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'मोदी जी हमें खा थोड़े ही जाएंगे....'

 गुरुवार, 12 जून, 2014 को 18:18 IST तक के समाचार

दंगों की सिहरन और चुनावी नतीजों की सच्चाई से रूबरू, मुज़फ्फ़रनगर-शामली के गांवों की फ़िज़ा ख़्यालों में डूबी सी लगती है.

तपती धूप में गर्मजोशी नहीं, आवेग नहीं. बल्कि नपे-तुले अल्फ़ाज़ों में ‘उम्मीद’ आने वाले कल के डर और गुज़रे हुए कल की यादें दबाना चाहती है.

"हमारे इलाक़े में वे जो करना चाहते थे, उन्होंने हासिल कर लिया, सीट जीत ली, लोगों के बीच दूरियां बढ़ीं और मुसलमान अपने गांव छोड़ भाग गए, अब जब मुसलमान वहां हैं ही नहीं, तो कोई दंगा होगा ही नहीं." ये कहना है कल्लू मियां का.

कल्लू मियां मुज़फ़्फ़रनगर के कुटबा-कुटबी गांव के रहनेवाले थे. क्लिक करें दंगे भड़के, उनके घर पर हमला हुआ और उनके पिता की हत्या कर दी गई, तो गांव के क़रीब 300 क्लिक करें मुसलमानों के साथ वो भी भाग खड़े हुए.

पहले एक राहत शिविर में रहे, जब वह बंद हुआ तो क़रीब सात महीने से यहां, कैराना इलाके में, एक तंबू के नीचे अपने परिवार के सात लोगों के साथ रह रहे हैं.

इस बीच उन्हीं के कुटबा-कुटबी गांव के क्लिक करें संजीव बालियान भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़े और मुज़फ्फ़रनगर से सांसद चुने गए.

यह और बात है कि बालियान पर इलाक़े में पिछले साल हुए दंगे भड़काने का केस दर्ज हुआ है और प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें अपनी कैबिनेट में राज्य मंत्री का ओहदा दिया है.

कल्लू मियां को कैराना का यह इलाका ठीक लगता है, यहां मुसलमानों की तादाद ज़्यादा है और बाकी तंबुओं में उन्हीं के गांव के लोग रहते हैं.

राज्य सरकार से मुआवज़ा मिला था तो लोगों ने यहां ज़मीन ख़रीदी है और उस पर तंबू लगाए हैं. पर चारों ओर झाड़ियां हैं, न बिजली आती है और न शौचालय का कोई प्रबंध है. पहले कड़ाके की ठंड काटी और अब तपती गर्मी से जूझ रहे हैं.

कैराना शामली ज़िले में आता है और यहां से भी भारतीय जनता पार्टी को जीत मिली. सांसद हुकुम सिंह के ख़िलाफ़ भी दंगे भड़काने का केस दर्ज है.

कल्लू मियां के मुताबिक जीतने के बाद, बालियान और सिंह में से कोई भी उनके जैसे दंगा पीड़ितों से मिलने नहीं आए.

इन शिकायतों के बावजूद कल्लू उम्मीद के सहारे हैं. केंद्र सरकार से उनकी उम्मीद, स्थानीय नेता और सांसद से नाउम्मीदी से कहीं बड़ी दिखती है.

वह कहते हैं, "इतने महीनों से तो यहां शांति है, अब नई सरकार एक समुदाय के साथ तो चलेगी नहीं, दोनों को साथ लेकर चलना होगा, तो अगर भारतीय जनता पार्टी हम जैसे विस्थापितों के लिए कुछ कर दे, तो हो सकता है आने वाले समय में मुसलमान भी उनके साथ हो जाएं."

'मोदी खा तो नहीं जाएगा'

मुज़फ्फ़रनगर और शामली ज़िले में साल 2013 के सितम्बर महीने में भड़की साम्प्रदायिक हिंसा में क़रीब 60 लोगों की मौत हुई थी और 50,000 से ज़्यादा लोग बेघर हो गए. इनमें से ज़्यादातर मुसलमान थे.

इलेक्ट्रॉनिक्स रिपेयर का काम करनेवाले तनवीर आलम भी कल्लू मियां की ही तरह मुसलमानों के प्रति रवैये के मामले में स्थानीय नेता, विधायक, सांसद को एक तरफ़ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दूसरी तरफ़ रखते हैं.

वह कहते हैं कि जब तक प्रदेश मे भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं है, तब तक उन्हें केंद्र की मोदी सरकार से ख़तरा नहीं है.

तनवीर कहते हैं, "मोदी जी हमें खा थोड़े ही जाएंगे, फिर उन्होंने अपने भाषणों में कुछ भड़काऊ नहीं कहा है, पहले की बात छोड़ दें तो इस चुनाव प्रचार में वह विकास और सबको साथ लेने की बात ही करते आए हैं."

हालांकि वह एक और तर्क देते हैं, "पर हमें लगता है कि यदि उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन का माहौल बनता है और फिर यहां प्रदेश के स्तर पर भाजपा चुनाव जीतेगी, उसके बाद मुसलमानों के साथ क्या होगा, कुछ भी कहना मुश्किल है."

उनके पड़ोसी और गांव के बुज़ुर्ग अब्दुल ग़फ़्फ़ार के मुताबिक बड़े ओहदों के साथ बड़ी ज़िम्मेदारी आती है, और यही उन्हें भरोसा दिलाता है.

उनके मुताबिक अटल बिहारी वाजपेयी ने भी बतौर प्रधानमंत्री अच्छा काम किया, "गुजरात में जो भी हुआ वह दौर अलग था, अब माहौल बदला हुआ है, प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद इंसान कुछ भी करने से पहले चार बार सोचता है."

फिर वह याद दिलाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की जांच में गुजरात दंगों में नरेंद्र मोदी की भूमिका साबित नहीं हुई.

फिर अचानक सबकी बात बहुत ध्यान से सुन रहे कुछ 16-17 साल की उम्र के अमज़द ख़ान बीच में बोल पड़ते हैं.

अमज़द कहते हैं कि मोदी सरकार मुसलमानों के हित में काम नहीं करेगी और उनके मन में आने वाले समय को लेकर बहुत शंकाएं हैं, "दंगे तो भाजपा के कार्यकर्ता और छोटे नेता ही भड़काते हैं, तो नरेंद्र मोदी ख़ुद कुछ करें या ना करें, उस व़क्त उन्हीं का साथ देंगे."

हिन्दुत्व की राजनीति से डर

कुर्माली से ही सटा है बुट्राडा गांव. यहां क़रीब 2,250 की आबादी में 800 मुसलमान हैं.

बरगद के एक पेड़ के नीचे कुछ आदमी जुटते हैं और बीड़ी सुलगाते हुए बताते हैं कि जब मुज़फ़्फ़रनगर और शामली में दंगे हुए, उनके गांव में शांति रही.

अब्दुल सईद की उम्र क़रीब 70 होगी. वह बोले कि मुसलमान शांति चाहते हैं, दंगे नहीं, "मुज़फ्फ़रनगर में दंगे हुए तो मुसलमानों ने जवाब नहीं दिया."

वह भी नरेंद्र मोदी पर भरोसा करना चाहते हैं और कहते हैं कि अब तक तो मुसलमान भाजपा से अलग ही रहे हैं. लेकिन मोदी ने अब अलग भाषा इस्तेमाल की है, तो यह बदल भी सकता है.

अब्दुल सईद याद भी दिलाते हैं, “हिन्दुत्व की राजनीति जब तक रहेगी, बाबरी मस्जिद जैसे मुद्दे रहेंगे, हिन्दू राष्ट्र की बात वे करते रहेंगे, तो मुसलमान उनके ख़िलाफ़ रहेंगे.”

उनकी बात से सिर हिलाकर सहमति दिखाते हुए मोहम्म्द लईक कहते हैं, "संघ ही सारी बात बिगाड़ता है. हमें भाजपा से इतनी परेशानी नहीं है, वह अगर हमें साथ लेकर चले तो हम क्यों अलग रहें."

19 साल के इस्लाम ने इस चुनाव में पहली बार वोट डाला है. वह कॉलेज में पढ़ाई कर रहे हैं. कहते हैं, "मैं और मेरे दोस्त नौकरी और विकास चाहते हैं और हमें लगता है कि जब नरेंद्र मोदी युवा की बात करते हैं तो उसमें मुसलमान युवा भी शामिल हैं."

मुज़फ़्फ़रनगर-शामली ज़िलों में अब नज़र उम्मीद की इस डोर पर ही है. यह हर तनाव सहने के लिए मज़बूत रहेगी या उलझकर इसमें बल पड़ जाएंगे?

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