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फिलीपींस: क्यों पसरा है राजनीति में वंशवाद

 रविवार, 4 नवंबर, 2012 को 10:13 IST तक के समाचार

भारत की तरह ही फिलीपींस में भी है परिवारवाद का जोर.

फिलिपींस में अगले साल होने वाले चुनावों को लेकर राजनीतिक नेता एक बार फिर मैदान में हैं. लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि एक बार फिर इस फेहरिस्त में कोई नया चेहरा नहीं दिख रहा है.

भारत और पाकिस्तान की तरह यहां भी 'वंशवाद' की राजनीति हावी है.

भारत की राजनीति में जिस तरह से गांधी- नेहरू परिवार और पाकिस्तान में भुट्टो परिवार का बोलबाला है उसी तरह से फिलिपींस में भी परिवारवाद, भाई-भतीजावाद का वर्चस्व है.

इमेल्डा मार्कोस और जोसेफ एस्ट्राडा का नाम एक बार फिर उभर कर आया है. इमेल्डा मार्कोस फिलिपींस के पूर्व राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस की पत्नी हैं जबकि एस्ट्राडा खुद राष्ट्रपति रह चुके हैं. इन दोनों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं लेकिन वे राजनीतिक मैदान छोड़ने के लिए राजी नज़र नहीं आते.

इमेल्डा मार्कोस उम्र के उस पड़ाव में हैं जब संन्यास लेना बेहतर हो सकता है लेकिन वो अगले तीन साल के लिए खुद को व्यस्त करने की इच्छा रखती हैं. वैसे उनके बेटे सीनेटर हैं और बेटी प्रांतीय सरकार चलाती हैं.

दूसरी तरफ 75 वर्षीय जोसेफ एस्ट्राडा मनीला की नई मेयर बनने का ख्वाब संजो रही हैं.

'सामंतवाद' का बोलबाला

" "ये बेशक 21वीं सदी हो लेकिन सच ये है कि यहां आज भी सामंतवाद कायम है.""

मैरियट्स वितुग, राजनीतिक विशेषज्ञ

कुल मिलाकर फिलिपींस की राजनीति भाई-भतीजावाद की धुरी पर घूमती है. वहां के राजनैतिक हालात के बारे में राजनैतिक विश्वलेषक मैरियट्स वितुग कहते हैं, "ये बेशक 21वीं सदी हो लेकिन सच ये है कि यहां आज भी सामंतवाद कायम है."

भारत में जिस तरह से गांधी-नेहरू परिवार के साथ-साथ मुलायम सिंह यादव, बाल ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल, देवीलाल परिवार और शरद पवार के उदाहरण हैं, ठीक उसी तरह फिलिपींस में भी नए चुने नेता इस परिवारवाद की राजनीति को आगे लेजा रहे हैं.

ताजा उदाहरण मुक्केबाजी से राजनीति में उतरे मेन्नी पैकियाओ का है. तीन साल पहले इन्होंने कांग्रेस सीट जीती थी और अब उनकी पत्नी और भाई भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं.

लेकिन सवाल उठता है कि आखिर इस परिवारवाद की जड़ में है क्या? भारत और अमरीका की ही तरह फिलिपींस में भी उम्मीदवारी के लिए लंबा चौड़ा अभियान चलाना पड़ता है जिसके लिए मोटी रकम की जरूरत होती है और इतनी बड़ी रकम जुटा पाना सबके लिए संभव नहीं हो पाता.

पैसा बोलता है

फिलिपींस के चर्चित नेताओं में एकाध राजनेता ही ऐसे हैं जो आन परिवार से आते हैं. इसमें मैन्नी विल्लर का नाम लेना जरूरी होगा क्योंकि उनके बारे में कहा जाता है कि उनका जन्म भी एक शरणार्थी शिविर में हुआ था.

भाई-भतीजावाद का बड़ा उदाहरण है फिलीपींस का मार्कोस परिवार.

हालांकि मैन्नी मानते हैं कि फिलिपींस में पैसे से ज्यादा राजनीतिक संबंध मायने रखते हैं.

वो कहते हैं, “आप बहुत आगे जा सकते हैं लेकिन राष्ट्रपति नहीं चुने जा सकते जब तक कि किसी खास परिवार से ना हों.”

वहीं, राष्ट्रपति बेनिंग्नो एक्विनो के रिश्तेदार बैम एक्विनो भी ये मानते हैं कि सीनेट की रेस में आज वो जहां तक भी पहुंचे हैं उसमें उनके रिश्तेदार की काफी भूमिका है.

हालांकि उनकी दलील भी काफी दिलचस्प है. वो कहते है “कुछ लोगों के ही हाथों में सत्ता लंबे समय तक रहती है और कोई बड़ा नुकसान नहीं होता तो इस बात से क्या फर्क पड़ता है.”

हालांकि राजनीतिज्ञ विशेषज्ञ मैरियट्स वितुग इस प्रथा को लोकतंत्र के लिए बड़ा धक्का मानते हैं. “ये आम लोगों के राजनीति में आगे बढ़ने पर रोक लगाता है जो अमीर परिवारों से नहीं आते.”

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