पता नहीं सू ची मुझे पहचानेंगी या नहीं?

 बुधवार, 14 नवंबर, 2012 को 10:56 IST तक के समाचार
सू ची के कॉलेज के दिन

कॉलेज के दिनों में आंग सान सू ची (बांए से दूसरी)

उनके बारे में कुछ ख़ास नहीं था. वो बिल्कुल एक आम लड़की ही थीं. सिर्फ मैं ही नहीं, मेरे कॉलेज में किसी को दूर-दूर तक ये अंदाजा नहीं था कि एक दिन वो इतनी बड़ी शख्सियत बन कर उबरेंगी.

भला कौन कह सकता था कि एक दिन उनकी गिनती विश्व के जाने माने नेता के रूप में होगी या फिर वो अपने देश में लोकतंत्र के झंडे को बुलंद करेंगी.

मुझे याद है वो 1964 में 26 अगस्त का दिन था. लेडी श्रीराम कॉलेज में बतौर व्याख्याता ये मेरा पहला दिन था.

सुबह के नौ बज रहे थे जब में अंतरराष्ट्रीय मामलों के विषय को पढ़ाने अपनी क्लास में पहुंची. मैंने हाजरी ली. मुझे नहीं पता था की आंग सान सू ची कौन थी. वो मेरी क्लास में मौजूद 60 लड़कियों में से एक थीं.

खामोश मिज़ाज, हमेशा कम बोलने और गंभीर रहने वाली लड़की सू ची दूसरों से ज्यादा अलग भी नहीं थीं. बाद में इतना पता चला कि उनकी माँ भारत में बर्मा की राजदूत हैं. लेकिन उन्होंने कभी ऐसा ज़ाहिर नहीं होने दिया.

सू ची की रुचि

कभी कभी उनकी माँ या तो उन्हें लेने आया करती थीं या कॉलेज छोड़ने के लिए. उनका स्वभाव भी सू ची की तरह ही था.

कभी उन लोगों ने खुद को दूसरों के ऊपर दिखाने की कोशिश नहीं की. चूँकि कॉलेज में उनका व्यक्तित्व दूसरों से अलग नहीं था इसलिए अलग से उन पर नज़र नहीं थी.

हाँ, मुझे इतना अब ज़रूर याद आता है की उनके साथ की कुछ लड़कियां बहुत शरारती थीं. वो मुझ से उलटे सीधे सवाल पूछा करती थीं. मैं नई थी ना.

"उनमें कुछ चमत्कारिक मैंने कभी नहीं देखा जिससे लगता की एक दिन ये ज़िन्दगी कुछ अलग सा हट कर करेंगी या फिर कभी ये भी नहीं सोचा कि कभी ये विश्व में अपनी कोई जगह बनाएंगी. उन्हें देख कर ऐसा लगता था मानो जैसे पड़ोस की कोई लड़की हो."

निर्मला खन्ना, सू ची की प्रोफेसर

शायद वो देखना चाहती थीं कि मुझे कुछ आता है या नहीं. मगर सू ची ने मुझे कभी तंग नहीं किया. उनकी अंतरराष्ट्रीय मामलों में रुचि ज़रूर थी.

उनमें कुछ चमत्कारिक मैंने कभी नहीं देखा जिससे लगता की एक दिन ये ज़िन्दगी कुछ अलग सा हट कर करेंगी या फिर कभी ये भी नहीं सोचा कि कभी ये विश्व में अपनी कोई जगह बनाएंगी. उन्हें देख कर ऐसा लगता था मानो जैसे पड़ोस की कोई लड़की हो.

कॉलेज की कार्यक्रमों में हिस्सा तो वो लेती थीं लेकिन मुझे याद भी नहीं है कि वो उनमें जीतती थी भी या नहीं. आज मुझे याद आता है कि चीज़ों को जानने की उसमें खूब जिज्ञासा थी.

उन्हें सब लोग 'सूची' कहकर बुलाया करते थे. मैं भी उन्हें पुकारती थी. तब क्या पता था की एक दिन वो इतना नाम कमाएंगी.

सू ची पर गर्व

तीन वर्षों में वो कॉलेज से चली गईं जबकि मैं चालीस सालों तक पढ़ती रही. कभी उनके बारे में सोचा नहीं था. उनका कुछ अत पता भी नहीं था.

कई सालों के बाद जब समाचार पत्रों में उनकी नज़रबंदी की खबरें छपने लगीं, जब टीवी चैनलों में उनके बारे में दिखाया जाने लगा तो लोग मुझसे पूछते थे 'क्या ये वो ही लड़की है जिसे तुमने पढ़ाया था?'

जब खबरें आने लगीं तो हमें चिंता हुई क्योकि वो हमारे कॉलेज की छात्रा थीं. कॉलेज की प्रिंसिपल अक्सर मुझे बुलाकर इस पर चर्चा करती थीं.

कॉलेज के दिनों में आंग सान सू ची साधारण ही रही.

जब उन्हें नोबेल पुरुस्कार मिला तो हमें बहुत फख्र महसूस हुआ. हमें लगा कि क्या ये हमारी 'सू ची' हैं?

नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद जब उन्हें उनकी गैर हाजरी में राष्ट्रपति भवन में सम्मानित किया गया तो उस कार्यक्रम का मुझे भी न्योता आया था.

राष्ट्रपति भवन से निमंत्रण लेकर लोग कॉलेज आए थे. मगर वक़्त बहुत कम था क्योंकि कार्यक्रम में सिर्फ एक घंटा ही बचा था.

अब जबकि वो चालीस साल बाद पहली बार अपने कॉलेज आ रही हैं, मुझे फिर से न्योता मिला है.

मगर इस बार मैं चलने फिरने से मजबूर हूँ. छड़ी लेकर चलती हूँ. पैदल चला नहीं जाता है. मुझे बताया गया है कि सुरक्षा कारणों से कॉलेज में वाहन ले जाने की अनुमति नहीं है.

इतने सालों के बाद उन्हें देखने को मेरा मन तो ज़रूर कर रहा है मगर पता नहीं मैं जा पाऊँगी या नहीं. पता नहीं वो मुझे पहचानेंगी या नहीं?

(बीबीसी संवाददाता सलमान रावी के साथ बातचीत पर आधारित)

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