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शुक्रवार, 15 मई, 2009 को 15:26 GMT तक के समाचार
 
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मतगणना से पहले जोड-तोड़ की राजनीति तेज़
 
कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए, भाजपा के नेतृत्व में एनडीए और वामदलों वाला तीसरा मोर्चा के नेता अन्य दलों के नेताओं के साथ मुलाक़ात कर उन्हें अपने-अपने साथ जोड़ने में जुटे हैं

भारत की 15वीं लोकसभा के लिए हुए चुनावों में मतगणना से पहले विभिन्न दल और गठबंधन जोड़-तोड़ की राजनीति में जुटे हुए हैं. पर्यवेक्षकों के अनुसार खंडित जनादेश की आशंकाओं के बीच सत्ताधारी कांग्रेस, विपक्षी भारतीय जनता पार्टी और वामपंथी पार्टियों के नेताओं ने नए सहयोगियों की तलाश तेज़ कर दी है.

नतीजे आने से पहले शुक्रवार को विभिन्न पार्टियों के नेता एक दूसरे से मिले.

बसपा नेता मायावती के विश्वासपात्र सतीश मिश्र ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता प्रकाश कराट से मुलाक़ात की तो कांग्रेस नेता कमलनाथ नवीन पटनायक से मिले.

राष्ट्रीय लोक दल के नेता अजित सिंह ने भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी से मुलाकात की. सपा नेता अमर सिंह कल्याण सिंह से मिलने गए लेकिन वे घर पर नहीं थे.

बहुजन समाज पार्टी पर कई प्रमुख राष्ट्रीय दलों और गठबंधन की पैनी नज़र है और ये भी दावे किए गए हैं कि बसपा इस पार्टी या उस पार्टी के संपर्क में है. लेकिन बसपा ने इसका खंडन किया है.

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का रुख़ कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को असमंजस में रख रहा है, हालाँकि पार्टी नेता प्रफ़ुल पटेल ने कहा है कि एनसीपी यूपीए के साथ हैं. जबकि एनसीरपी के दूसरे नेता पीए संगमा यूपीए के साथ जाने से नाख़ुश हैं.

मायावती
बसपा के सतीश मिश्र ने सीपीएम नेता प्रकाश कराट से मुलाक़ात की है

उधर भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगी दल जनता दल (यूनाइटेड) ने एनडीए को सकते में ला दिया है. जनता दल (यू) के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नई सरकार को सशर्त समर्थन की बात कही है.

उधर एनडीए के लिए बुरी ख़बर लोक जनशक्ति पार्टी के रामविलास पासवान की ओर से भी आई है जिन्होंने स्पष्ट शब्दों में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को समर्थन देने से इनकार कर दिया है.

टिकाकारों की राय में चुनाव नतीजों से पहले के साथी ज़रूरी नहीं है कि बाद में भी साथ रहें क्योंकि नतीजे ये य करेंगे कि कौनसी पार्टी आगे किस दोस्ती को फ़ायदेमंद मानती है और किसे नहीं.

बसपा पर नज़र, कांग्रेस की असमंजस

बहुजन समाज पार्टी पर हर गठबंधन या मोर्चे की पैनी नज़र है और कहा जा रहा है कि ये पार्टी विभिन्न दलों के संपर्क में है, लेकिन बसपा ने इसका खंडन किया है.

शुक्रवार को बसपा के प्रवक्ता ने कहा कि उनकी 'पार्टी यूपीए या एनडीए के संपर्क में नहीं है और मीडिया में इस सिलसिले में आ रही ख़बरें निराधार और शरारतपूर्ण हैं.'

मनमोहन और आडवाणी
विभिन्न मीडिया संस्थानों के एग्ज़िट पोल ने किसी भी गठबंधन या दल को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया है

उधर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का रुख़ लगातार कांग्रेस को असमंजस में रख रहा है, हालाँकि पार्टी नेता प्रफ़ुल पटेल ने स्पष्ट कहा है कि एनसीपी यूपीए के साथ है.

लेकिन एनसीपी के दूसरे नेता पीए संगमा के यूपीए के साथ जाने से नाख़ुश हैं.

रामविलास का इनकार, नीतीश की शर्त

रामविलास पासवान
रामविलास पासवान ने भाजपा को समर्थन नहीं देने की बात कही है

दूसरी ओर एनडीए के 'भरोसेमंद साथी' जनता दल (यू) के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नई सरकार को सशर्त समर्थन की बात कर भाजपा को सकते में ला दिया है.

नीतीश ने नए चुने जाने वाले सांसदों से अपील की है कि वे उसे समर्थन दें जो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की माँग को माने.

एनडीए के लिए बुरी ख़बर ये भी है कि लोजपा नेता रामविलास पासवान ने साफ़ कहा है कि वो किसी भी स्थिति में भाजपा गठबंधन को समर्थन नही देंगे.

अमर सिंह मिले राजनाथ से

गुरुवार को समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह और भाजपा के अध्यक्ष राजनाथ सिंह से बीच एक समारोह में मुलाक़ात हुई लेकिन बाद में अमर सिंह ने कहा है कि उनकी पार्टी भाजपा को समर्थन नहीं देगी.

 राजनाथ सिंह क़रीबी दोस्त हैं. मैं उन्हें अच्छी तरह से जानता हूँ. शादी का समारोह था, मैंने एनडीए से बातचीत के दरवाज़े नहीं खोले हैं
 
अमर सिंह का स्पष्टीकरण

अमर सिंह का कहना था, "राजनाथ सिंह क़रीबी दोस्त हैं. मैं उन्हें अच्छी तरह से जानता हूँ. शादी का समारोह था, मैंने एनडीए से बातचीत के दरवाज़े नहीं खोले हैं."

तेलंगाना राष्ट्र समिति ने पहले ही एनडीए की लुधियाना रैली में शामिल होकर खलबली मचा दी थी. इस पार्टी ने चुनाव तो तीसरे मोर्चे के सहयोगी दल के तौर पर लड़ा पर अब एनडीए को समर्थन देने के बात कही है.

एआईडीएमके की नेता जयललिता पर भी सबकी नज़र है और कहा जा रहा है कि सभी दल उनसे संपर्क में हैं, लेकिन वो फ़िलहाल स्थिति स्पष्ट करने के लिए तैयार नहीं हैं.

उन्होंने पहले कहा था कि 16 मई के बाद वे अपने सहयोगियों के साथ दिल्ली में चर्चा करेंगी और फिर ही अपनी रणनीति तय करेंगी.

ग़ौरतलब है कि भारतीय चुनाव में संविधान के अनुसार नई संसद का गठन दो जून तक होना है.

 
 
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