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बुधवार, 15 अप्रैल, 2009 को 12:02 GMT तक के समाचार
 
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पूर्वांचल में हाशिए पर रहा विकास का मुद्दा
 

 
 
सपा का चुनाव प्रचार
पिछले लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को पूर्वांचल की 16 में से सात सीटें मिली थीं
उत्तर प्रदेश में 16 अप्रैल को होने वाले पहले चरण के मतदान में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के मुरली मनोहर जोशी, उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य, केंद्रीय मंत्री महाबीर प्रसाद, योगी आदित्यनाथ और अकबर अहमद डंपी जैसे कद्दावर नेताओं के भाग्य का फ़ैसला होगा.

भोजपुरी बोले जाने वाले इस इलाक़े में राजनीति और अपराध एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. शायद इसलिए क़रीब दर्जनभर बाहुबली यहाँ के अलग-अलग क्षेत्रों में अपना भाग्य आज़मा रहे हैं.

बाहुबलियों का बोलबाला

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने जहाँ अफ़जाल असंरी और मुख़्तार अंसारी को गाज़ीपुर और बनारस से टिकट दिया है तो भाजपा ने रमाकांत यादव को आज़मगढ़ से प्रत्याशी बनाया है. कांग्रेस की तरफ़ से भोला पांडेय सलेमपुर से चुनाव लड़ रहे हैं.

समाजवादी पार्टी (सपा) ने 2004 के लोकसभा चुनाव में 16 में से सात सीटें जीती थीं जबकि बसपा को पाँच सीटें मिली थीं. जबकि भाजपा और कांग्रेस के हिस्से में दो-दो सीटें आई थीं.

विधानसभा के लिए 2007 में हुए चुनाव में बसपा ने यहाँ की 81 में से 41 सीटें जीती थीं जबकि सपा को सिर्फ़ 24 और भाजपा मात्र 14 सीटों से संतोष करना पड़ा था. वहीं कांग्रेस के खाते में सिर्फ़ दो सीटें आई थीं.

बसपा अपने दलित-ब्राह्मण समीकरण पर फिर भरोसा कर रही है हालांकि कुछ ही दिन पहले ही हुए भदोही विधानसभा के उपचुनाव में ब्राह्मणों ने मायवती का साथ नहीं दिया था. इसलिए बसपा वहां से चुनाव हार गई थी.

इस बार उनकी कोशिश ब्राह्मण-दलित गठजोड़ को दोबारा पटरी पर लाने की है जिससे 2007 की तरह ही मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग उनकी तरफ आकर्षित हो. वहीं दूसरी ओर मुलायम सिंह, कल्याण सिंह से अपनी नई दोस्ती के बाद भी मुस्लिम समर्थन को बरक़रार रखने की जद्दोजहद कर रहे हैं.

जीत के समीकरण

आज हर गठबंधन केंद्र में सरकार बनाने के सपने देख रहा है. इसके लिए वे अपना वोट बैंक बरकरार रखने की कोशिश के साथ-साथ अपने प्रतिद्वंदियों के परंपरागत वोट बैंक भी अपनी तरफ खींचने की कोशिश में हैं.

चुनाव प्रचार के दौरान आम आदमी से जुड़े मद्दों को छूने की कोशिश नहीं हुई. मुद्दों के अभाव में सभी राजनीतिक दल स्थानीय मुद्दों पर जाति समीकरणों को लेकर जीत का एक समीकरण बैठाने की कोशिश कर रहे हैं.

एक बात और कि उत्तर प्रदेश के अन्य इलाक़ों की तरह राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस यहां पूरी तरह हाशिए पर नहीं हैं. पहले की तुलना में वे अपनी स्थिति हर हालत में बेहतर करने जा रहे हैं.

राजनीतिक रूप से परिपक्व होने के बाद भी यहाँ की किसी भी सीट पर विकास मुद्दा नहीं है. जाति और धर्म अभी भी वोट पाने या काटने के सबसे बड़े औजार बने हुए हैं.

 
 
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