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पाकिस्तान, ईरान और इसराइल साथ-साथ...?

 रविवार, 2 दिसंबर, 2012 को 11:03 IST तक के समाचार

जानकारों का कहना है कि इस परियोजना में शामिल देशों ने अपनी राजनीतिक बाधाओं को तोड़ा है.

दुनिया के सबसे तनावग्रस्त इलाके मध्य पूर्व में एक बेहद संवेदनशील अत्याधुनिक परियोजना पर काम हो रहा है जिसमें कुछ ऐसे देश भी विज्ञान के जरिए कूटनीति को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं जो एक-दूसरे के प्रति खुलेआम दुश्मनी का ऐलान करते हैं.

यह वैज्ञानिक प्रतिष्ठान जॉर्डन में बन रहा है जिसने पाकिस्तान, तुर्की, साइप्रस, ईरान और इसराइल को एक-दूसरे के करीब ला दिया है. करोड़ों पाउंड की लागत वाली इस सिनक्रोट्रॉन पार्टिकल एक्सेलेरेटर परियोजना को सीसेम नाम से जाना जाता है.

किसी विशाल माइक्रोस्कोप की तरह कार्य करने वाले सिनक्रोट्रॉन शोधकर्ताओं के लिए बड़े काम का साबित होगा जहां वे विषाणु से लेकर नई दवाओं तक, तरह-तरह के शोध कर सकेंगे.

सिनक्रोट्रॉन, आधुनिक विज्ञान के शोध-जगत में बड़ा महत्व रखता है और दुनियाभर में इस तरह के 60 प्रतिष्ठान कार्यरत हैं. इनमें से अधिकतर विकसित देशों में हैं और ये मध्य-पूर्व में ऐसा पहला शोध केंद्र होगा. क्लिक करें

कैसे हुई पहल

'यूरोपीय ऑर्गेनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च' या सीईआरएन की तर्ज पर मध्यपूर्व में अति उन्नत शोध कार्यों और इसके जरिए संवाद की पहल का विचार 1990 के दशक में आया.

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सिनक्रोट्रोन क्या है

  • सिनक्रोट्रोन एक विशाल मशीन है.
  • इसका आकार किसी फुटबॉल के मैदान के बराबर हो सकता है.
  • यहां प्रकाश की गति से इलेक्ट्रॉन्स की बौछार की जाती है.
  • ये इलेक्ट्रॉन चुम्बकीय क्षेत्र से गुजरते हैं और बेहद तेज़ रौशनी पैदा करते हैं.
  • वैज्ञानिक इसका इस्तेमाल बेहद उन्नत शोध-कार्यों के लिए करते हैं.

मध्यपूर्व के देशों में शोधकार्यों में समन्वय के लिए सीसेम की स्थापना की गई. ब्रिटेन के भौतिक-विज्ञानी प्रोफेसर सर क्रिस स्मिथ सीसेम के प्रमुख हैं जो सीईआरएन के पूर्व निदेशक रह चुके हैं.

बीबीसी की टीम सिनक्रोट्रॉन परियोजना-स्थल पर पहुंची जहां साइप्रस, तुर्की, इसराइल, ईरान, पाकिस्तान, जॉर्डन, फलस्तीन और मिस्र के प्रतिनिधि एक साथ बैठकर काम कर रहे थे.

अनूठा मेल

परियोजना के लिए जरूरी धन जुटा लिया गया है और साल 2015 तक इसके शुरू होने की संभावना है.

ईरान की सरकार खुले आम कहती है कि वो इसराइल को तबाह कर देगी. वहीं इसराइल भी कहता है कि ईरान के परमाणु संयंत्रों पर बमबारी कर देगा.

लेकिन सीसेम ने इन्हें करीब ला दिया है. ये परियोजना व्यावहारिकता के धरातल पर कितनी सफल होगी, इसे लेकर कई वर्षों तक संदेह के बाद अब इस परियोजना का निर्माण कार्य तेज़ी से आगे बढ़ रहा है.

परियोजना के लिए जरूरी धन जुटा लिया गया है और साल 2015 तक इसके शुरू हो जाने की संभावना है. ये परियोजना जॉर्डन की राजधानी अम्मान से बीस मील दूर उत्तर-पश्चिम के पहाड़ी इलाके में स्थित है.

सीसेम के प्रमुख सर क्रिस स्मिथ ने बीबीसी को बताया, ''इन देशों ने अपनी राजनीतिक बाधाओं को तोड़ा है. विज्ञान एक साझा ज़ुबान है, यदि हम इसे साथ मिलकर बोल सकें तो ये भरोसे का जरिया बन सकता है जिससे अन्य क्षेत्रों में भी मदद मिल सकती है.''

"इन देशों ने अपनी राजनीतिक बाधाओं को तोड़ा है. विज्ञान एक साझा ज़ुबान है, यदि हम इसे साथ मिलकर बोल सकें तो ये भरोसे का जरिया बन सकता है जिससे अन्य क्षेत्रों में भी मदद मिल सकती है."

प्रोफेसर सर क्रिस स्मिथ

यरुशलम स्थित हिब्रू यूनिवर्सिटी में भौतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर एलीज़र रेबिनोविकी के मुताबिक ये परियोजना मध्य-पूर्व के कई देशों में रहने वाले लोगों के लिए उम्मीद की एक किरण हैं.

ईरान के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक और प्रोफेसर मेहमूद तबरेज़ी भी उनकी इस बात का समर्थन करते हैं.

सिनक्रोट्रोन

सिनक्रोट्रोन एक विशाल मशीन है. इसका आकार किसी फुटबॉल के मैदान के बराबर हो सकता है.

यहां प्रकाश की गति से इलेक्ट्रॉन्स की बौछार की जाती है. ये इलेक्ट्रॉन चुम्बकीय क्षेत्र से गुजरते हैं और बेहद तेज़ रौशनी पैदा करते हैं.

वैज्ञानिक इसका इस्तेमाल बेहद उन्नत शोध-कार्यों के लिए करते हैं. सिनक्रोट्रोन की आधुनिक विज्ञान जगत में शोध-कार्यों में अहम भूमिका है.

बायो-साइंस की विभिन्न शाखाओं जैसे माइक्रो-मॉलीक्यूलर, प्रोटीन क्रिस्टेलोग्राफी और सेल-बायोलॉजी में इसकी मदद से अहम शोध हो रहे हैं.

चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में भी इस तकनीक का इस्तेमाल होता है. कैंसर रेडिएशन थैरेपी के लिए भी इस तकनीक को मददगार पाया गया है.

पर्यावरण और कृषि जगत में भी शोध कार्यों में सिनक्रोट्रोन की अहम भूमिका है. यानी आधुनिक विज्ञान की कोई शाखा, शोध-कार्यों के लिए सिनक्रोट्रोन के इस्तेमाल से अछूती नहीं है.

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