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सिमट रहा है एंग्लो इंडियन समुदाय

 शनिवार, 5 जनवरी, 2013 को 08:38 IST तक के समाचार
एंग्लो इंडियन समुदाय

भारत में ब्रितानी राज को खत्म हुए 65 साल बीत गए हैं लेकिन इसकी कुछ निशानियाँ अब भी बाकी हैं.

इन्हीं में से एक है एंग्लो-इंडियन समुदाय जो पश्चिमी और भारतीय नामों, रीति रिवाजों और रंग रूप के मिले जुले लोगों का समुदाय है. हालांकि ये लोग अब सिमटते जा रहे हैं.

ब्रिटेन और भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले इस समुदाय के लगभग दो हजार लोगों का जल्द कोलकाता में समागम होने वाला है.

पश्चिमी लंदन का साउथहॉल इलाका इस मिली जुली विरासत की अच्छी मिसाल है. वहां पहला ऐस पब है जहां रुपए भी स्वीकार किए जाते हैं, रेलवे स्टेशन पर लगे साइन बोर्ड अंग्रेजी के साथ साथ पंजाबी भाषा में भी हैं और पूरे साल वहां आप सड़क किनारे खाने पीने के खोमचे, रंगबिरंगी साड़ियां और भंगड़ा संगीत का लुत्फ उठा सकते हैं.

साउथहॉल मेरा गृह नगर है और ब्रिटेन में रहने वाले भारतीयों के इस सबसे सघन इलाके में मैंने अपने जीवन के 20 साल बिताए. इस इलाके में 10 प्रतिशत अल्पसंख्यक मूल ब्रितानी निवासी हैं.

सिमटता समुदाय

मेरी मां एंग्लो-इंडियन है जिनकी परवरिश कोलकाता के पास जमशेदपुर में हुई. बाद में वो लंदन के इस 'छोटे से भारत' में आ गईं. उन्होंने वेल्स के एक व्यक्ति से शादी की जिसके बाद पैदा हुए हम भाई बहनों की त्वचा गोरी और आंखें नीली हैं.

लेकिन अब एंग्लो-इंडियन समुदाय खत्म हो रहा है. ब्रिटेन और कॉमनवेल्थ देशों में जहां 'भारतीयता' खत्म हो रही है वहीं भारत में 'एंग्लो' तत्व धूमिल हो रहा है.

क्रिस ग्रिफिथ्स के पिता वेल्स से हैं और मां एंग्लो इंडियन समुदाय से है

जब अंग्रेजों ने 1947 में भारत को अलविदा कहा तो उन्होंने वहां पश्चिमी मूल वाले मिली-जुली नस्ल के करीब तीन लाख लोगों की आबादी छोड़ी. ये लोग उस वक्त भारत नहीं छोड़ना चाहते थे.

एंग्लो-इंडियन लोगों पर दो किताबें लिखने वाली मार्गारेट डीफहॉल्ट्स का कहना है, “एंग्लो-इंडियन लोग बहुत अजीबोगरीब अस्थिरता में रह गए. उन्हें लगता है कि उनके साथ धोखा हुआ. ब्रिटेन ने कभी कोशिश नहीं की कि अपने इन बेटों को वापस उनके पूर्वजों की जमीन पर लाया जाए.”

इन लोगों ने 1950 और 1960 के दशक में उपमहाद्वीप से निकलना शुरू किया और वे कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे कॉमनवेल्थ देशों और अपनी “मातृभूमि” ब्रिटेन पहुंचने लगे.

इन लोगों में मेरी नानी, उनके छह भाई बहन और उनकी बेटी यानी मेरी मां भी शामिल थी. ये लोग लंदन और टोरंटो जाने के लिए निकले थे.

बदलते एंग्लो इंडियन

ज्यादातर एंग्लो इंडियन लोग 'इंडियन' यानी भारतीय से ज्यादा एंग्लो थे. इनमें कुछ ही लोग गेहुंए रंग के थे.

"एंग्लो-इंडियन लोग बहुत अजीबोगरीब अस्थिरता में रह गए. उन्हें लगता है कि उनके साथ धोखा हुआ. ब्रिटेन ने कभी कोशिश नही कि अपने इन बेटों को वापस उनके पूर्वजों की जमीन पर लाया जाए."

मार्गारेट डीफहॉल्ट्स, एंग्लो-इंडियन समुदाय पर किताबों की लेखक

वैसे वे अंग्रजों की तरह ही कपड़े पहनते हैं, उनकी मातृभाषा अंग्रेजी है और वे ईसाई हैं.

लेकिन डीफहॉल्ट्स बताती है कि इस समुदाय की नई पीढ़ी में पुराने रीति रिवाजों का असर कम होता जा रहा है.

ये साफ नहीं है कि भारत में अभी एंग्लो-इंडियन समुदाय के कितने लोग रहते हैं क्योंकि 1941 की जनगणना के बाद से उनकी गिनती नहीं की गई है. एक अनुमान के मुताबिक भारत में इन लोगों की संख्या लगभग सवा लाख है जिनमें से ज्यादातर कोलकाता और चेन्नई में रह रहे हैं.

लेकिन अब ये लोग भारतीयों से शादियां कर रहे हैं और उनकी संस्कृति को अपना रहे हैं. अब वो स्थानीय आबादी का हिस्सा बनते जा रहे हैं.

कोलकाता में एंग्लो-इंडियन सर्विस सोसाइटी की संजोयक फिलोमेना ईटन का कहना है, “पहले ये समुदाय बहुत अंग्रेजीदां था और अंग्रेजी परंपराओं और रीति रिवाजों का पालन करता था. लेकिन अब उन्होंने स्थानीय रीति रिवाजों, भाषा, कपड़े और सामाजिक सरोकारों को ज्यादा आत्मसात कर लिया है. आज बहुत से एंग्लो हिंदी और बांग्ला में अच्छी तरह बात कर सकते हैं.”

ये बड़ा बदलाव है क्योंकि 1947 पहले शायद ही इस समुदाय के लोग भारतीयों से शादी करते हों. लेकिन भारत की आजादी के बाद रोजगार व अन्य अवसरों के लिए उन्हें स्थानीय भाषाएं सीखनी पड़ीं.

सरकारी समर्थन की मांग

एंग्लो इंडियन समुदाय

क्रिस की नानी ने 1950 के दशक में भारत छोड़ दिया था

अब भारत में इन लोगों के लिए बेशुमार संभावनाएं हैं क्योंकि वो न सिर्फ फर्राटेदार अंग्रेजी बोल सकते हैं, बल्कि स्थानीय भाषाओं में भी दक्ष हैं.

कई लोग भारत में एंग्लो-इंडियन पहचान को संरक्षित रखना चाहते हैं. चार्ल्स डियास भारतीय संसद में एंग्लो-इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं.

वो एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए व्यापक सरकारी समर्थन की मांग करते हैं जिसमें विश्वविद्यालयों में आरक्षण, नए सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना और ताजा जाति आधारित जनगणना शामिल हैं.

अब केरल में एक विशेष वेबसाइट भी शुरू हो रही है जिसके माध्यम से एंग्लो-इंडियन समुदाय के लोग दुनिया भर में अपने समुदाय के भीतर शादी कर सकते हैं.

इस समुदाय के लोगों ने खासा नाम कमाया है. इनमें संगीत उद्योग में मद्रास में जन्मे इंगेलबर्ट हमपरडिंक, दिल्ली में जन्मे पीटर सार्सडेंट और लखनऊ में जन्मे क्लिफ रिचर्ड शामिल हैं.

मिली जुली नस्लों के माता पिता की संतानों की बात करें तो उनमें क्रिकेट नासिर हुसैन, फुटबॉलर माइकल चोपड़ा और अभिनेता बेन किंग्सले को भी एंग्लो इंडियन समुदाय का हिस्सा माना जा सकता है.

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