'कहते हैं बनाए बम फोड़ेंगे नहीं, मान लें?'

  • 16 जून 2014
नर्मदा बचाओ अभियान

कई घर बनेंगे और कई उजड़ेंगे. कई किसान अपने खेतों को पानी में डूबता हुआ देखेंगे और कई अपने खेतों में लहराती फ़सलों को निहारेंगे.

कितने घरों में रोशनी होगी और कितनों में अंधेरा छा जाएगा. नर्मदा नदी का सरदार सरोवर बांध कई ख़ुशियां लेकर आएगा और कई को बहा ले जाएगा.

हालांकि सरकार का कहना है कि बांध की ऊंचाई बढ़ाने से फ़िलहाल कोई विस्थापित नहीं होगा क्योंकि पुनर्वास की व्यवस्था होने तक बांध के दरवाजे खुले रखे जाएंगे.

इस पर सामाजिक कार्यकर्ता मेघा पाटकर का कहना है कि ये तो यूं हुआ कि "बम बनाने वाली फैक्ट्री कहे कि हम सिर्फ बम बना रहे है, इसका इस्तेमाल नहीं करेंगे."

आने वाले दिनों में सरदार सरोवर बांध का मुद्दा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभर सकता है.

चाहे वह नर्मदा नहर का धीमा काम हो, लोगों को नई जगह पर बसाने में धांधली के आरोप हों या फिर नर्मदा के पानी को लेकर सरकार और किसानों के बीच जारी संघर्ष हो, ये मुद्दे मोदी और आनंदीबेन को चैन से नहीं बैठने देंगे.

मेघा पाटकर

पिछले सप्ताह नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण ने गुजरात सरकार को सरदार सरोवर पर 17 मीटर ऊंचा दरवाजा बनाने की अनुमति दे दी. इस निर्णय के बाद सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई अब 138.7 मीटर के आसपास हो जाएगी.

मोदी के नेतृत्व में गुजरात सरकार ने 2006 में यह दरवाज़े बनाने की अनुमति मांगी थी.

ऊंचाई का नतीजा

सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड के प्रबंध निदेशक जे एन सिंह ने कहा, "इस ऊंचाई से क़रीब 6.8 लाख हैक्टेयर ज़मीन की सिंचाई के लिए अतिरिक्त पानी मिलेगा और क़रीब 40 प्रतिशत अधिक पनबिजली पैदा होगी. इसका फ़ायदा गुजरात को ही नहीं बल्कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान को भी होगा."

उन्होंने बताया कि ऊंचाई बढ़ने के बाद मौजूदा क्षमता के मुक़ाबले क़रीब दोगुना पानी बांध में संचित किया जा सकता है. फ़िलहाल सरोवर की क्षमता क़रीब 586 करोड़ क्यूबिक फीट है.

गुजरात के सौराष्ट्र में पानी न मिलने के कारण किसान नाराज हैं. पिछले कुछ वर्षों में गुजरात के सुरेंद्रनगर ज़िले सहित आसपास के इलाक़ों में 50 से अधिक ऐसे मामले दर्ज हुए हैं जिसमें किसानों पर नर्मदा का पानी चोरी करने का आरोप लगा है.

मामला इतना बिगड़ा है कि गुजरात सरकार ने कई स्थानों पर पानी की चोरी रोकने के लिए एसआरपी के जवान तैनात किए हैं.

अंतरराष्ट्रीय पानी प्रबंधन संस्थान के निदेशक तुषार शाह ने कहा, "किसानों पर पानी की चोरी का केस बनाना बेबुनियाद है. अब किसान के खेत के पास से पानी बह रहा हो और उसके खेत सूखे हों तो वह पानी लेगा ही."

पानी के लिए युद्ध

पानी के लिए संघर्ष

सौराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार विजय सिंह परमार कहते है कि आने वाले दिनों में सरकार की अव्यवस्था के कारण नर्मदा के पानी को लेकर क़ानून व्यवस्था बिगड़ सकती है. परमार कहते है कि अगर आनंदीबेन आने वाले दिनों में खेतों तक यह पानी नहीं ले जा पाईं तो ऐसी झड़पें और बढ़ेगी.

वो बताते हैं, "सरकार परंपरागत जल संसाधनों को बचाने में नाकाम रही है. इसलिए सौराष्ट्र आज पीने के पानी और सिंचाई के लिए पूरी तरह नर्मदा पर निर्भर है लेकिन अब तक सरकार लोगों से कह रही थी कि बांध की ऊंचाई न बढ़ने के कारण उन्हें पानी नहीं मिल रहा. असलियत यह है कि सरकार नहरों का नेटवर्क ही नहीं बिछा पाई थी लेकिन अब ऊंचाई बढ़ने के बाद भी अगर पानी नहीं पहुंचा, तो यहाँ स्थिति गंभीर हो सकती है."

शाह भी मानते हैं कि अगर आनंदीबेन पटेल की सरकार नर्मदा के पानी का प्रबंधन अच्छी तरह नहीं कर पाई तो गुजरात में दिक़्क़त हो सकती है. वो बताते हैं, "मध्य और दक्षिण गुजरात को छोड़कर राज्य के अधिकतर हिस्से में पानी की किल्लत है. लेकिन नहरों का नेटवर्क नहीं होने के कारण फ़िलहाल नर्मदा के सिर्फ एक तिहाई पानी का ही उपयोग किया जा रहा है. बाक़ी पानी समुद्र में चला जाता है.

शाह के मुताबिक़ इस स्थिति में उद्योंगो को ज़्यादा लाभ है क्योंकि वो सरकार को ज़्यादा पैसा देकर पानी ख़रीद लेते हैं.

सबसे बड़ा सवाल

आनंदीबेन, मुख्यमंत्री, गुजरात

विकास और उसके लिए चुकाई जाने वाली क़ीमत को लेकर एक बार बहस फिर तेज़ हो गई है. एक ओर जहां सरकार का नया फ़ैसला गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान के क़रीब दस लाख से अधिक किसानों को पानी देगा, वहीं 50,000 से अधिक परिवारों को बेघर होना होगा.

नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर कहती हैं, "जब बांध की ऊंचाई 2006 में 121 मीटर तक होने को मंजूरी मिली तब क़रीब 2.5 लाख लोगों को अपना घर और ज़मीन छोड़नी पड़ी. अब 17 मीटर ऊंचा गेट बनने से कई हज़ार गांव खाली करने होंगे. मोदी सरकार का यह निर्णय गैर-संवैधानिक है.

दूसरी ओर नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण के सदस्य (पर्यावरण और पुनर्वास) विनय कुमार ने कहा, "नए दरवाज़ों के वजह से फ़िलहाल एक भी परिवार प्रभावित नहीं होगा, क्योंकि ये दरवाज़े अभी खुले ही रहेंगे और जब सरकार पुनर्वास का काम पूरा कर लेगी तो उसके बाद ही दरवाजे बंद किए जाएंगे.

हालांकि पाटकर इन दावों को ग़लत मानती हैं. उन्होंने कहा, "आज भी हज़ारों परिवार बेघर हैं. अब ये दरवाजे खुले हों या बंद इस निर्णय से कई गाव डूब जाएंगे."

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