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अमित शाह: सब पर भारी वफ़ादारी?

 शुक्रवार, 11 जुलाई, 2014 को 12:02 IST तक के समाचार
अमित शाह, नरेंद्र मोदी

भारतीय जनता पार्टी महासचिव अमित शाह पार्टी के अध्यक्ष बन गए हैं. पार्टी के पूर्व अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी भाजपा को “पार्टी विद अ डिफ़रेंस” बुलाते थे. उनका कहना रहा है कि भाजपा चमचों की पार्टी नहीं है.

क्या अब भी भाजपा वैसी ही है? क्या भाजपा जी हुज़ूरी करने वालों की पार्टी बन गई है?

वरिष्ठ पत्रकार आकार पटेल के मुताबिक अमित शाह उतने विलक्षण नहीं हैं जितना उन्हें बताया जाता है, बल्कि अमित शाह आज जहां हैं उसके पीछे सिर्फ़ उनकी मोदी के प्रति वफ़ादारी है.

आकार पटेल का पूरा विश्लेषण आगे पढ़ें

अमित शाह के भाजपा अध्यक्ष बनने के साथ ही पार्टी और सरकार पर नरेंद्र मोदी की पकड़ पूरी हो गई है.

भारत की सबसे बड़ी पार्टी पर अब दो गुजरातियों का नियंत्रण है.

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अमित शाह, नरेंद्र मोदी

इसके साथ ही दिमाग़ में सौ साल पहले के उस वक़्त का ध्यान आता है जब दो ताकतवर गुजराती, गांधी और जिन्नाह, भारत की सबसे बड़ी पार्टी को दिशा दे रहे थे.

ख़बरों के मुताबिक शाह को उत्तर प्रदेश की 80 में से 71 लोकसभा सीट जिताने का इनाम दिया गया है, मैं इससे सहमत नहीं हूं और अपना पक्ष बाद में स्पष्ट करूंगा.

अमित शाह गुजरात के पूर्व गृह राज्य मंत्री हैं, ये पद उनके पास क़रीब एक दशक तक रहा.

'आडवाणी सिर्फ आशीर्वाद दे सकते हैं'

इस दौरान उन पर एक ऐसे मामले में आरोप लगे जिसमें एक व्यक्ति सोहराबुद्दीन शेख को आतंकी बता उनकी हत्या कर दी गई. उनकी पत्नी कौसर और एक गवाह तुलसीराम प्रजापति की भी हत्या कर दी गई.

अमित शाह, राजनाथ, मोदी, आडवाणी

इन आरोपों के बावजूद शाह को भाजपा के 13 सदस्यीय संसदीय बोर्ड ने पार्टी का अध्यक्ष नियुक्त किया. इन 13 सदस्यों में लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज और मुरली मनोहर जोशी भी शामिल हैं जो सत्ता पर मोदी के नियंत्रण के विरोधी हैं, लेकिन आज ख़ुद को कमज़ोर पाते हैं.

क्लिक करें मोदी के संकटमोचक हैं अमित शाह

पार्टी के निवर्तमान अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि शाह को आडवाणी का आशीर्वाद हासिल है. नरेंद्र मोदी ने आडवाणी के हाथों में बस इतनी ही ताक़त रहने दी है, मोदी के काम को आशीर्वाद देना और उनकी तारीफ़ करना.

सोहराबुद्दीन, कौसर बी फ़ाइल फ़ोटो

सोहराबुद्दीन मामले में आया था अमित शाह का नाम.

मैं शाह की नियुक्ति के बाद एक टेलीविज़न कार्यक्रम में शामिल हुआ जिसमें शाह को 'राजनीतिक रणनीतिकार' और 'विलक्षण सांगठनिक क्षमता' वाला बताया गया. मैं मानता हूं कि ये थोड़ा ज़्यादा हो गया.

ख़ुद मोदी ने उत्तर प्रदेश की जीत का श्रेय शाह को नहीं दिया और ना ही वो देने वाले हैं. मोदी उन लोगों में से नहीं हैं जो किसी के साथ प्रशंसा साझा करें. इस मामले में मुझे लगता है कि वो सही हैं.

पूरे उत्तर और पश्चिम भारत में मोदी लहर थी.

'मोदी के रिकॉर्ड पर दाग'

उत्तर प्रदेश में पार्टी को असाधारण और ऐतिहासिक जीत मिली, लेकिन भाजपा को ऐसी ही जीत गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार और छत्तीसगढ़ में भी मिली.

गुजरात और राजस्थान में तो भाजपा ने हर सीट जीती. अगर उत्तर प्रदेश में मोदी की सफलता के पीछे शाह की प्रतिभा है तो फिर हमें दूसरे राज्यों में भी स्थानीय वजहें ढूंढनी होगी.

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अमित शाह

जब हम प्रशासन में अमित शाह के रिकॉर्ड की ओर देखते हैं तो वहां ये प्रतिभा आसानी से नहीं दिखाई देती.

अगर बतौर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के रिकॉर्ड पर कोई एक दाग है तो वो बतौर गृह मंत्री अमित शाह का काम है.

मोदी के सबसे समर्पित प्रशंसक भी मानेंगे कि यहां काम अच्छा नहीं हुआ. मैं उन बातों के बारे में नहीं कह रहा हूं जिनके बारे में धर्मनिरपेक्षतावादी अक्सर शिकायत करते हैं, जैसे कि दंगों पर काबू न कर पाना (जो कि शाह के काम संभालने से पहले हुआ), दंगे की जांच और अभियुक्तों को सज़ा दिलाने में नाकामी या हिंसा रोकने की कोशिश करने वाले ईमानदार पुलिस अफ़सरों को सताना.

मेरा आशय आतंकवाद विरोधी दस्ते के उस प्रमुख से है जो ख़ुद हत्या के आरोप में बंद है और उन आला पुलिस अफ़सरों की गिरफ़्तारी और मुकदमों से है जिनपर अमित शाह की नाक के नीचे ग़लत काम करने के आरोप हैं.

जो निष्ठुर हैं वो तो ये भी आरोप लगाएंगे कि शाह तो बगैर विवादों में उलझे एक लड़की की जासूसी भी ढंग से नहीं कर सके.

'हुज़ूरियों का कब्ज़ा'

अमित शाह

वो कुछ कामों में अच्छे हो सकते हैं, लेकिन ये मानना कि वो बहुत बढ़िया प्रबंधक हैं या मोदी उन्हें बढ़िया प्रबंधक मानते हैं सही नहीं है. शाह जहां हैं उसके पीछे एक ही वजह है: मोदी के लिए वफ़ादारी.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में मोदी के नए भारत के वादे और सरकार की दिशा को लेकर बहुत उत्साह है.

संघ के युवा सितारे राम माधव भाजपा में आ चुके हैं. उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और वो आरएसएस के सबसे ज़्यादा दिखने वाले चेहरे भी हैं.

आडवाणी भाजपा को 'पार्टी विद अ डिफ़रेंस' बुलाते थे. एक अंतर ये था कि ये कांग्रेस की तरह चमचों की पार्टी नहीं थी. इंदिरा, राजीव और सोनिया सभी के चमचे या चापलूस रहे हैं. ये लोग सिर्फ़ इसलिए मंत्री रहे क्योंकि वो नेता के करीबी थे.

भाजपा अलग थी. शायद अब नहीं है. मोदी को साल 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर बाहर से भेजा गया था क्योंकि पार्टी बंटी हुई थी.

एक खेमे को हुज़ूरिया कहा जाता था, जो हर वक़्त 'जी हुज़ूरी' करते थे. ऐसा लगता है कि अब दिल्ली में भाजपा पर हुज़ूरियों का कब्ज़ा हो गया है.

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