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मंगलवार, 12 मई, 2009 को 18:58 GMT तक के समाचार
 
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'अपनों' के बीच फँसी जया प्रदा
 

 
 
जया प्रदा (फ़ाइल फ़ोटो)
आज़म-अमर की लड़ाई में फँसी में जया प्रदा
रामुपर शहर की बात यहाँ के माहौल से शुरू करता हूँ. हालाँकि इलाक़े में चुनाव प्रचार और जलसे वगैरह बंद हो चुके हैं, लेकिन शहर की हर गली में, नुक्कड़ पर, चाय की दुकानों पर और सब्ज़ी मंडी तक में हो रही है एक ही बात- आख़िर बाज़ी मारेगा कौन!

करीब साढ़े ग्यारह लाख मतदाताओं वाले इस चुनावी क्षेत्र की एक ख़ास बात है. यहाँ हिंदू और मुस्लिम दोनो ही समुदाय के लोग लगभग बराबरी की तादाद में हैं. करीब 51 फ़ीसदी हिंदू मतदाता हैं तो क़रीब 49 फ़ीसदी मुसलमान मतदाता हैं.

रामपुर निवासियों का मानना है कि 1998 के आम चुनावों से पहले यहाँ समुदाय के नाम पर ख़ासे वोट पड़ते थे. पर अब चीज़ें बदल चुकी हैं. क्योंकि अक्सर एक ही समुदाय के लोग अलग-अलग पार्टियों से मैदान में उतरते हैं.

इस बार असल लड़ाई है समाजवादी पार्टी की वर्तमान सांसद जया प्रदा और रामपुर के नवाबी घराने की बेगम और पूर्व सांसद नूर बानो में और इस मुक़ाबले को त्रिकोणीय बनाने की पुरज़ोर कोशिश में हैं भाजपा के पूर्व सांसद मुख़्तार अब्बास नक़वी.

हालांकि पिछले चुनावों में जया प्रदा ने नूर बानो को परास्त किया था, पर इस बार जया समाजवादी पार्टी के दो नेताओं रामपुर के ही आज़म ख़ान और राष्ट्रीय महासचिव अमर सिंह के बीच हो रही तनातनी से बच निकलने के लिए जूझ रही हैं.

आज़म-अमर की लड़ाई

आज़म ख़ान का कहना है की वो जया को हरवा कर ही दम लेंगे, जबकि अमर सिंह ने जया की जीत को अपनी प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया है.

समाजवादी पार्टी ने इसी के चलते रामपुर में मुलायम, अखिलेश और लालू यादव समेत संजय दत्त, डिंपल कपाड़िया, जया बच्चन और मनोज तेवारी को प्रचार में उतारा, जबकि कांग्रेस की ओर से ख़ुद सोनिया गाँधी ने रामपुर आकर लोगों से नूर बानो के लिए वोट मांगे.

भाजपा के नक़वी भी मैदान में हैं

पर जब रामपुर सीट की असल लडाई ऐसे तीन लोगों में है जो सांसद रह चुके हैं, तो फिर यहाँ की आम जनता किसे वोट दे और किन मुद्दों पर दे?

ढाबा चलने वाले रहमान कहते हैं, "देखिए पहले तो चुनाव होते थे उसकी किसी को ख़बर भी नहीं लगती थी. लेकिन इस बार रामपुर के इलेक्शन पर सारे देश की नज़र है. और रहा सवाल मुद्दों का तो यहाँ न पहले कोई था और न ही अब है. हाँ ये ज़रूर है की आज़म, जया और अमर की लड़ाई में रामपुर वाले ज़रूर पिस रहे हैं."

पर दिन भर शहर का मोटे तौर पर मुआयना करने के बाद एक दूसरा ही एहसास हुआ. रामपुर पहुँचने से पहले ऐसा लग रहा था की यहाँ के चुनावों में कांग्रेस को फ़ायदा हो रहा है क्योंकि आज़म खान की बदौलत जो मुस्लिम मत जया प्रदा या समाजवादी पार्टी को मिल रहे थे वो बेगम की तरफ खिसक जाएंगे.

पर पूरी तरह इस बात को कहना अभी ग़लत होगा क्योंकि काफी मुस्लिम मतदाता ऐसे भी लगे जो कट्टर समाजवादी पार्टी समर्थक हैं, न की आज़म खान के.

नक़वी भी होड़ में

समाजवादी पार्टी के साथ कल्याण सिंह के जुड़ने से उसे संभावित नुकसान की चर्चा तो चल रही है लेकिन ये पूरी तरह सही नहीं है क्योंकि रामपुर में लोध जाति के भी करीब अस्सी हज़ार से ऊपर वोट हैं जिसका प्रतिनिधित्व कल्याण सिंह करते हैं.

ये भी नहीं भूलना चाहिए की भाजपा के उमीदवार नक़वी भी दौड़ में हैं और उनमें हिंदू-मुसलमान दोनों समुदाय के वोटों को काटने की क्षमता भी दिखाई पड़ती है.

अंत में ज़िक्र बसपा की नेता और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का भी जो अपने सवा लाख से भी ज्यादा दलित वोटों के चलते बसपा उमीदवार घनश्याम सिंह लोध को भी मज़बूत मान रही हैं.

कुल मिलाकर रामपुर लोकसभा सीट को लेकर तस्वीर अभी भी साफ़ नहीं है और इस सस्पेंस का 16 मई को ही पर्दाफ़ाश होगा.

 
 
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