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रविवार, 19 अप्रैल, 2009 को 10:15 GMT तक के समाचार
 
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हाजीपुर-समस्तीपुर के असमान विकास का हाल
 
अभिषेक और प्रीति
प्रिती और अभिषेक समस्तीपुर और हाजीपुर की ज़मीनी सूरतेहाल को बयान कर रहे हैं

भारत में असंतुलित विकास की बात हमेशा से होती रही है लेकिन बिहार में यह बिल्कुल स्पष्ट दिखता है. बीबीसी संवाददाता आलोक कुमार ने ऐसे ही दो क्षेत्रों का दौरा किया और वहीं के युवा वर्ग से जानना चाहा इस का कारण.

पटना से सटा हाजीपुर बिहार के सबसे उन्नत इलाक़ों में गिना जाता है. केंद्रीय इस्पात मंत्री रामविलास पासवान का यह क्षेत्र औद्योगिक नगरी के रुप में पहचान बना चुका है. केला उद्योग के अलावा यहां विकास के कई कार्य हुए हैं.

बिहार का ही समस्तीपुर हाजीपुर से बहुत दूर नहीं है. एक ज़माने में गन्ना उत्पादन के लिए मशहूर समस्तीपुर की सारी चीनी मिलें बंद हो चुकी हैं. लोगों का कहना है कि सड़क निर्माण को छोड़ दें तो विकास बिल्कुल नहीं हुआ है.

दिलचस्प तथ्य यह है कि समस्तीपुर से रामविलास पासवान के भाई रामंद्र पासवान चुनाव मैदान में हैं. दोनों क्षेत्रों में 23 अप्रैल को मतदान होना है.

बीबीसी ने इन दोनों क्षेत्रों के एक-एक युवा से जानना चाहा कि इन दोनों इलाक़ों में असमान विकास के क्या कारण है.

अभिषेक, उम्र-23 वर्ष, छात्र, हाजीपुर

अभिषेक
अभिषेक होटल मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट के छात्र हैं

मैं यहाँ होटल मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में पढ़ता हूं जो आपके सामने है. पांच साल पहले यहां खेत था और हाईवे के पास होने कारण एक कोने में ढाबा बना हुआ था.

इसके बनने के बाद हमारे जैसे छात्रों को होटल मैनेजमेंट करने के लिए कहीं और बाहर जाने की ज़रूरत नहीं रही. हमें एक महीने की ट्रेनिंग के लिए भेजा जाएगा और नौकरी मिलने में उम्मीद है.

इस संस्थान को खोलने का श्रेय राम विलास पासवान को जाता है. यही नहीं उन्होंने और भी कई काम कराए हैं. इसका फ़ायदा उनको चुनाव में मिल सकता है.

लेकिन ये भी सच है कि जितने दिनों से रामविलास यहां से चुनाव लड़ रहे हैं, उस हिसाब से उन्होंने बहुत ज़्यादा काम नहीं किया.

फैक्ट बॉक्स, वैशाली ज़िला
कुल जनसंख्या – 21 लाख 46 हज़ार
जनसंख्या घनत्व – 1054 प्रति वर्ग किलोमीटर
साक्षरता – 41 प्रतिशत
अस्पताल- 54
सिनेमाघर - 7

हाँ, रेलवे का ज़ोनल ऑफ़िस खोलना उनकी बड़ी उपलब्धि रही है. मुझे लगता है उनके केंद्र में लगातार मंत्री बने रहने से हाजीपुर लाभान्वित हुआ है. हमें याद आता है कि 1989 से ही मंत्री बनते आ रहे हैं.

जब रेल मंत्री थे तो हाजीपुर पर ध्यान दिया, बरौनी तक बड़ी लाइन बनाने के प्रयास किए.

इस सरकार में जब रसायन मंत्री थे तो उन्होंने हाजीपुर में नाइपर (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़र्मास्यूटिकल रिसर्च) की स्थापना की जहां हाजीपुर ही नहीं बल्कि देश भर के बच्चे पढ़ने आते हैं.

एक प्लास्टिक कारखाना भी खुला है. वहां कम से कम लोगों को रोज़गार तो मिलेगा. जो नहीं पढ़े लिखे हैं उनके लिए भी वहां काम करने की गुंजाइश है.

इस्पात मंत्री बने तो अभी कुछ दिन पहले उन्होंने महनार ब्लॉक में स्टील कारखाना बनाने की घोषणा की है. सेल का संयंत्र यहां लगेगा. बातइए, इससे हाजीपुर की पहचान तो कामय होगी ही.

किसानों के लिए बीज प्रसंस्करण की व्यवस्था हुई है. तो कुल मिलाकर काम तो हुआ. लेकिन जितने दिन से वो यहां सांसद हैं, उसके हिसाब से देखें तो ये सब बड़ा काम नहीं लगता है.

जहां तक पिछले तीन साल को देखने की बात है तो विकास के मामले में नीतीश कुमार ने भी प्रयास किया ही है. सड़कें बनवाने का श्रेय तो उन्हीं को जाता है. लेकिन छात्र होने के नाते मैं बता दूँ बिजली की हालत ख़राब है. गंव की सड़कें जर्जर हैं और गांव का वोटर ही चुनाव में मायने रखता है.

प्रीति, उंम्र-21 वर्ष, इंजीनियरिंग छात्र, समस्तीपुर

प्रीति
प्रीति गोरखपुर में इंजीनियरिंग की छात्रा हैं

देखिए, अगर आप हाजीपुर से तुलना करेंगे तो भौगोलिक कारण जो भी हो लेकिन ये तय है कि समस्तीपुर में राम विलास पासवान के क़द का कोई नेता नहीं होना यहां का दुर्भाग्य है.

कोई भी नेता यहां से लगातार चुनाव नहीं लड़ता है. आज यहां-कल वहां, तो विकास पर ध्यान कैसे रहेगा.

यहां सबसे बड़ी कमी तो उच्च शिक्षा का स्तरीय होना नहीं है. मैं ख़ुद गोरखपुर के कॉलेज में पढ़ती हूं. लगभग यहां के 95 फ़ीसदी लोग यहां से बाहर जाते हैं पढ़ने के लिए.

फ़ैक्ट बॉक्स, समस्तीपुर ज़िला
आबादी – 27 लाख 17 हज़ार
घनत्व – 936 प्रति किलोमीटर
साक्षरता – 36 प्रतिशत
अस्पताल – कोई नहीं
सिनेमाघर - 9

पिछले पांच वर्षों में देखें तो सड़कें तेज़ी से बनी है. गांवों में भी ऐसा हो रहा है. इस मामले में ठीक है लेकिन ये यहां के नेता नहीं कर रहे हैं. देखिए यहां से सांसद आलोक मेहता हैं लेकिन इस बार वो उजियारपुर से लड़ रहे हैं. उन्होंने ख़ुद क्या किया, जो हुआ वो राज्य सरकार की ओर से हुआ है.

इस ज़िले की पहचान गन्ने की खेती से होती थी. आज लगभग 75 फ़ीसदी किसान गन्ने की खेती छोड़ चुके हैं. बंद मिलों के कर्मचारी वेतन के लिए तरस रहे हैं.

मैं बता दूँ शहर से थोड़ी ही दूरी पर अशोक पेपर मिल हुआ करता था जो एशिया भर में प्रसिद्ध था. मेरे पापा ने बताया कि ये मिल लगभग 20 साल पहले बंद हो गया और वहां अब कुछ भी नहीं बचा. यही हाल ठाकुर पेपर मिल का हुआ.

इसलिए मैं तो यही अपील करुंगी जनता वोट डालने से पहले ये सोचें कि जातीयता को छोड़ कर वैसे नेता को वोट दें जो विकास के लिए काम करे.

 
 
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