घाटे से उबर नहीं पा रहे हैं राज्यों के बिजली बोर्ड

  • 22 मई 2014

वर्ष 2003 में नया बिजली क़ानून आने के बाद राज्यों के बिजली बोर्डों को कई हिस्सों में बांटकर उत्पादन, प्रसार और वितरण के लिए अलग-अलग कंपनियां बनानी पड़ीं.

इसके पीछे तर्क ये था कि राज्य बिजली बोर्ड एनटीपीसी यानी नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन का सही समय पर भुगतान नहीं कर पाते थे.

नई व्यवस्था में केंद्रीय रिज़र्व बैंक को राज्यों का ज़मानतदार बनाया गया. कहा गया कि अगर ऐसी सूरत पैदा होती है की राज्य एनटीपीसी के बक़ाये का भुगतान करने की स्थिति में ना हों तो फिर भारतीय रिज़र्व बैंक इनके बीच मध्यस्थता करेगा.

हालांकि ज़्यादातर राज्यों ने अपनी बिजली बोर्ड को बांटकर तीन नई कंपनियां बनाईं, मगर कुछ एक राज्य ऐसे भी हैं जिन्होंने अभी तक ऐसा नहीं किया है. इनमें पूर्वोत्तर के कुछ राज्य भी शामिल हैं.

हालांकि ये उम्मीद की जा रही थी कि हिस्सों में किए जाने के बाद राज्यों में बिजली की व्यवस्था ठीक हो जाएगी, मगर स्थिति 'ढाक के तीन पात' ही बनकर रह गई है क्योंकि वितरण में हो रहे नुक़सान से राज्य आज भी उबर पाने की स्थिति में नहीं हैं. आपूर्ति में हो रहे नुक़सान की वजह से ही राज्य बिजली बोर्ड घाटे में भी चल रहे हैं जिससे उबरना उनके लिए मुश्किल हो गया है.

इसी को देखते हुए दिल्ली में आपूर्ति का ज़िम्मा दो निजी कंपनियों को दिया गया जिसमे एक यमुना पावर और दूसरी टाटा पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी हैं.

हालांकि निजी कंपनियों के आने के बाद विद्युत की आपूर्ति में सुधार ज़रूर हुआ, मगर इससे बिजली महंगी हो गई. निजी कंपनियों का तर्क है कि वो महंगी दर पर बिजली ख़रीद रही हैं, इसलिए बिजली के दाम बढ़ाने पड़े हैं. दिल्ली का मामला अब अदालत में है.

तो आइये जानते हैं दो बड़े राज्यों में बिजली की आपूर्ति का हाल.

बेहाल बिहार

बिहार से पत्रकार मनीष शांडिल्य बताते हैं कि इस राज्य के लिए बिजली का मुद्दा इसलिए ख़ास है कि कुछ दिनों पहले ही मुख्यमंत्री पद छोड़ने वाले नीतीश कुमार अक्सर सार्वजनिक मंचों से यह बात दोहराते रहे कि 2015 तक यानी जेडीयू सरकार के दूसरे कार्यकाल तक अगर वे बिजली के क्षेत्र में अपेक्षित सुधार नहीं कर पाए तो वोट मांगने नहीं जाएंगे.

दूसरी ओर बिहार में गर्मी शुरू होते ही हर साल बिजली के लिए धरना-प्रदर्शन, आगजनी, सड़क जाम का सिलसिला शुरू हो जाता है. कभी-कभी यह काफी हिंसक रूप ले लेता है.

ऐसे ही एक हिंसक प्रदर्शन में 2008 में कहलगांव में बिना कटे बिजली की मांग कर रहे लोगों पर पुलिस फायरिंग में कम से कम तीन लोग मारे गए थे. वहां के लोगों में ख़ास कर इस बात को लेकर नाराज़गी थी कि उनकी दी गई ज़मीन पर एनटीपीसी का संयंत्र स्थापित हुआ लेकिन उन्हें पूरी तरह बिजली नहीं मिलती थी.

बिहार में बिजली की दयनीय स्थिति को देखते हुए लोगों ने ख़ुद से कई तरह की व्यवस्था करने की कोशिश की है. शहर हो या गांवों के लोग पैसे देकर या फिर केरोसिन तेल के बदले जेनरेटर सेवा उपलब्ध कराने वालों से बिजली लेते हैं.

दहेज़ में लोग जेनरेटर की मांग कर रहे हैं. कई मामलों में तो पंचायत चुनाव के पहले मुखिया के प्रत्याशी अपने ख़र्चे पर खराब ट्रांसफॉर्मर ठीक करवा देते हैं.

राज्य के लगभग 17 हजार गांवों, यानी लगभग एक तिहाई गांवों का विद्युतीकरण होना अब भी बाकी है.

फ़िलहाल बिहार बिजली के लिए पूरी तरह से केंद्र पर निर्भर है. राज्य को होने वाला वार्षिक आवंटन लगभग 1,772 मेगावाट है लेकिन हर वर्ष औसतन 900 से 1,000 मेगावाट बिजली ही उपलब्ध हो पाती है.

पिछड़ा उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश से पत्रकार अतुल चंद्रा कहते हैं कि मार्च 2013 में केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने पहली बार सभी राज्य विद्युत इकाइयों का ऑडिट कराया. शायद इस ऑडिट के नतीजों के आधार पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुलायम सिंह यादव से कहा था कि उत्तर प्रदेश को गुजरात बनाने के लिए 56 इंच सीना चाहिए.

इस ऑडिट ने जहां गुजरात को ए प्लस की रेटिंग दी, वहीं उत्तर प्रदेश की विद्युत वितरण कंपनियों को सी ग्रेड हासिल हुआ. इस ऑडिट में उत्तर प्रदेश सिर्फ़ गुजरात ही नहीं बल्कि कई दूसरे राज्यों की तुलना में भी पीछे था.

ऑडिट के परिणामों से यह तो साफ़ हो गया कि 14 जनवरी 2000 को जिस उद्देश्य से उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन का गठन हुआ था वह पूरा नहीं हो सका है. कार्पोरेशन का उद्देश्य था विद्युत् संचार, वितरण और आपूर्ति का सुनियोजन और प्रबंधन.

उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन की स्थिति आज भी दयनीय है. बिजली की मांग और आपूर्ति में लगभग 3000 मेगावाट का अंतर है. वर्तमान मांग लगभग 10,000 मेगावाट है.

इन वर्षों में एक रोजा और ललितपुर को छोड़ कर अन्य कोई नया बिजली संयंत्र प्रदेश में नहीं लगा है लेकिन मांग हर वर्ष बढ़ती जा रही है.

मायावती सरकार में 10 नए संयंत्र लगाने के लिए निजी कंपनियों से सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए थे. इनकी कुल क्षमता 10,000 मेगावाट थी. शर्त यह थी कि 18 महीनों में इनपर काम शुरू हो जाएगा, वरना उनकी अग्रिम धनराशि वापस नहीं की जाएगी. यह धनराशि 500 करोड़ रुपए है.

ऑल इंडिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे कहते हैं कि काम नहीं शुरू हुआ, इस बीच अखिलेश यादव की सरकार बन गई. उसने अग्रिम धनराशि ज़ब्त करने के बजाय कंपनियों को 18 महीनों की मोहलत और दे दी.

दुबे के अनुसार, "54 महीनों के बाद भी इन कंपनियों ने कोई काम नहीं शुरू किया है और न ही सरकार ने अग्रिम धनराशि ज़ब्त करने वाली शर्त का इस्तेमाल किया."

आर्थिक दृष्टिकोण से उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन क़र्ज़ में डूबा हुआ है. इस पर कुल 31,000 करोड़ रुपये की देनदारी है. इसमें 14,000 करोड़ रुपये बिजली खरीद के बकाये हैं और शेष 17,000 करोड़ बैंकों का उधार है.

इन हालात को देखते हुए लगता है कि उत्तर प्रदेश में बिजली आने वाले हाल के सालों में भी शायद बेहतर नहीं होगी.

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