अब मोदी की चुनौतियों की चर्चा शुरू

  • 19 मई 2014
भारतीय मीडिया

आम चुनाव में ऐतिहासिक जीत के बाद भाजपा नेता नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के लिए ख़ुद को तैयार कर रहे हैं. भारतीय अख़बारों में उनके बारे में क्या चर्चा है. आइए जानते हैं.

क्या मोदी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को संभाल पाएंगे?

यह एक अहम सवाल है और हाल में संपन्न आम चुनावों में मोदी की ऐतिहासिक जीत के बाद कई विश्लेषक यह सवाल उठा रहे हैं.

कई विश्लेषक इस बात को लेकर एकमत हैं कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना मोदी के पहली सबसे बड़ी चुनौती होगी. निवर्तमान सरकार लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को संभालने और महंगाई पर काबू पाने में नाकाम रही.

मोदी ने अपने चुनाव प्रचार में अर्थव्यवस्था पर बहुत ज़ोर दिया था और कई विश्लेषकों का मानना है कि अब उनके लिए अपनी बातों पर अमल करने का समय आ गया है.

द इकोनोमिक टाइम्स ने अपने लेख में आर्थिक विश्लेषक रुचिर शर्मा ने लिखा है, "अगर नरेंद्र मोदी निवर्तमान सरकार से विरासत में मिली धीमी विकास दर और महंगाई का तोड़ निकाल सकें तो दुनिया एक बार फिर भारत का रुख़ करेगी."

समीक्षा

नरेंद्र मोदी

उनकी त्वरित चुनौती कांग्रेस के लोकलुभावन कार्यक्रमों जैसे ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना और भोजन के अधिकार की समीक्षा करना होगा. इन योजनाओं से लाखों लोगों को काम और भोजन मिला है लेकिन ये बहुत खर्चीली साबित हुई हैं.

विदेश नीति के मामले में मोदी के विचारों के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है.

ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन की तन्वी मदान लिखती हैं, "जहां तक आर्थिक नीति का सवाल है मोदी की प्राथमिकताओं के बारे में सभी जानते हैं लेकिन विदेश नीति के मामले में उनकी प्राथमिकताओं के बारे में ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है."

उनकी सबसे बड़ी चुनौती पाकिस्तान रिश्तों को मैनेज करने की होगी. उनके पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह शांति वार्ता के प्रबल समर्थक थे.

अपने चुनाव अभियान में मोदी ने पाकिस्तान पर कड़ा रुख़ अख्तियार किया था लेकिन संभव है कि बतौर प्रधानमंत्री वह शांति प्रक्रिया का पक्ष लें.

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि वह चीन और जापान के आर्थिक मॉडल के मुरीद हैं.

यह देखना दिलचस्प होगा कि वह इन दो देशों के साथ रिश्ते कैसे साधते हैं जो दक्षिण चीन सागर में स्थित द्वीपों पर अधिकार को लेकर एकदूसरे के ख़िलाफ़ खड़े हैं.

चुनावी वादे

नरेंद्र मोदी के समर्थक

मोदी ने प्रचार के दौरान अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने, नए रोज़गार पैदा करने, आधारभूत ढ़ांचे के विकास और सुशासन का वादा किया था और देश के मतदाताओं ने इन वादों के दम पर उन्हें निर्णायक जीत दिलाई है.

अंग्रेजी अख़बार द हिन्दुस्तान टाइम्स का कहना है कि इस जनादेश का मतलब है कि लोग मोदी को पूर्ण बहुमत देना चाहते थे ताकि वह देश को मौजूदा स्थिति से बाहर निकाल सकें.

अगर मीडिया में चल रही चर्चाओं को देखा जाए तो इससे यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मोदी अपने इन्हीं चुनावी वादों के कारण आने वाले दिनों में चर्चा में रहेंगे.

द इंडियन एक्सप्रेस के संपादक शेखर गुप्ता ने पहले पेज पर अपने लेख में लिखा है, "आपका समय शुरू होता है अब." उनका आशय भाजपा नेता के चुनावी वादों से है. उन्होंने मोदी को याद दिलाते हुए महत्वाकांक्षी मतदाता अधीर, माफ़ी नहीं देने वाला, स्पष्ट सोच वाला और प्रतिबद्धता बदलने वाला है.

इसी अख़बार में प्रताप भानु मेहता कहते हैं कि "इसमें कोई शक नहीं है कि भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि मोदी इस जनादेश के साथ क्या करते हैं."

अधिकांश विश्लेषक मानते हैं कि मोदी इस शानदार जीत के लिए प्रशंसा के पात्र हैं. दि हिंदू का कहना है कि इसमें कोई शक नहीं है कि भाजपा की इस सनसनीखेज जीत का श्रेय मोदी की लोकप्रियता को जाता है.

इतिहास

नरेंद्र मोदी के समर्थक

लेकिन वो अपने इतिहास का क्या करेंगे?

मोदी को गुजरात की समृद्धि का वास्तुकार माना जाता है. वह ख़ुद को ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने में सफल रहे जिसने लगातार अपने प्रदेश का विकास किया. लेकिन विश्लेषक मोदी के इतिहास को लेकर चिंतित नहीं हैं. मोदी को आलोचक उन पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने 2002 के मुस्लिम विरोधी दंगों को रोकने का प्रयास नहीं किया. इन दंगों में 1000 से अधिक लोग मारे गए थे.

मोदी ने हमेशा इन आरोपों से इनकार किया है. चुनाव अभियान के दौरान जब उनसे इस बारे में सवाल किए गए तो उन्होंने इससे बचने की कोशिश की.

पिछले 12 सालों से मीडिया लगातार इस बारे में उनसे सवाल पूछ रहा है. आने वाले दिनों में भी उन्हें इन सवालों से दोचार होना पड़ेगा.

आरएसएस

विश्लेषक आशुतोष वार्ष्णेय का मानना है कि मोदी अगर वह अपने चुनावी वादों को पूरा करना चाहते हैं तो उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदलना होगा.

वह लिखते हैं, "अगर मोदी आरएसएस को बदलने में नाकाम रहते हैं तो उन्हें बहुत मुश्किल होगी. विकास के वादे और मुस्लिम विरोधी हिंदू राष्ट्रवाद में परस्पर टकराव से गंभीर समस्याएं पैदा होंगी."

लेकिन फिलहाल वह जबर्दस्त जनादेश के साथ देश के अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि उनके पास अपने आलोचकों को गलत साबित करने का बेहतरीन मौका है.

तो क्या मोदी अल्पसंख्यक समुदाय का विश्वास जीत पाएंगे?

यह लाख टके का सवाल है.

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