यूपीएससी सी सैट: 'विवाद तो होना ही था'

  • 10 अगस्त 2014
यूपीएसकी इमारत

संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं को लेकर उठा विवाद नया नहीं है और ऐसा होना ही था.

वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय का कहना है कि शासक और शासित की भाषाएं हमेशा ही अलग रही हैं और इसे लेकर मजबूरी में ही रही हो, स्वीकार्यता भी रही है.

लेकिन आज़ादी के बाद बदले माहौल और बदली पीढ़ी अब इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रही है और अब यह मुद्दा हिंदी बनाम अंग्रेज़ी नहीं अंग्रेज़ी बनाम भारतीय भाषा बन गया है.

सवाल यह भी है कि इस मुद्दे पर क्या सरकारी कार्रवाई उचित और पर्याप्त है. तो इसका जवाब है- नहीं.

पढ़ें: अपने ही मक़सद में रोड़ा बन गया सीसैट?

पढ़िए मधुकर उपाध्याय का पूरा विश्लेषण

भारतीय प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षाओं को लेकर संघ लोक सेवा आयोग और सरकार के सामने जो मामला दरपेश है, वह नया नहीं है. वह न केवल पुराना है बल्कि उतना पुरातन है जितनी हमारी शासन व्यवस्था.

सवाल जो तब था अब भी वही है कि क्या शासक और शासित की भाषा एक हो सकती है या उसे अनिवार्यतः अलग होना चाहिए?

बहुत पहले जब सारा राजकाज संस्कृत में होता था तो गंवईं, गांवों और सड़कों, बाज़ारों में कुछ और ही ज़ुबान बोली जाती थी.

यूपीएससी आंदोलन

मुग़लकाल में सारे लोग अरबी या फ़ारसी नहीं बोलते थे. अंग्रेज़ों के ज़माने में सिर्फ़ हुकूमत अंग्रेज़ी से चलती थी, ज़िंदगी नहीं.

ऐसा ग़ालिबन नहीं होगा कि उस दौर में हुकूमत की ज़ुबान को लेकर लोगों को शिकायतें नहीं रही होंगी. ख़ासकर अदालती ज़ुबान से, पर करते क्या? अपना विरोध ज़ाहिर करना शायद संभव नहीं था.

पत्थर की लकीर

कुछ आदत और कुछ डर से लोग चुप रह गए. यह ख़ामोशी इतने लंबे अरसे तक रही कि ख़ुद में तहरीर बन गई- पत्थर की लकीर. उसे न तोड़ा जा सकता था, न बदला.

वर्तमान स्थिति इसी मानसिकता से, आज़ादी के बाद हासिल खुलेपन, का टकराव है.

ऐसी सोच जो शासकों में शामिल होने का दावा पेश करती है और नहीं मानती कि शासक की भाषा शासित से अलग होनी चाहिए. यह नहीं स्वीकार करती कि भाषा तय करने का अधिकार शासक को होना चाहिए.

शासकों और अधिकारियों की मौजूदा खेप को यह गवारा नहीं है. यह उसकी श्रेष्ठता की मानसिकता को चुनौती है, जिसे वह स्वीकार नहीं कर सकती- ख़ारिज करना चाहती है कभी सख़्ती से तो कभी मज़ाक उड़ाकर.

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यही मानसिकता प्रशासनिक सेवा की परीक्षाओं में पूछे जाने वाले सवालों को भाषा विवाद और अंग्रेज़ी-हिंदी टकराव में तब्दील करना चाहती है जबकि असल मुद्दा यह है ही नहीं.

सरकार का अग्निशमन दस्ता

भाषा कोई भी हो अगर वह आपकी मादरी ज़ुबान नहीं है तो अर्जित ही होगी. उसे अर्जित करने की कोई उम्र निर्धारित नहीं है. नई भाषा कभी भी सीखी जा सकती है, बशर्ते इच्छा हो.

भारतीय विदेश सेवा के चुने हुए अधिकारी आज तक यही करते हैं.

प्रशासनिक सेवा में सर्वश्रेष्ठ पाए गए ये लोग नौकरी पाने के बाद एक विदेशी भाषा चुनते हैं, सीखते हैं और उसमें महारत हासिल करते हैं.

यही तर्क प्रशासनिक सेवा पर क्यों नहीं लागू किया जा सकता? अंग्रेज़ी को उस अर्जित भाषा के खांचे में क्यों नहीं डाला जा सकता?

पढ़ें: सी-सैट विवाद में कब क्या

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प्रशासनिक सेवा से जुड़ा ताज़ा विवाद संघ लोक सेवा आयोग का खड़ा किया हुआ है और सरकार उसके स्थायी समाधान की जगह, जहां आग लगे वहां पानी डालना चाहती है बस.

सरकार जो कर रही है वह अग्निशमन दस्ते वाला काम है.

भाषा आंदोलन

अंग्रेज़ी के हामी शासक वर्ग का यह सवाल पहली नज़र में वाजिब लगता है कि दुनिया में कहीं भी परीक्षार्थी तय नहीं करते कि उनका प्रश्नपत्र कैसे बनाया जाए.

वैसे उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि किसी और देश में सरकारी तौर पर मान्य 22 भाषाएं नहीं हैं, उपभाषाएं और बोलियां तो छोड़ ही दीजिए. इसे लेकर विवाद होना था और देर-सबेर उसे भाषा आंदोलन भी बनना था.

जिस देश में राज्यों का गठन भाषा के आधार पर हुआ हो और भाषा इतना संवेदनशील मुद्दा हो यह बहुत समय तक हिंदी का आंदोलन नहीं रह सकता था.

आख़िर देश की दूसरी मान्य भाषाओं ने क्या गुनाह किया है कि जो सुविधा हिंदी भाषियों को दी जा रही है वह उन्हें हासिल न हो.

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एक तरह से देखें कि जो परीक्षा व्यवस्था पहले अंग्रेज़ी की ओर झुकी हुई थी अब बदलाव के बाद उसका झुकाव हिंदी की ओर हो गया है.

इस स्थिति में हिंदी छात्रों के पास हर सवाल समझने के दो विकल्प होंगे जो अन्य भाषाओं के छात्रों के पास नहीं होंगे.

लंबी प्रक्रिया

सरकार ने इस सवाल और छात्र आंदोलन को शांत करने के लिए जो क़दम उठाए हैं वह यकीनन केवल तात्कालिक और अपर्याप्त हैं.

सरकार का यह तर्क स्वीकार किया जा सकता है कि पूरी परीक्षा प्रणाली में बदलाव के लिए समय चाहिए और आसन्न परीक्षा को देखते हुए यह संभव नहीं है.

लेकिन साथ ही इस बात पर गंभीरता से विचार ज़रूरी है कि सदियों से चली आ रही शासक, शासित भाषा व्यवस्था तोड़ना कितना आसान या कठिन होगा.

समाज और देश इसके लिए कितना तैयार है कि वह दोनों वर्गों की भाषा को एक कर दे. या फिर वर्तमान हाकिम बीच का कोई रास्ता निकाल लेंगे जो सबको मंज़ूर हो.

यह प्रक्रिया जब भी शुरू हो और जितनी भी चले, काफ़ी लंबी होगी और इसमें बहुत वक़्त लगेगा.

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