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दुश्मनों के हथियार चुरा लेते थे 'जेम्स बॉन्ड'

 शनिवार, 9 मार्च, 2013 को 16:03 IST तक के समाचार
एसॉल्ट 30 युनिट

एसॉल्ट 30 युनिट के कमांडो नाजियों के झंडे के साथ.

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब ब्रिटिश नौसेना की गुप्तचर शाखा के अधिकारी क्लिक करें इयान फ्लेमिंग जेम्स बॉन्ड सरीखे खुफिया कमांडोज के एक दस्ते का गठन कर थे तभी असल जिंदगी के इन सूरमाओं ने लड़ाई की पूरी तस्वीर बदलकर रख दी थी.

यह कहानी क्लिक करें ‘30-एसॉल्ट युनिट’ की है, जिसके कमांडोज अक्खड़ मगर जांबाज थे.

शायद विश्व युद्ध को जीतने की कोशिश में कमांडर इयान फ्लेमिंग का यह सबसे महान योगदान था.

उनकी मशहूर रचना जेम्स बॉन्ड की प्रेरणा भी ‘30-एसॉल्ट युनिट’ की सफलता से ही मिली थी.

इसकी शुरुआत क्लिक करें ओल्ड एडमिराल्टी बिल्डिंग के रूम नंबर 39 से शुरू हुई थी जहां इयान फ्लेमिंग दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नौसेना की खुफिया शाखा के एक अधिकारी के तौर पर काम कर रहे थे.

‘30-एसॉल्ट युनिट’

उस जमाने में क्लिक करें रूम नंबर 39 में ब्रिटिश नौसेना की खुफिया शाखा के बेहतरीन अफसरों का जमावड़ा लगता था.

सभी चिमनियों की तरह सुलग रहे होते थे और उनकी जिम्मेदारी होती थी कि क्लिक करें जर्मनों को मात देने के नए और अनोखे तौर-तरीके खोजे जाएं.

इयान फ्लेमिंग

जेम्स बॉन्ड की रचना केवल फ्लेमिंग के दिमाग की उपज ही नहीं थी.

बगल के एक दफ्तर से इस कमरे पर नजर रखी जाती थी.

उस दफ्तर में ‘30-एसॉल्ट युनिट’ के बॉस और दुश्मनों का दिल दहला देने की शख्सियत रखने वाले एडमिरल जॉन गॉडफ्रे बैठा करते थे.

जेम्स बॉन्ड की कहानियों में जिस ‘एम’ का जिक्र होता है उसकी तस्वीर एडमिरल जॉन गॉडफ्रे में देखी जा सकती है.

‘30-एसॉल्ट युनिट’ की जिम्मेदारी थी कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन की कमजोरियों को कैसे दूर किया जाए.

दुश्मनों से लोहा

जर्मन अपने सहयोगी देशों की सेना की अगुवाई युद्ध के नए-तौरीकों के साथ कर रही थी.

उनके असलहों में गुप्त-संदेश, रॉकेट, पनडुब्बी, पानी के जहाजों को नष्ट करने वाले तारपीडो, बारूदी सुरंगे और भी कई चीजें थी.

साल 1942 में इयान फ्लेमिंग ने दुश्मनों से निपटने का एक आसान सा तरीका सुझाया- दुश्मनों के हथियार ही चुरा लो.

जर्मनों की खुफिया शाखा की सबसे बेहतरीन खोज थी उनकी ‘एनआईडी’ (नैवल इंटेलीजेंस डिविजन) टीम.

दुश्मनों के हाथ से महत्वपूर्ण दस्तावेज उसे नष्ट किए जाने से पहले छीनना इस कमांडो दस्ते की खास जिम्मेदारी थी.

इयान फ्लेमिंग का प्रस्ताव

30 एसॉल्ट युनिट

जेम्स बॉन्ड की शुरुआत इसी एसॉल्ट युनिट से हुई थी.

‘एनआईडी’ की कामयाबी से प्रभावित फ्लेमिंग ने अपने कोड ‘एफ’ नाम से लिखा कि अगर हम भी ऐसे ही दस्ते का गठन करके अच्छे नतीजे पा सकेंगे.

‘30-एसॉल्ट युनिट’ का जन्म इसी तरह से हुआ.

यह कहा जा सकता है कि फ्लेमिंग एक ऐसे दस्ते का प्रस्ताव दे रहे थे जो कि अधिकृत रूप से चोर, लुटेरे, आवारा होते.

यह दस्ता मुख्य फौज से आगे जाकर अपनी कार्रवाई करता था.

दुश्मन की ताकत को कमजोर करने के लिए ‘30-एसॉल्ट युनिट’ को किसी भी हद तक जाने की आजादी दी गई थी.

कठिन प्रशिक्षण

इस युनिट के कमांडोज को युद्ध कला और सभी तरह के हथियारों के इस्तेमाल का प्रशिक्षण दिया गया था.

उन्हें पैराशूट से छलांग लगाने से लेकर, छोटी नौकाओं के इस्तेमाल तक, चाहे गोताखोरी हो या ताला तोड़ने तक के गुर सिखाए गए थे.

‘30-एसॉल्ट युनिट’ के कमांडोज से यह वादा भी लिया गया था कि वे अपने आम शहरी जीवन में इन हुनरों का इस्तेमाल नहीं करेंगे.

हालांकि तमाम कोशिशों के बावजूद ‘30-एसॉल्ट युनिट’ की पहली कोशिश डायपी में नाकाम रही थी और इयान फ्लेमिंग इस असफलता के गवाह रहे थे.

किसी युद्ध में मोर्चे पर रहने का फ्लेमिंग का यह एकमात्र अनुभव रहा था.

नाकामी के बाद का सफर

हालांकि डायपी में हुई इस तबाही के बावजूद एडमिरल गॉडफ्रे ने ‘30-एसॉल्ट युनिट’ पर अपना यकीन नहीं खोया.

मारे गए कमांडोज की जगह पर भर्तियां की गई और उत्तरी अफ्रीका में ऑपरेशन टॉर्च के लिए नई टीम बनाई गई.

और यहां इयान फ्लेमिंग की इस युनिट को बेहतर कामयाबी मिली. फिर उनका इस्तेमाल माल्टा, सिसली और साल 1943 में इटली की मुख्य भूमि पर किया गया.

‘30-एसॉल्ट युनिट’ में काम करने का मौका पाने के लिए गोपनीयता सबसे जरूरी शर्त थी. और सभी सदस्यों को आधिकारिक गोपनीयता कानून के तहत इसके लिए वादा करना पड़ता था. कमांडोज अपने करीबी रिश्तेदारों को भी अपने काम के बारे में कुछ नहीं बता सकते थे.

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