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कैसे जुटाई जानकारी?

 मंगलवार, 2 अप्रैल, 2013 को 19:46 IST तक के समाचार

दुनियाभर में सबसे अधिक संख्या में अप्रवासी भारत और चीन से आ रहे हैं.

अप्रवासन का मुद्दा दुनियाभर के ज्यादातर देशों के लिए चिंता का विषय है. लेकिन पिछले 15 से 20 साल में सरकारों ने अप्रवासन को लेकर अपनी नीतियों में कई बदलाव किए हैं ताकि वो लोग दूसरे देशों में दाखिल हो सकें जिनका दूसरे देशों की सरकारें स्वागत करती हैं. कौन से हैं वो अप्रवासी जिनका दुनिया के ज़्यादातर देश स्वागत करते हैं ? इसी सवाल ने इस परियोजना की नींव रखी.

हमने अपने अनुसंधान को हुनरमंद कामगारों पर केंद्रित किया, यानी वो लोग जिन्हें दूसरे देशों में दाखिल होने में आमतौर पर दिक्कत नहीं होती. शुरुआत में हमें लगा कि उनकी गतिविधियों पर नज़र रखना आसान होगा.

लेकिन इसमें कई दिक्कतें थीं. पहली ये कि ज्यादातर देश आम अप्रवासियों और हुनरमंद कामगारों में कोई फर्क नहीं करते. दूसरी ये कि ज्यादातर सरकारों के पास इस बात की कोई जानकारी मौजूद नहीं कि ‘कौन, किस काम के लिए कहां जा रहा है?’

‘ऑरगेनाइज़ेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवेलपमेंट’ (ओईसीएडी) की रिपोर्ट के ज़रिए इस बात की जानकारी कुछ हद तक मौजूद है कि दुनियाभर में अप्रवासी कहां और क्यों जा रहे हैं और इन विदेशी कामगारों के लिए अलग-अलग देशों की सरकारें किस तरह अपनी नीतियां बदल रही हैं.

साल 2012 में आई ‘इंटरनेशनल माइग्रेशन आउटलुक’ और ‘कनेक्टिंग विद डॉयसपोरा’ नामक दो रिपोर्ट इन जानकारियों का अहम ज़रिया रही हैं.

कैसे मिलीं जानकारियां

ओईसीएडी के सदस्य 34 देशों में से हमें 24 देशों की ओर से जानकारी मिली. पोलेंड जैसे देशों ने हमें स्वतंत्र कंपनियों द्वारा कराए गए अनुसंधानों के ज़रिए भी जानकारी उपलब्ध कराई.

हालांकि इस तरह की जानकारी हमें सभी देशों से नहीं मिली. एस्टोनिया के मामले में हमें एक ऐसी सूची तो मिल पाई जिसमें 2019 तक अलग-अलग क्षेत्रों में पैदा हुई मांग का ब्यौरा था लेकिन यह जानने का कोई ज़रिया नहीं था कि किस क्षेत्र में कितने अप्रवासी कामगारों की ज़रूरत है.

ओईसीएडी देशों ने दुनियाभर में अप्रवासियों की गतिविधियों को लेकर अहम जानकारियां दीं हैं. ये वो देश हैं जहां अप्रवासियों का आना-जाना सबसे अधिक होता है. लेकिन इस श्रृंखला में भारत और चीन जैसे देशों को ही अहमियत दी गई है क्योंकि दुनियाभर में सबसे अधिक संख्या में अप्रवासी इन्हीं दोनों देशों से आ रहे हैं.

जहां तक ब्रिक्स देशों का सवाल है केवल दक्षिण अफ्रीका और रुस ऐसा देश है जहां हुनरमंद कामगारों के लिए अलग से नीतियां हैं. रुस की इन्हीं नीतियों के ज़रिए हम ये जान पाए कि कम से कम रुस में जिस एक क्षेत्र में अप्रवासियों की सबसे अधिक ज़रूरत है वो है सूचना प्रौद्योगिकी.

भारत, चीन और ब्राज़ील में स्थितियां और भी चुनौतीपूर्ण हैं. इनमें से किसी भी देश के पास अप्रवासियों को लेकर कोई ठोस नीति नहीं है. इन देशों में फिलहाल दारोमदार हुनरमंद कामगारों को वापस अपने देशों में लाना है.

ब्राज़ील को लेकर ये जानकारी उस सूची से निकाली गई है जो अप्रवासियों के देश में दाखिल होने के वक्त बनाई जाती है. भारत से ये जानकारियां मुख्य रुप से योजना आयोग द्वारा दी गई साल 2012-17 की पंचवर्षीय योजना संबंधी जानकारियों से निकाली गई.

सभी देशों की जानकारियां मिलने के बाद अगला कदम था अलग-अलग श्रेणियों में इन देशों की जानकारियों की तुलना करना. ये तुलना आईएससीओ यानी ‘स्टैंडर्ड ऑफ ऑक्यूपेशन्स’ में मौजूद पेशों की श्रेणियों के आधार पर की गई जो इस अनुसंधान का भी आधार है.

हैरानी की बात ये है कि एक ही तरह के पेशे अलग-अलग देशों में अलग श्रेणियों में मौजूद हैं.

इसके चलते यह तय करना भी एक चुनौती थी कि पेशों को किस आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाए.

ज्यादातर देश अप्रवासियों के लिए मांग पर आधारित रुख अपनाते हैं जिसमें उन कंपनियों और उद्यमियों से राय ली जाती है जो अप्रवासियों के लिए नौकरियों का ज़रिया हैं.

आंकड़ों की सीमाएं

  • सूचियों का अलग समय सीमाएं
  • सभी देशों के पास सूचियां उपलब्ध नहीं है इसलिए मुमकिन है कुछ देशों के संबंध में अप्रवासियों की असल संख्या सटीक न हो.
  • आकड़े केवल ओईसीएडी के 25 देशों से मिली जानकारियों पर आधारित हैं. जापान, अफ्रीका, सिंगापुर जैसे कई महत्वपूर्ण देश जानकारियों की कमी के चलते इस श्रृंखला में शामिल नहीं किए जा सके हैं.

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