पुरुषों का जांघिया अर्थव्यवस्था का थर्मामीटर?

  • 13 जनवरी 2013
जांघिया
पुरुषों की जेब और उनके जांघिये के बीच कोई रिश्ता हो सकता है !

अमरीका के सबसे ताकतवर अर्थशास्त्रियों में से एक एलन ग्रीनस्पैन ने कभी कहा था कि किसी अर्थव्यवस्था की सेहत का अंदाजा वहां पुरुषों के जांघिये की बिक्री से लगाई जा सकती है.

फेडेरल रिज़र्व के भूतपूर्व चेयरमेन एलन ग्रीनस्पैन मानते थे कि ये खर्च के लिए उपलब्ध आय को मापने का पैमाना थे.

पत्रकार रॉबर्ट क्रुलविच ने ग्रीनस्पैन के सिद्धांत के बारे में 20 साल पहले ही सुना था. उन्होंने बीबीसी रेडियो को बताया कि अर्थशास्त्रियों में इस विचार के प्रति आकर्षण अब भी बरकरार है.

लेकिन नीचे की ओर लटकी हुई जीन्स के फैशन की वजह से पुरुषों की खरीददारी की आदतों में बदलाव हो सकता है.

जेब और जांघिया

अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर ग्रीनस्पैन से उनके ही दफ्तर में हुई बातचीत का जिक्र करते हुए क्रुलविच कहते हैं, “उन्होंने बताया कि पुरुषों के जांघिये से अर्थव्यवस्था का अनुमान किया जा सकता है. जांघिये की बिक्री से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि अर्थव्यवस्था में क्या होने वाला है.”

क्रुलविच बताते हैं, “ जब कोई आदमी व्यवस्क हो जाता है तो वह जांघिया खरीदेगा, पहनेगा और फिर एक और जोड़ी खरीदेगा. इस चलन में संभवतः इसमें बहुत ज्यादा बदलाव नहीं होगा. लेकिन कुछ परिस्थितियों में इसमें बदलाव होता है. एक वक्त ऐसा भी आता है जब जांघिये कि बिक्री कम होने लगती है. इससे यह पता चलता है कि उस घर का पुरुष अपने खर्च में कटौती करने जा रहा है.”

“वह वास्तव में अपने एक कपड़े पर खर्च नहीं करने की कोशिश कर रहा होता है और इससे सचमुच कोई फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि जांघिये को वही देख पाते हैं जिनकी पहुंच उसे रखने की जगह तक होती है और वे इसकी परवाह नहीं करेंगे. निजी बात होने की वजह से पत्नी को भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा.”

फैशन में बदलाव

क्रुलविच कहते हैं कि ग्रीनस्पैन इस नतीजे पर पहुंचने के लिए साल 1970 के एक मॉडल का इस्तेमाल कर रहे थे. इसमें कहा गया था कि पुरुष अक्सर परिवार के दूसरे सदस्यों को कपड़े की जरूरत पूरी करने के लिए पैसे दिया करते हैं. लेकिन यह खर्च वह खुद पर नहीं करते हैं.

क्रुलविच मानते हैं “तब से पुरुषों के जांघिये के फैशन में काफी कुछ बदलाव हुआ है.”

क्रुलविच के अनुसार “किसे पता था कि बदलते जमाने में लोग अपनी सिक्स-पैक दिखाने के लिए नीचे सरकती हुई पैंट पहनेंगे और जांघिये के ब्रांड के बारे में पता चलेगा. कैल्विन क्लेन वह नाम होगा जिसे लोग देख सकेंगे.”

आंकड़े कहते हैं

‘डेड गुड अंडीज’ की संस्थापक जेन गार्नर कहती हैं, “जब पुरुष खुद के लिए खरीददारी कर रहे होते हैं तो यह उनके अतिरिक्त खर्च के लिए उपलब्ध आमदनी होती है और वे अपनी पैंट तब तक पहने रहेंगे जब तक वह इसके लायक रहती है”.

गार्नर ने बताया कि हाल में हुई बिक्री से बीते सालों की मंदी के उतार-चढ़ाव का पता चलता है.

वह कहती हैं कि उनके यहाँ साल 2011 में 54 हज़ार जांघियों की बिक्री हुई थी जबकि वर्ष 2012 में यह आंकड़ा गिरकर 50 हज़ार हो गया.

कारोबार की प्रतिकूल परिस्थितियों में गार्नर को यह उपलब्धि की तरह ही लगता है.

गार्नर यह भी कहती हैं, “मुझे नहीं लगता कि इन दिनों यह सिद्धांत उसी तरह से काम कर रहा है. ऑनलाइन खरीददारी करने वाले पुरुष अपने विकल्पों के मुताबिक अपने बजट को खुद ही नियंत्रित कर रहे हैं.”