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तेजाब में जल गई थी जीने की उम्मीद....

 सोमवार, 4 फ़रवरी, 2013 को 07:53 IST तक के समाचार
लंदन में ट्रैफिक

बस से उतरने के बाद निशाना बनीं ओनी

पिछले साल दिसंबर में पूर्वी लंदन में नाओमी ओनी के चेहरे पर तेजाब फेंका गया तो उनकी जीने की कोई तमन्ना नहीं बची थी. हालांकि अब अपनी तमाम मुश्किलों के बावजूद वो सकारात्मक नजरिया रखती हैं.

जब बीस वर्षीय नाओमी 30 दिसंबर को लॉज एवेन्यू इलाके में एक बस से उतरी तो किसी नकाबपोश ने उनके चेहरे पर तेजाब फेंक दिया.

इसके बाद उन्हें कई सर्जरी करानी पड़ीं और अब वो अपनी चोटों से उबर रही हैं.

वो बताती हैं, “मुझे कभी अपने जीवन में इतना डर नहीं लगा था. मुझे पता चला कि ये तेजाब है. इसके बाद जब मैंने अपना चेहरा देखा तो जीने की कोई इच्छा नहीं बची थी.”

हमले के बाद खुद को आईने में देखने पर ओनी को सदमा लगा. वो बताती हैं, “मेरा चेहरा काला था. मेरी आंखें सूजी हुई थीं और मेरी आंखें कटी हुई थीं. मुझे लगा कि मेरी आंखों की रोशनी चली जाएगी. मैं बहुत डरी हुई थी.”

अपनी इन गंभीर चोटों के बावजूद ओनी अब सकारात्मक सोच रखती हैं. लेकिन उनका मानना है कि इससे भी कहीं बुरा हो सकता था.

वो कहती हैं, “वो व्यक्ति नाकाम रहा, भले ही उसका इरादा कुछ भी रहा हो. ईश्वर ने किसी वजह से ही मुझे जिंदगी दी है और इसीलिए मेरी जिंदगी चल रही है.”

भाग्यशाली

"मैं बस से उतरी और अपने घर जाने के लिए सड़क पार करने वाली थी कि मैं महसूस किया कि कोई मेरे पीछे हैं. मैंने मुड़कर देखा. इसके बाद लगा कि मेरे चेहरे पर कुछ फेंका गया है."

नाओमी ओनी

ओनी ने बीबीसी को बताया कि वो काम के बाद स्थानीय समय के अनुसार आधी रात के आसपास घर लौट रही थी कि ये हमला हुआ.

वो बताती हैं, “मैं बस से उतरी और अपने घर जाने के लिए सड़क पार करने वाली थी कि मैं महसूस किया कि कोई मेरे पीछे हैं. मैंने मुड़कर देखा. मुझे लगा कि कोई महिला है जिसने हिजाब पहन रखा है. इसके बाद लगा कि मेरे चेहरे पर कुछ फेंका गया है जो फैल गया.”

तेजाब से हमला

हमले के बाद ओनी की जिंदगी बहुत बदल चुकी है

वो आगे बताती हैं, “मैं दर्द से चीखती हुई अपने घर पहुंची और चिल्ला रही थी तेजाब, तेजाब, तेजाब. इससे पहले कि मुझे जलन होती, मैं समझ गई थी कि ये तेजाब है. मैंने सोचा कि कोई था जो मुझे मारना चाहता था.”

अब ओनी अस्पताल से घर पहुंच चुकी हैं. ओनी खुद को भाग्यशाली मानती हैं क्योंकि इस हमले में उनकी आंखों की रोशनी भी जा सकती थी. लेकिन वो अब भी ये नहीं समझ पा रही हैं कि उन्हें कौन मारना चाहता था.

वो कहती हैं, “बिल्कुल नहीं जानती कि किसी ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया. मैं भी रोज खुद से यही सवाल पूछती हूं. मैं ही क्यों? मैंने ऐसा क्या किया है? मैं भी नहीं समझ पाई हूं?”

पुलिस भी इस पहेली को नहीं समझा पा रही है और इसलिए कोई गिरफ्तारी भी नहीं हुई है.

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