गूगल मैप से क्यों नाराज़ है सर्वे ऑफ़ इंडिया?

  • 14 अगस्त 2014

सीबीआई गूगल पर लगे मैप के ज़रिए संवेदनशील जानकारियां सार्वजनिक होने के आरोपों की जांच कर रही है.

भारतीय सर्वेक्षण विभाग का आरोप है कि ‘पिछले साल हुए गूगल के कार्यक्रम ‘मैपथॉन’ में लोगों से मैप पर जानकारियां डालने को कहा गया, जिससे कई संवेदनशील इलाकों की जानकारियां भी सार्वजनिक हो गई.’

सीबीआई की एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया कि भारतीय सर्वेक्षण विभाग के आरोप हैं कि गूगल ने संवेदनशील इलाक़ों की जानकारियां जुटाईं और उन्हें बग़ैर अनुमति के अमरीकी सर्वरों पर भेजा.

भारतीय सर्वेक्षण विभाग का कहना है कि गूगल को ऐसा करने से मना करना के बावजूद कंपनी नहीं रुकी.

गूगल का जवाब

गूगल ने बीबीसी हिन्दी को भेजे एक ईमेल में लिखा, “हम राष्ट्रीय सुरक्षा और क़ानून को काफ़ी गंभीरता से लेते हैं और संबंधित अधिकारियों के संपर्क में हैं. हम सीबीआई की जांच में पूरा सहयोग कर रहे हैं और उनके सवालों का लगातार जवाब दे रहे हैं.”

समाचार एजेंसी पीटीआई को हाल ही में दिए एक बयान में भारत के महासर्वेक्षक स्वर्ण सुब्बा राव ने कहा कि गूगल ने इंटरनेट को संवेदनशील जानकारियों से ‘प्रदूषित’ कर दिया है.

उनका आरोप है कि गूगल ने मानचित्रों से संबंधित भारतीय क़ानूनों का उल्लंघन किया है.

गूगल अकेली कंपनी नहीं है जो डिजिटल मैप तैयार करती है.

कई अन्य कंपनिया हैं, जो डिजिटल मैप पर काम करती है, उनका दावा है कि वो संवेनशील जगहों की जानकारी सार्वजनिक करने से परहेज़ करती है.

मैप माई इंडिया के निदेशक राकेश वर्मा ने बीबीसी को बताया कि सैटेलाइट से मैप बना देने और प्रत्यक्ष सर्वे से मैपिंग में काफ़ी अंतर है.

उन्होंने कहा, “खुद जाकर सर्वेक्षण करने का एक फ़ायदा होता है कि संरक्षित जगहों के बारे में पता चल जाता है और बाकी कॉमन सेंस है कि आप ऐसे जगहों को मैप पर खुले तौर पर न दिखाए. सैटेलाइट से देखने पर ये सब पता नहीं चल पाता. लोग जैसी जानकारी देते हैं वो दर्ज़ हो जाती है.”

क्या हैं मानचित्रों से संबंधित क़ानून?

साइबर क़ानून विशेषज्ञ पवन दुग्गल के अनुसार, भारत में मानचित्रों को लेकर अलग क़ानून हैं और जब बात डिजिटल मानचित्रों की होती है तो आईटी कानून भी लागू हो जाता है.

उन्होंने कहा, “जब कोई कंपनी मैप संबंधी जानकारी ऑनलाइन मांगती है या वेबसाइट पर छापती है तो वो भारतीय क़ानून की नज़रों में बिचौलियों की भूमिका में होती है.”

“कंपनी संवेदनशील जानकारियों को ऑनलाइन छापने से पहले उनकी जांच करने को बाध्य हैं. कानून के तहत ऐसी कोई जानकारी नहीं छापी जानी चाहिए जिससे देश की अखंडता, संप्रभुता और सुरक्षा खतरे में पड़े.”

जानकारों की माने तो गूगल और भारतीय सर्वेक्षण विभाग के बीच का ये मामला लंबा खिच सकता है और काफ़ी कुछ निर्भर करेगा उन सबूतों पर, जो सीबीआई जुटाने की कोशिश कर रही है.

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