BBC navigation

हुकूमत के इरादे पर पाक मीडिया का सवाल

 सोमवार, 18 फ़रवरी, 2013 को 17:02 IST तक के समाचार
बलूचिस्तान

बलूचिस्तान में चरमपंथी हिंसा का सिलसिला जारी है.

पाकिस्तान में मजहबी गुटों के बीच जारी क्लिक करें संघर्ष को सुलझाने के मुद्दे पर वहां की मीडिया ने सरकार की मंशा पर संदेह जताया है.

कराची से अंग्रेजी में प्रकाशित होने वाला ‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ अखबार उदारवादी माना जाता है.

अखबार साफ तौर लिखता है, “16 फरवरी को क्वेटा में हुए बम धमाके में हजारा क्लिक करें शिया समुदाय के लोगों को क्लिक करें निशाना बनाया गया था. धमाके में 80 लोग मारे गए थे. उम्मीद है इससे खामोशी टूटनी चाहिए."

अख़बार के अनुसार, "लश्कर-ए-झांगवी ने धमाकों की जिम्मेदारी ली है और शियाओं के खिलाफ हुए दर्जनों हमलों में वे शामिल रहे हैं... मसले के हल के लिए क्लिक करें खुफिया निगरानी, सैन्य कार्रवाई और बेहतर क्लिक करें कानून व्यवस्था की जरूरत है. इसे करने के लिए केवल ज़ज्बे की कमी महसूस की जा रही है.”

क्या कहते हैं अखबार

कट्टरपंथी माने जाने वाले अखबार ‘इस्लाम’ ने लिखा है, “मुल्क में खास तौर पर कराची और बलूचिस्तान में अमन और स्थायित्व के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए और सबसे ज्यादा अहम यह है कि देश में सक्रिय क्लिक करें बाहरी तत्वों और उनके स्थानीय एजेंटों को पकड़ा जाए. चरमपंथी तत्वों को उनकी पार्टी या विचारधारा का ख्याल किए बिना गिरफ्तार किया जाना चाहिए और उन्हें कठोर सज़ा दी जानी चाहिए.”

"हजारा समुदाय पर आसन्न खतरे को अलग तरीके से देखे जाने की कम से कम दो वजहें हो सकती हैं. पहला यह कि इस समुदाय के पास बहुत ज्यादा सियासी, आर्थिक और सामाजिक रसूख नहीं है. और दूसरा यह कि पारंपरिक बलूच समुदाय भी हजारा लोगों को बहुत तवज्जो नहीं देता है. जब तक कि हालात नहीं बदलते और सरकार सभी लोगों की जिंदगी की सुरक्षा एक समान वरीयता के साथ नहीं करती. हजारा लोगों पर सितम जारी रहेगा"

डॉन, कराची से प्रकाशित होने वाला अंग्रेजी अखबार

अल रशीद ट्रस्ट से जुड़े इस अखबार का प्रकाशन कराची से ही होता है.

क्लिक करें इस्लामाबाद से अंग्रेजी में प्रकाशित होने वाले ‘पाकिस्तान ऑब्ज़र्वर’ को सेना समर्थक अखबार के तौर पर देखा जाता है.

‘पाकिस्तान ऑब्ज़र्वर’ लिखता है, “यह एक तरह से पाकिस्तान के खिलाफ दुश्मनों की लड़ाई जैसा है... इसमें कोई शक़ नहीं है कि ये दुश्मन ही है. इनकी कायराना हरकत के बारे में सरकारी अफसरान भी कहते रहे हैं... और भारत के प्रधानमंत्री केवल इतना ही कहते हैं कि वे मामले को देखेंगे. अब बहुत हो चुका है और खुदा के लिए इन हमलों के पीछे जो लोग शामिल हैं, उनकी पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्लिक करें सार्वजनिक की जाए. ठोस कदम उठाए जाएं क्यों कि बलूचिस्तान क्लिक करें रक्त रंजित हो गया है.”

पाक में अल्पसंख्यक

अंग्रेजी के अखबार ‘द नेशन’ ने लिखा है, “यह क्लिक करें पीड़ितों के लिए मुआवजे या खुफिया जानकारी देने पर केवल ईनाम का ऐलान करके लोगों की नाराजगी कम करने का समय नहीं है. ऐसे वक्त में बलूचिस्तान के गवर्नर माग्सी या खुफिया एजेंसियां अपनी जिम्मेदारी से बच सकती हैं. यह नहीं भूला जाना चाहिए कि बलूचिस्तान की सरकार को उनकी नाकामी के लिए बर्खास्त किया गया था और नवाब माग्सी को मौका क्यों दिया गया. अगर उन्हें कामयाबी नहीं मिलती तो इसका मतलब यह नहीं हुआ कि यह सूबा हुकूमत करने के लायक ही नहीं है.”

परंपरावादी अखबार ‘द नेशन’ का प्रकाशन इस्लामाबाद से होता है.

बलूचिस्तान, क्वेटा

बम धमाकों में अब तक सैंकड़ो लोगों की जान गई है.

लाहौर से प्रकाशित होने वाले ‘डेली टाइम्स’ अखबार ने लिखा है, “चरमपंथी समूह और उससे जुड़े लोग पाकिस्तान में पहले से ही अहमदी समुदाय, हिंदुओं और इसाईयों को अपना क्लिक करें निशाना बना रहे थे और अब सितम सहने की क्लिक करें शियाओं की बारी है. इन्हें पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समझा जाता है. इस मसले का हल करने का वक्त आ गया है.”

अंग्रेजी में प्रकाशित होने वाला ‘डेली टाइम्स’ जेहादियों की मुखालफत करता है.

‘डॉन’ की राय

‘डॉन’ ने लिखा है, “ क्लिक करें हजारा समुदाय पर आसन्न खतरे को अलग तरीके से देखे जाने की कम से कम दो वजहें हो सकती हैं. पहला यह कि इस समुदाय के पास बहुत ज्यादा सियासी, आर्थिक और सामाजिक रसूख नहीं है. और दूसरा यह कि पारंपरिक बलूच समुदाय भी हजारा लोगों को बहुत तवज्जो नहीं देता है. जब तक कि हालात नहीं बदलते और सरकार सभी लोगों की जिंदगी की सुरक्षा एक समान वरीयता के साथ नहीं करती. हजारा लोगों पर क्लिक करें सितम जारी रहेगा”.

कराची से प्रकाशित होने वाले ‘डॉन’ को वामपंथी रुझान वाला उदारवादी अंग्रेजी अखबार समझा जाता है.

( क्लिक करें बीबीसी मॉनिटरिंग दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. बीबीसी मॉनिटरिंग की अन्य खबरों को पढ़ने के लिए क्लिक करें यहाँ क्लिक करें. आप बीबीसी मॉनिटरिंग की खबरें क्लिक करें ट्विटर और क्लिक करें फेसबुक पर भी पढ़ सकते हैं.)

इसे भी पढ़ें

टॉपिक

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.