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हिंदी कूटनीति का नया दौर, क्या सफल होंगे मोदी?

 मंगलवार, 17 जून, 2014 को 12:19 IST तक के समाचार
नरेंद्र मोदी, सार्क नेता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह के समय की एक तस्वीर है, जिसमें प्रधानमंत्री के साथ राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ और भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक एक साथ एक गोल मेज़ के इर्द-गिर्द बैठे हैं. वे आपस में किस भाषा में बात कर रहे थे? अंग्रेज़ी में नहीं बल्कि हिंदी में.

अगर मोदी की जगह मनमोहन सिंह होते तो ये लोग किस भाषा में बातें कर रहे होते? किसी और भाषा में नहीं, बल्कि अंग्रेज़ी में.

मोदी अब तक प्रधानमंत्री की हैसियत से विदेशी नेताओं से जितनी बार मिले हैं उन्होंने हिंदी भाषा का इस्तेमाल किया है.

ऐसा लगता है आगे भी वह हिंदी का ही इस्तेमाल करेंगे. इस कारण मीडिया ने यह कहना शुरू कर दिया है कि ये हिंदी कूटनीति की एक शुरुआत है.

कूटनीति के स्टेज पर हिंदी का पहली बार इस्तेमाल किया था पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने, जिन्होंने 1977 में विदेश मंत्री की हैसियत से संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दिया था.

चंद्रशेखर जब प्रधानमंत्री थे तो माले में उन्होंने सार्क देशों के एक सम्मलेन में हिंदी का प्रयोग किया था.

दिक़्क़त किसे है?

नरेंद्र मोदी, भूटान संसद

लेकिन यह सही है कि क्लिक करें नरेंद्र मोदी भारत के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने कूटनीति के लिए हिंदी भाषा का प्रयोग शुरू किया है. इसको लेकर मीडिया और अख़बारों में कुछ दिनों से काफ़ी चर्चा हो रही है.

किसी को लगता है नरेंद्र मोदी हिंदुत्व का एजेंडा बढ़ा रहे हैं. कुछ और लोगों के विचार में हिंदी कूटनीति पर प्रधानमंत्री को बधाई देनी चाहिए. कुछ दूसरे लोगों के अनुसार यह भारत के लिए गर्व की बात होनी चाहिए.

टीसी रंगाचारी क्लिक करें पाकिस्तान, अल्जीरिया और फ़्रांस में भारत के दूत रह चुके हैं. वह पूछते हैं कि हिंदी भाषा का इस्तेमाल क्यों नहीं होना चाहिए?

वह कहते हैं फ़्रांस में फ्रेंच भाषा के विदेश में प्रोत्साहन के लिए एक अलग मंत्रालय है. उन्होंने कहा, "मैं जब फ़्रांस में दूत था तो फ़्रांस के नेताओं से मिलता रहता था. वह अगर अंग्रेज़ी भी जानते थे तो बात फ्रेंच में ही करते थे".

रंगाचारी कहते हैं हिंदी के इस्तेमाल पर गर्व होना चाहिए. उनका यह भी कहना था कि अगर प्रधानमंत्री हिंदी में ही ख़ुद को व्यक्त कर सकते हैं तो उन्हें हिंदी भाषा में ही बात करनी चाहिए.

नरेंद्र मोदी, मनमोहन सिंह

असल में यह चर्चा का विषय इसलिए भी बन गया है क्योंकि मोदी से ठीक पहले जो प्रधानमंत्री थे- वह थे क्लिक करें मनमोहन सिंह. उनकी पढ़ाई इंग्लैंड के कैंब्रिज में हुई थी और वह अंग्रेज़ी में बात करने में अधिक आसानी महसूस करते थे. मोदी इसके विपरीत गुजराती माध्यम के सिस्टम से आए हैं और उन्हें अंग्रेज़ी बोलने से अधिक समझने में आसानी होती है.

ग़ैर हिंदी भाषी राज्य

लेकिन विदेश सचिव रह चुके शशांक कहते हैं कि मोदी के हिंदी के प्रयोग से तकलीफ़ उन्हें हो रही है जो भारत मे पैदा हुए लेकिन अंग्रेजी उनकी पहली भाषा है.

शशांक कहते हैं, "वे इसको एक मुद्दा बना रहे हैं क्योंकि उन्हें ख़तरा पैदा हो गया है कि समाज में उनकी श्रेष्ठता ख़त्म हो जाएगी, हिंदी की अहमियत बढ़ जाएगी और हिंदी सीखे लोगों को भी अच्छी नौकरियां मिल सकेंगी."

लेकिन जिस तस्वीर का ज़िक्र मैंने ऊपर किया है उसमें तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता भी उपस्थित होतीं तो मोदी उन से किस भाषा में बात करते? उस तस्वीर में मौजूद दक्षिण एशिया के नेताओं को हिंदी आती है, लेकिन ख़ुद देश के अंदर कई ऐसे नेता हैं जिन्हें हिंदी नहीं आती.

मोदी, जयललिता

ऐसे में मोदी क्या करेंगे? भारत कई भाषाओँ का देश है. अगर देश का प्रधानमंत्री केवल एक भाषा को आगे बढ़ाए तो ग़ैर हिंदी भाषा वाले राज्यों को क्या पैग़ाम मिलेगा?

रंगाचारी कहते हैं कि वह ख़ुद क्लिक करें तमिलनाडु के हैं, लेकिन उन्हें इस बात पर कोई आपत्ति नहीं कि देश के प्रधानमंत्री हिंदी को प्रोत्साहित कर रहे हैं, "इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. भाषा कोई भी हो."

शशांक का कहना है कि हिंदी का इस्तेमाल भारतीय सेना और अर्ध सैनिक बल भी करते हैं जिनमें देश के हर राज्य से लोग आते हैं.

कूटनीति की भाषा

हिंदी फ़िल्मों ने भी हिंदी को आगे बढ़ाया है. हिंदी का असर ग़ैर हिंदी राज्यों में भी है. इसलिए मोदी के हिंदी के इस्तेमाल से किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए.

ऐसा लगता है कि मोदी ने हिंदी भाषा का इस्तेमाल कुछ सोच समझ कर शुरू किया है. वह हिंदी में न केवल भाषण अच्छा देते हैं बल्कि इस भाषा में दूसरों को अपना पैग़ाम भी अच्छे से देते हैं. वह उन लोगों में बने रहना चाहते हैं, जो अंग्रेज़ी नहीं बोल सकते और ऐसे लोगों की संख्या देश में सबसे अधिक है.

नरेंद्र मोदी, शरीफ़

जहाँ तक हिंदी कूटनीति का प्रश्न है तो हर देश को इस बात का अधिकार है कि वह अपनी भाषा में कूटनीति करे. आख़िर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन रूसी भाषा में ही विदेशी नेताओं से बात करते हैं या नहीं? चीन के नेता अपनी भाषा में ही तो बात करते हैं.

इसके इलावा कूटनीति की अपनी एक अलग भाषा होती है इसके लिए शब्दों के बजाए कूटनीति के गुण आना अधिक महत्वपूर्ण होता है. अगर मोदी कूटनीति की भाषा का इस्तेमाल हिंदी के शब्दों में करते हैं और सफल रहते हैं तो यह उनकी एक बड़ी उपलब्धि होगी.

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