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एमबीए किया तो ज़रुर पर रहे खाली हाथ!

 शुक्रवार, 12 अक्तूबर, 2012 को 07:35 IST तक के समाचार
प्रबंधन कॉलेज

सपनों को पंख देने वाले संस्थानों की साख गिर रही है

भारत युवाओं की आबादी वाला देश है. यहां हर साल लाखों युवा नामचीन संस्थानों से प्रबंधन में स्नातक (एमबीए) की डिग्री हासिल कर निकलते हैं तो उन्हें एक अदद नौकरी की तलाश होती है.

लेकिन इस डिग्री के लिए लाखों खर्च करने के बाद भी इन्हें दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं.

इस महीने कैट की परीक्षा में तकरीबन 2 लाख छात्र भाग ले रहे हैं ताकि उन्हें बड़े और नामचीन बिजनेस स्कूलों में दाखिला मिल सके. जबकि हकीकत ये है कि इसमें से सिर्फ 2 प्रतिशत छात्रों का ही चयन हो पाता है.

कैट की परीक्षा में बैठने के लिए भी छात्र कोचिंग और ट्यूशन का सहारा लेते हैं.

हालांकि, इतनी कवायद और मोटी रकम खर्च करने के बावजूद इनके हाथ कुछ खास नहीं लगता.

सपना जो अक्सर सच नहीं होता

साल 2010 में बिजनेस मैनेजमेंट कोर्स में प्रवेश लेने वाले एक छात्र पवन कहते हैं कि जब उन्होंने बंगलौर के एक मझले स्तर के कॉलेज में दाखिला लिया था तो सोचा था कि दो साल बाद ही उन्हें किसी अच्छी फर्म में नौकरी मिल जाएगी वो भी एक अच्छी तनख्वाह पर.

"2010 में जब मैंने बंगलोर के एक कॉलेज में दाखिला लिया तो सोचा था कि दो साल बाद ही किसी अच्छी फर्म में नौकरी मिल जाएगी वो भी एक अच्छी तनख्वाह पर. लेकिन छह-सात महीने के बाद भी नौकरी नहीं मिली कई दफ्तरों का चक्कर लगाया, कई साक्षात्कार दिए पर नतीजा सिफर. "

पवन, एमबीए छात्र

लेकिन पवन को स्नातक हु्ए छह-सात महीने हो गए और उनके पास एक भी नौकरी नहीं थी.

इस बीच, पवन कई दफ्तरों का चक्कर लगा चुके हैं, कई साक्षात्कार दे चुके हैं लेकिन परिणाम वही 'ढाक के तीन पात' रहे.

पवन को आखिरकार अपनी तनख्वाह से काफी ज्यादा समझौता करना पड़ा और उन्हें एक छोटे बिजनेस एनलिस्ट की नौकरी मिली.

हाथ में डिग्री लेकिन जेब खाली

टाइम्स हायर एजुकेशन वर्ल्ड यूनिवर्सिटी की नई रैंकिंग में दुनिया भर के 200 कॉलेजों का नाम शामिल है लेकिन भारत का एक भी कॉलेज इसमें नहीं है.

इंफोसिस के पूर्व एचआर हेड मोहन दास पाई का कहना है कि, “25 प्रतिशत छात्र अच्छे हैं, 25 फीसदी छात्र पास कर जाने लायक हैं, 25 प्रतिशत का हाल बिल्कुल ही बुरा है”

वो कहते हैं,“मुझे काफी दुख होता है इन बच्चों को देखकर, इनके माता पिता को लेकर. लोग काफी पैसा खर्च करते हैं लेकिन ये संस्थान इन्हें कुछ नहीं दे पाते.”

पाई कहते हैं कि ये हाल इसलिए भी है क्योंकि इन संस्थानों पर सरकार का जबरदस्त कब्जा है जिसकी वजह से पाठ्यक्रम में जरूरी बदलाव भी करना नामुमकिन हो जाता है जो कि इंडस्ट्री की मांग को देखते हुए जरूरी है.

वहीं, आईआईएम बंगलौर के प्रोफेसर पंकज चंद्रा का मानना है कि, “शिक्षकों की कमी और उन्हें दिए जाने वाला कम वेतन भी इन संस्थानों के गिरते स्तर के लिए काफी जिम्मेदार है. साथ ही पढ़ाने का तरीका भी बेहद थका देने वाला होता है.”

"शिक्षकों की कमी और उन्हें दिया जाने वाला कम वेतन भी इन संस्थानों के गिरते स्तर के लिए काफी जिम्मेदार है. साथ ही पढ़ाने का तरीका भी बेहद थका देने वाला होता है."

प्रोफेसर पंकज चंद्रा, आईआईएम बैंगलोर

वैसे ज्यादातर संस्थानों में जब इन छात्रों को नौकरी पर रखा जाता है तो उन्हें कंपनी अपने हिसाब से ट्रेनिंग देती है.

जानकारों का कहना है कि जब तक शिक्षा प्रणाली सरकारी दखल से आज़ाद नहीं हो जाती तब तक इसमें किसी भी तरह के सुधार की अपेक्षा बेमानी है.

कड़वा है एमबीए का सच

एमबीए की पढाई में हर छात्र को तकरीबन 7 लाख से 15 लाख रुपये तक का खर्च उठाना होता है.

इनमें अधिकांश छात्र ऐसे होते हैं जो कर्ज़ लेकर ये पढाई करते हैं.

आप सोच सकते हैं कि नौकरी न मिलने के बाद छात्र किस तरह के तनाव को झेलते होंगे.

वित्तीय शोध संस्था ‘सीआरआईएसआईएल’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक जिस तरह से छात्रों में अच्छी शिक्षा को लेकर जागरुकता बढ़ी है, उसे देखते हुए ये कहा जा सकता है कि अगर आने वाले कुछ समय में ऐसे संस्थानों पर ताला लटका नजर आए तो कोई बड़ी बात नहीं होगी.

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