमरान ख़ान ने देश में भ्रम की स्थिति का फायदा उठाना चाहा, वह खासतौर पर शहरी मध्यवर्ग को अपनी ओर खींचना चाहते हैं.

वैसे उन्हें कुछ ऐसे नेताओं का सहयोग भी मिला है जो अपनी पार्टियों में संतुष्ट नहीं थे. इमरान ख़ान को राजनीति के मैदान में ऐसे नेताओं के अनुभव से लाभ मिल सकता है.

वह बीते दो वर्षों में सिलसिलेवार तरीके से रैलियां निकालते रहे हैं. माना जाता है कि इमरान ख़ान सेना में भी लोकप्रिय हैं.

इमरान ख़ान का वादा है कि वह पाकिस्तान की राजनीति से भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म कर देंगे. उन्होंने इसके तहत विदेशों से मिलने वाली वित्तीय मदद पर भी रोक लगाने की बात कही है.

ताहिरुल क़ादरी

ताहिरुल कादरी
ताहिरुल कादरी ने चुनावों को लेकर अपना रवैया स्पष्ट कर दिया है.

कनाडा में सात साल गुजारने के बाद पाकिस्तान लौटे डॉक्टर ताहिरुल क़ादरी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे और चुनाव सुधारों की मांग को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था.

समाचार एजेंसी एएफपी ने तहिरुल कादरी के हवाले से खबर दी है कि वह आगामी आम चुनावों का बहिष्कार करेंगे.

कादरी के मुताबिक चुनाव पैसे और ताकत के इस्तेमाल का जरिया भर है इसलिए उनकी पार्टी चुनावों में भागीदारी नहीं करेगी.

कनाडा में वह मिनहाजुल क़ुरान इंटरनेशनल के बैनर तले एक शैक्षणिक और जन-कल्याणकारी संस्था चलाते हैं जो उनके मुताबिक 80 से ज्यादा देशों में सक्रिय है.

जनरल अशफ़ाक कयानी, सेना प्रमुख

अशफाक कयानी
पाकिस्तान में सेना इस्लामी चरमपंथियों से जूझ रही है.

सेना प्रमुख जनरल कयानी के कार्यकाल में पाकिस्तान की सेना ने अपने इतिहास के सबसे उथल-पुथल वाले दौर में से एक दौर देखा.

इस दौर में अमरीकी बलों ने ओसामा बिन लादेन को मार गिराया, चरमपंथी हमलों का खतरा बढ़ा.

पाकिस्तान में ड्रोन हमले भी बढ़े जिसका लोगों ने पुरज़ोर विरोध किया क्योंकि इन हमलों में चरमपंथियों के साथ आम लोग भी मारे गए.

पाकिस्तान के इतिहास में सेना तीन बार तख्तापलट कर चुकी है और इसी बुनियाद पर आशंकाएं बढ़ रही हैं कि सेना एक बार फिर ऐसी हरकत कर सकती है.

लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि सेना को इससे बहुत अधिक हासिल नहीं होगा क्योंकि वह वैसे भी इस्लामी चरमपंथियों से जूझ रही है और तख्तापलट जैसी किसी कार्रवाई से उसे कड़ी अंतरराष्ट्रीय भर्त्सना भी झेलनी होनी.

परवेज़ मुशर्रफ़

परवेज़ मुशर्रफ
चुनावों में शिरकत करने के लिए मुशर्रफ वतन वापस लौट रहे हैं.

साल 2008 में सत्ता से बाहर होने के बाद से ही आत्म-निर्वासन का जीवन बिता रहे पाकिस्तान के अंतिम सैन्य शासक परवेज़ मुशर्रफ़ ने हाल ही में वतन वापसी की घोषणा की.

समाचार एजेंसी पीटीआई ने 69 वर्षीय मुशर्रफ़ के हवाले से बताया कि पाकिस्तान के चुनावों में अपनी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग का नेतृत्व करने के लिए वे 24 मार्च को वतन वापस लौट रहे हैं.

मुशर्रफ़ पर यह आरोप भी लगा कि वह पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराने में विफल रहे जिसकी वजह से साल 2008 में उनकी हत्या कर दी गई थी.

कहा जाता है कि खुद सेना भी मुशर्रफ़ की वापसी को पसंद नहीं करेगी क्योंकि उनके कार्यकाल के दौरान सैन्य शासन की छवि बहुत खराब हो गई थी. संवाददाताओं का कहना है कि देश के आम लोग भी वापसी के बाद मुशर्रफ़ का समर्थन शायद ही करें.

नवाज़ शरीफ़, विपक्षी नेता

नवाज़ शरीफ
सत्ता पर भले ही नवाज़ की पकड़ कमजोर हुई हो लेकिन सियासत पर उनका असर कायम है.

पाकिस्तान के दो बार प्रधानमंत्री रहे नवाज़ शरीफ़ पंजाब में अभी भी अपनी राजनीतिक पकड़ रखते हैं और वह यहां के सबसे लोकप्रिय नेता हैं.

वह पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़, पार्टी के अध्यक्ष हैं जो देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है.

कई लोग यह मानते हैं कि बेनज़ीर की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर ना उठी होती तो नवाज़ शरीफ़ साल 2008 में फिर प्रधानमंत्री बन जाते.

नवाज़ शरीफ़ पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के प्रति कुछ ज्यादा ही दोस्ताना दिखाया और इस वजह से वह उन्हें चुनौती देने के कई अवसर खो बैठे.

लेकिन संवाददाताओं की माने तो बहुत मुमकिन है कि नवाज़ शरीफ़ राजनीति का खेल बहुत सतर्क होकर खेल रहे हैं और सही समय का इंतज़ार कर रहे हैं.

मोहम्मद इफ्तिख़ार चौधरी, मुख्य न्यायाधीश

मोहम्मद इफ्तिखार चौधरी
जस्टिस चौधरी की छवि कानून के शासन की खातिर लड़ने वाले शख्स की है.

मोहम्मद इफ्तिख़ार चौधरी उन कई न्यायाधीशों में से एक थे जिन्हें जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने वर्ष 2007 में हटा दिया था क्योंकि उन्होंने मुशर्रफ़ के पद पर बने रहने पर सवाल उठाए थे.

इसके बाद लंबी मुहिम चली और मार्च 2009 में उन्हें अपने पद पर बहाल कर दिया गया था.

आम लोगों में उनकी छवि एक ऐसे व्यक्ति की है जो कानून के शासन की ख़ातिर लड़ता है. उनकी लोकप्रियता का एक आधार यह भी है कि वह एकमात्र ऐसे न्यायाधीश हुए हैं जिन्होंने पाकिस्तान में सैन्य शासक के विरोध में आवाज़ बुलंद की और जीते भी.

लेकिन उन पर भी यह आरोप लगा कि उन्होंने मामले चुन-चुनकर उठाए.

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