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अफ़ग़ानिस्तान, समलैंगिक और सज़ा-ए-मौत

 बुधवार, 20 फ़रवरी, 2013 को 11:01 IST तक के समाचार

हामिद कहते हैं कि उन्हें शुरु से इस बात का एहसास था कि वो दूसरों से कुछ अलग हैं.

हामिद ज़ाहेर अफगानिस्तान के रहने वाले हैं और पेशे से एक दवा विक्रेता है.

पहली नज़र में उनकी ज़िंदगी एक आम आदमी की तरह है, लेकिन सच ये है कि वो अपने घर से हज़ारों किलोमीटर दूर कनाडा के टोरंटो शहर में रहने को मजबूर हैं.

उनका अपराध है कि उन्होंने अफगानिस्तान में एक नियम तोड़ा और दुनिया को ये ज़ाहिर किया कि वो एक क्लिक करें समलैंगिक हैं.

अफगानिस्तान एक ऐसा देश है जहां क्लिक करें समलैंगिकता अपराध है और समलैंगिक होने का मलतब है सज़ा ए मौत. अपने समलैंगिक होने के अनुभव पर उन्होंने एक किताब लिखी जो अफगानिस्तान में कभी नहीं छपी.

दूसरों से अलग हैं

हामिद कहते हैं कि उन्हें शुरू से इस बात का एहसास था कि वो दूसरों से कुछ अलग हैं.

"जब मैं बड़ा हो रहा था मैं कई बार पुरुषों की तरफ आकर्षित हुआ, लेकिन मैं 15 की उम्र से पहले कभी ये जान नहीं पाया कि मेरी यौन इच्छाएं दूसरे लड़कों से अलग है."

हामिद ज़ाहेर

अफगानिस्तान के एक गांव में 1980 के दशक में उनका बचपन बीता. उन दिनों को याद कर हामिद कहते हैं कि मौत और यातनाओं के डर से उन्होंने हमेशा अपनी भावनाओं को दूसरों से छिपाया.

बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, ''जब मैं बड़ा हो रहा था मैं कई बार पुरुषों की तरफ क्लिक करें आकर्षित हुआ, लेकिन मैं 15 की उम्र से पहले कभी ये जान नहीं पाया कि मेरी यौन इच्छाएं दूसरे लड़कों से अलग है.''

समय के साथ मेरे भीतर कुछ बदलाव हुए और मेरे आस-पास लोगों को लगने लगा कि मेरा व्यवहार औरतों जैसा है और उन्होंने मुझे छेड़ना शुरू कर दिया.

सज़ा ए मौत

अपने छात्र जीवन के दौरान यह जानने के बावजूद कि वो समलैंगिक हैं उन्होंने मौत की सज़ा सुनाए जाने के डर से इस बात को हर किसी से छिपाए रखा.

मुश्किलें तब खड़ी हुईं जब 25 साल की उम्र में उन पर शादी के लिए दबाव बनाया जाने लगा.

"मैंने अफगानिस्तान में समलैंगिक होने के अपने अनुभवों पर किताब लिखी ताकि लोग ये जानें कि अफगानिस्तान में समलैंगिक किस त्रासदी से गुज़रते हैं और उस देश में अपनी यौन इच्छाओं को ज़ाहिर करना कितना बड़ा अपराध है."

हामिद ज़ाहेर

वो कहते हैं, ''अफगानिस्तान में समलैंगिक होने का मतलब है मौत. सरकार को छोड़िए मेरे अपने रिश्तेदार मुझे मार डालते.''

उनकी रोज़मर्रा ज़िंदगी जब बेहद मुश्किल हो गई तो वो भागकर पाकिस्तान चले गए और उसके बाद कनाडा में शरण ली.

वो कहते हैं, ''मैंने अफगानिस्तान में समलैंगिक होने के अपने अनुभवों पर किताब लिखी ताकि लोग ये जानें कि अफगानिस्तान में समलैंगिक किस त्रासदी से गुज़रते हैं और उस देश में अपनी यौन इच्छाओं को ज़ाहिर करना कितना बड़ा अपराध है.''

गुमनाम समलैंगिक

काबुल विश्वविद्दालय के एक प्रोफेसर दाउद रवीश कहते हैं कि कोई भी कभी भी यह जान नहीं सकता कि अफगानिस्तान में कितने समलैंगिक हैं क्योंकि लोग रही नहीं कानून भी ये कहता है कि समलैंगिक व्यक्ति एक असमान्य व्यक्ति है.

हामिद ने दुनिया को अपनी पहचान ज़ाहिर की लेकिन इसकी एक बड़ी कीमत भी चुकाई है. उनके परिवार ने उन्हें तिरस्कृत कर दिया है और उनके अपने देश में लोग उनकी ज़िंदगी को खत्म करना चाहते हैं.

लेकिन हामिद के लिए अपनी आवाज़ अफगानिस्तान के दूसरे गुमनाम समलैंगिकों तक पहुंचाना वो मकसद है जिसके लिए वो ये दुख उठाने को तैयार हुए.

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