गुजरात में अब कौन 'आवाज़' उठाएगा?

  • 13 मई 2014

“अगर मुकुल सिन्हा आज हमारे बीच होते तो शायद शुक्रवार को चुनाव के नतीजे मुस्कुराते हुए देखते, और पत्रकार जब उनसे नरेंद्र मोदी की जीत के बारे में पूछते तो वो मज़ाक करते कि ये कोई बड़ी बात नहीं, ज़िंदगी और संघर्ष इसके आगे भी है.”

पिछले एक दशक से गुजरात सरकार और पुलिस के ख़िलाफ़ क़ानूनी लड़ाई लड़नेवाले मुकुल सिन्हा के बारे में ये कहते हुए पत्रकार ज़ाहिर जान मोहम्मद बिल्कुल नहीं झिझकते. बल्कि जीवन के प्रति मुकुल सिन्हा के इसी रवैए के वो क़ायल हैं.

मोहम्मद कहते हैं कि मुकुल डरते या घबराते नहीं थे, “इंसानों से ज़्यादा मुद्दों पर ज़ोर देते थे, कहते थे कि जॉर्ज बुश, नरेंद्र मोदी या बिन्यामिन नेतन्याहू पर इतना ध्यान मत दो, इसकी जगह आम लोगों की ज़िंदगी से जुड़े संघर्ष पर काम करो, रास्ते ख़ुद-ब-ख़ुद निकल आएंगे.”

ये वही शख़्स थे, जिनका अहमदाबाद स्थित दफ़्तर 2002 के दंगों में जलाया गया, जिन्होंने नानावटी आयोग के समक्ष दंगा पीड़ितों को उनके बयान रखने में मदद की, दंगा पीड़ितों के केस लड़े और गुजरात में हुए फर्ज़ी एनकाउंटर के पीड़ितों के केस भी.

एक ख़ालीपन को भरा

इतना सब देखने और उसे चुनौती देनेवाले मुकुल सिन्हा की इतनी संतुलित सोच के बारे में मोहम्मद कहते हैं, “हम बौखलाते थे या भावुक हो जाते थे तो वो डांटते थे और कहते थे कि शांत होकर जिस बात से परेशान हो उसके ख़िलाफ़ अपनी सोच को शब्दों में ढालो और विरोध का रास्ता निकालो.”

2002 के दंगों ने मुकुल सिन्हा में एक बड़ा बदलाव ला दिया था. उनके दोस्त और प्रोफ़ेसर गौरांग जानी कहते हैं कि वो ऐसा दौर था जब गुजरात में एक वैक्यूम यानी ख़ालीपन पैदा हो गया था.

जानी के मुताबिक, “हिन्दुत्व उस व़क्त सबसे बड़ा मुद्दा था, जहां गांधी पैदा हुए थे वहां सर्वधर्म समभाव की भावना धीरे-धीरे इतनी कम हो गई थी कि पढ़े-लिखे वर्ग में भी अल्पसंख्यकों के लिए न्याय की आवाज़ उठानेवाला कोई नहीं था, मुकुल ने उसी वैक्यूम को भरा, और अब फिर से वो जगह खाली हो गई है.”

मुकुल सिन्हा ने जैसे तय कर लिया था कि दंगों के बाद अब उन्हें बहुत बड़े स्तर पर काम करना है. वो मानवाधिकार से जुड़े क़ानून की जानकारी जुटाने लगे, मानो एक लंबी लड़ाई की तैयारी के लिए.

पर मीडिया की नज़र से दूर, आम लोगों के अधिकारों के लिए मुकुल सिन्हा की लड़ाई इससे कहीं पहले शुरू हो चुकी थी.

आंदोलन

1994 में रिलायंस की एक कंपनी से निकाले जाने और मज़दूर संघ बनानेवाले भरत झाला को उनकी नौकरी वापस दिलानेवाले मुकुल सिन्हा ही थे. और रास्ता वही, क़ानून और अदालत का.

भरत झाला बताते हैं, “वो मज़दूरों के नेता थे, उन्होंने हमें दिशा दी और समझाया कि अपनी मांगें कैसे उठाएं, मुझे आगे बढ़ाया, कंपनी के दबाव के आगे न झुकना, अपने हित से पहले सभी मज़दूरों का सामूहिक हित सामने रखने की सलाह दी.”

मुकुल सिन्हा ने विज्ञान की पढ़ाई की थी और आईआईटी (कानपुर) गए, फिर पीएचडी भी की. पर जिस विश्वविद्यालय में शोध वैज्ञानिक की नौकरी की, जब वहां से अचानक 130 लोगों को नौकरी से निकाला गया, तो उनके जीवन की दिशा बदल गई. वो आंदोलनकारी बन गए.

इसके बाद गुजरात के कई बड़े शिक्षण संस्थानों में यूनियन बनाने में मुकुल सिन्हा का बड़ा योगदान माना जाता है.

प्रोफेसर जानी बताते हैं कि मुकुल मार्क्सवादी विचारधारा वाले थे, इसलिए आम लोगों से जुड़ना और क्रांतिकारी विचारधारा रखना उनके लिए ज़िंदगी जीने का एकमात्र तरीका था.

भरत झाला कहते हैं, “वो सचमुच मज़दूरों के हित में सोचते थे, कई व़कील देखे जो वायदे कर के मुकर जाते थे, पलट के नहीं आते थे, पर मुकुल पूरा साथ देते थे, आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों की मदद भी करते थे, यहां तक कि अपने घर या दफ़्तर तक आने का भाड़ा भी देते थे.”

विरोध

पर लोगों के हक़ की ये लड़ाई लड़ने के लिए जज़्बे के अलावा मुकुल सिन्हा के पास और कोई औज़ार नहीं था. जबतक उनके दोस्त फ़िल्मकार महेश भट्ट ने उन्हें क़ानून की पढ़ाई करने की सलाह नहीं दी थी. 1990 में मुकुल सिन्हा ने वो भी पूरी कर ली.

महेश भट्ट के मुताबिक मुकुल की क़ाबिलियत रखनेवाला इंसान एक बेहद सफ़ल करियर बना सकता है, पर मुकुल की फ़ितरत उनकी मजबूरी थी और उन्होंने अपना अलग रास्ता चुना.

वो कहते हैं कि, “विरोध करने में बहुत दुख उठाना पड़ता है, ऐसे लोगों को बड़े-बड़े लोगों के लिए केस लड़नेवाले वकीलों को मिलने वाले सुख नहीं मिलते, और मुकुल ये सब बिना जताए करते थे, मानो वो कुछ अलग न कर रहे हों.”

मुकुल सिन्हा के ख़ुद को पीछे रखने और नए लोगों और नेतृत्व को आगे लाने की फ़ितरत के बारे में कई लोग तदीक़ करते हैं.

ज़ाहिर जान मोहम्मद बताते हैं कि अक़्सर मुकुल सिन्हा रैली का आयोजन करते और मीडिया के सामने किसी नए सदस्य को खड़ा कर देते.

भरत झाला एक जाने-माने आरटीआई कार्यकर्ता हैं और उनके मुताबिक मुकुल सिन्हा ने ही उन्हें आगे बढ़ने की ट्रेनिंग दी और मुद्दों की समझ बढ़ाई.

भरत कहते हैं, “2002 के दंगों के बाद उन्होंने समझाया कि हिंदुओं और मुसलमानों के मुद्दे दरअसल ग़रीबी से जुड़े हैं, और हमें नारा दिया कि ‘न चाहिए टीला-टोपी, हमें चाहिए रोज़ी-रोटी’, वो हमें पूंजीवाद और रूढ़ीवादिता समझाते थे, मेरी ज़िंदगी में वही ये समझ लाए.”

विरासत

मुकुल सिन्हा, निर्झरी
मुकुल सिन्हा की पत्नी निरझरी उनकी वेबसाइट के लिए गुजराती लेखों का अंग्रेज़ी में अनुवाद करती थीं.

2002 के गुजरात दंगों के बाद मुकुल सिन्हा ने गुजरात में 'न्यू सोशलिस्ट मूवमेंट' के नाम से एक राजनीतिक पार्टी की स्थापना की थी.

साल 2007 और 2012 में उन्होंने विधान सभा चुनाव भी लड़ा मगर हार गए.

उनकी हर हार और जीत में उनकी साथी रहीं उनकी पत्नी निर्झरी. और उस पार्टनरशिप में आगे चलकर उनके बेटे प्रतीक भी शामिल हो गए.

इसका सबसे बेहतर उदाहरण थी उनकी वेबसाइट ट्रुथऑफ़गुजरात डॉटकॉम, जिसके ज़रिए वो गुजरात के बारे में लेख प्रकाशित करते थे.

इन लेखों का उनकी पत्नी गुजराती से अंग्रेज़ी में अनुवाद करतीं, वो विश्लेषण करते और उनका बेटा तकनीकी एक्सपर्ट होने के नाते सब सामग्री को बेहतर ढंग से इंटरनेट पर डालता.

ज़ाहिर जान मोहम्मद कहते हैं कि मुकुल सिन्हा को वो ऐसे ही याद करना चाहेंगे, "परिवार से जुड़े ऐसी ख़ुश मिज़ाज शख़्सियत जिन्हें ज़िंदगी से बहुत प्यार था और जो आज़ादी और आज़ाद ख़्याल के लिए बेख़ौफ़ लड़ने का हौसला रखते थे.

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