दंगे और फ़र्ज़ी मुठभेड़ों के दाग़ छूटेंगे?

  • 4 सितंबर 2014

नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं तो अमित शाह केंद्र की एनडीए सरकार के सबसे बड़े दल भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष. ये कहना शायद ग़लत नहीं होगा कि मौजूदा समय में ये दोनों देश के सबसे ज़्यादा शक्तिशाली व्यक्ति हैं.

लेकिन बावजूद इसके इनके दामन पर गुजरात दंगे और फ़र्ज़ी मुठभेड़ के ऐसे दाग़ हैं जिन्हें मिटाना शायद आसान नहीं है.

हालांकि एक बड़ा सवाल ये भी है कि ऐसे में इन मामलों का अब क्या होगा? क्या न्यायालय और पुलिस मोदी और अमित शाह के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई कर पाएगी?

उन लोगों की उम्मीदों का क्या होगा, जो सालों से न्याय की आस में गुजरात प्रशासन के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे हैं. इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद पहुंचे गुजरात की राजधानी अहमदाबाद.

ज़ुबैर अहमद की ग्राउंड रिपोर्ट, विस्तार से

अहमदाबाद के एक पुराने इलाक़े के एक बड़े हॉल में कई लोग एक समारोह में शामिल हैं जिनमें से अधिकतर उन लोगों के जानने वाले या रिश्तेदार हैं जिनकी गुजरात पुलिस द्वारा फ़र्ज़ी मुठभेड़ में हत्या कर दी गई थी. कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनके रिश्तेदार 2002 के दंगों में मारे गए थे.

जन संघर्ष मंच नामक संस्था ने अपने संस्थापक मुकुल सिन्हा की याद में इस समारोह का आयोजन किया था. मुकुल सिन्हा की मृत्यु नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के शपथग्रहण समारोह के एक दिन पहले हुई थी.

मुकुल सिन्हा की याद में समारोह का आयोजन प्रतीक है कि नरेंद्र मोदी के काल में हुए फ़र्ज़ी मुड़भेड़ और दंगों के पीड़ितों के लिए उनके द्वारा शुरु किया गया संघर्ष उनकी मौत के बाद भी जारी है.

मंच के वकील शमशाद पठान कहते हैं, "मुकुल सिन्हा ने गुजरात सरकार द्वारा हुए अत्याचार के ख़िलाफ़ जो संघर्ष छेड़ा था उसे जन संघर्ष मंच ने जारी रखा है."

जारी है संघर्ष

पठान आगे कहते हैं, "मुकुल भाई हमेशा कहा करते थे कि ये लड़ाई इंसानियत के दुश्मनों के ख़िलाफ़ है और हम उसी रोशनी में इस लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं."

जन संघर्ष मंच के वकील शमशाद पठान मुकुल सिन्हा की लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं.

अनवर शेख़ एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और दंगा पीड़ितों के अधिकार के लिए लड़ते रहे हैं. वो कहते हैं, "मोदी जी किसी भी पोस्ट पर बैठे हों 2002 के दंगे उनका पीछा नहीं छोड़ेंगे. ऐसा कोई साबुन नहीं बना है जिससे दंगों का दाग़ धुल जाए."

भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह के ख़िलाफ़ मुंबई में 'सोहराबुद्दीन फ़र्ज़ी मुड़भेड़' के मामले में हत्या का मुक़दमा चल रहा है. इस केस में वो 2010 में तीन महीने के लिए जेल भी गए और अब ज़मानत पर रिहा हैं. इस सन्दर्भ में उन्हें दो साल तक गुजरात में प्रवेश करने की इजाज़त नहीं दी गई थी.

सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन भी इस समारोह में शामिल होने के लिए अपने राज्य मध्यप्रदेश से आए हुए हैं. उनका कहना है कि बीजेपी सरकार अमित शाह को बचाने कि कोशिश में लगी है.

अमित शाह पर सवाल

वो कहते हैं, "दुनिया तो देखी नहीं मैंने लेकिन भारत देखा है और इस देश के अंदर कभी ऐसा नहीं हुआ है कि किसी के ख़िलाफ़ हत्या का मुक़दमा चल रहा हो और उसे पूरी पार्टी ही सौंप दी जाए. उन्हें बचाने के लिए उन्हें बड़ा आदमी बनाया गया है."

रुबाबुद्दीन अमित शाह को भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने से हैरत में हैं.

न्याय प्रणाली पर विश्वास के साथ रुबाबुद्दीन कहते हैं, "हम अपनी लड़ाई जारी रखेंगे."

फ़र्ज़ी मुड़भेड़ में मारे गए सादिक़ जमाल के भाई शब्बीर भावनगर से इस समारोह में भाग लेने आए थे. उनके अनुसार "गुजरात पुलिस ने मेरे भाई को लश्कर-ए-तोएबा का आतंकवादी कहकर मारा था. बाद में अदालत में सरकार ने माना कि मेरे भाई की हत्या एक फ़र्ज़ी मुड़भेड़ में हुई थी."

वो कहते हैं आतंकवादी कहे जाने वाला मेरा भाई देश प्रेमी था. "शायद इसीलिए इस साल 15 अगस्त को मेरा एक लड़का पैदा हुआ है. मेरा भाई ज़िंदा होता तो काफ़ी गर्व महसूस करता."

शब्बीर को ऐतराज़ इस बात पर है कि कई अभियुक्तों को जेल से रिहा किया जा रहा है. कोडनानी को छोड़ दिया. अभय चुडासमा को रिहा कर दिया गया है जिससे उन्हें डर है कि फ़र्ज़ी मुठभेड़ के मुक़दमों पर असर पड़ सकता है.

मुक़दमों पर पड़ेगा असर

शब्बीर उत्तेजित होकर कहते हैं, "मेरा कहना है कि अगर आपको सभी को छोड़ना है तो एक-एक करके क्यों छोड़ा जा रहा है. पूरा साबरमती जेल क्यों नहीं ख़ाली कर देते?"

अनवर शेख़ कहते हैं, "जहाँ मोदी के कहे बिना पत्ता भी नहीं हिलता था और ऐसे माहौल में जब अगर कोई अफ़सर बिना कोई आदेश के इतनी बड़ी कार्रवाई करता है तो ये किसी के समझ के बाहर है."

"जहाँ सुशासन और मोदी के कमांड की बात थी तो सारी बातें जब मोदी के नॉलेज में होती थीं तो फ़र्ज़ी मुड़भेड़ क्यों नहीं होते थे? ये आज भी मेरे दिमाग़ में एक सवाल बना हुआ है."

आम धारणा ये बनाई गई है कि नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों के एहसान जाफ़री हत्या मामले में क्लीन चिट दे दी गई है. लेकिन इसके विपरीत ये मुक़दमा अभी केवल गुजरात की निचली अदालत में है जिसकी मदद के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक विशेष जांच दल का गठन ये जानने के लिए किया था कि मोदी का दंगों में हाथ था या नहीं?

नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दरअसल इस विशेष जांच दल ने दी है. अब निचली अदालत को इस दल के क्लीन चिट को देखते हुए मोदी के ख़िलाफ़ लगाए गए इल्ज़ामों पर फ़ैसला सुनाना है.

अगर 2002 के दंगों में कांग्रेस नेता एहसान जाफ़री की हत्या वाले मामले में उनकी विधवा ज़किया जाफ़री निचली अदालत के आने वाले फ़ैसले से संतुष्ट न हुईं तो वो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जा सकती हैं.

मोदी विरोधी और गुजरात के पूर्व पुलिस चीफ़ आरबी श्रीकुमार कहते हैं, "इन दिनों मोदी के बारे में एक यूफ़ोरिया है. हिन्दू लोग समझते हैं कि वो एक हिन्दू धर्मरक्षक हैं. इस सूरत में अगर अच्छे न्यायाधीश भी हों तो वो अनिच्छुक होंगे मोदी के ख़िलाफ़ जाने में क्यूंकि इसके चलते वो सामाजिक बहिष्कार का सामना कर सकते हैं."

श्रीकुमार कहते हैं, "मोदी का विरोध करने वालों का ख़ुद परिवार के अंदर भी बहिष्कार हो सकता है जैसा कि मेरे साथ हो रहा है. मैंने मोदी को चैलेंज किया है और मेरे ही परिवार में इसके चलते मेरा सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया है."

मोदी पर 15 इलज़ाम

नरेंद्र मोदी का विरोध करने पर गुजरात के पूर्व पुलिस प्रमुख आरबी श्रीकुमार को अपने ही परिवार के बहिष्कार का सामना करना पड़ा.

अब तक ये देखा गया है कि गुजरात की निचली अदालतों के फ़ैसले अक्सर गुजरात सरकार के हक़ में जाते हैं. और हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले निचली अदालतों के फ़ैसलों को रद्द कर देते हैं. गुजरात फ़र्ज़ी मुड़भेड़ मुक़दमों में ऐसा ही रुझान देखा गया है.

ज़किया जाफ़री ने नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ 15 इलज़ाम लगाए हैं जिनमें 2002 के दंगों के दौरान अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसाइटी में 68 लोगों की हत्या और 58 लोगों के ख़िलाफ़ साज़िश रचने का इलज़ाम ख़ास है. एहसान जाफ़री इसी हत्या काण्ड में मारे गए थे.

इस साल के आम चुनाव से पहले तक नरेंद्र मोदी और अमित शाह गुजरात के बेताज बादशाह थे अब वो भारत के शक्तिशाली व्यक्ति हैं. तो उनके ख़िलाफ़ अदलतों में चल रहे मुक़दमों का अब क्या होगा? इसका फ़ैसला अदालत पर है. लेकिन इन सभी मुक़दमों में मोदी और शाह ने कहा है उनके ख़िलाफ़ लगे इलज़ाम ग़लत हैं.

शमशाद पठान कहते हैं कि मुश्किल ज़रूर है लेकिन वे ये जानते हैं कि सरकार अलग है और प्रशासन अलग. वे कहते हैं, "हम मानते हैं कि हमारा लोकशाही का ढांचा मज़बूत है. एक दो लोगों के सत्ता में आ जाने से लोकशाही का ढांचा गिरेगा नहीं."

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