‘रिक्शा खींचता था, अब 70 लाख टैक्स देता हूँ’

  • 13 मई 2014
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आधे से ज़्यादा भारत खेती-बाड़ी पर जीता है, पर वह भारत के जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का महज़ 14 फ़ीसदी हिस्सा है. इसके लिए कोई सरकारी नीतियों में खोट बताता है, कोई खेती की अनिश्चितताओं पर दोष मढ़ता है.

इन्हीं के बीच हरियाणा के एक किसान ने अपनी कहानी से सैकड़ों लोगों को एक बार फिर सपने देखने को मजबूर किया है.

पेशे से किसान, 51 वर्षीय धरमवीर काम्बोज कुछ वर्षों पहले तक दिल्ली की गलियों में साइकिल रिक्शा चलाते थे. ग़रीबी इतनी थी कि न पैडल पर से पांव हटे, न गांव जाने का मौक़ा मिला. फिर एक हादसा हुआ, घर लौटना पड़ा.

मुश्किल दिन थे. धरमवीर बताते हैं, “ग़रीबी सोने नहीं देती थी. काम के लिए इधर-उधर घूमता रहता था. फिर कहीं देखा कि लोग आंवले के जूस, मिठाइयों के लिए पैसे देने को तैयार हैं. हमने बाग़वानी विभाग से मदद मांगी. हमें 25 हज़ार रुपए की सब्सिडी भी मिली. साल 2007 में हमने आंवले की खेती शुरू की, उसका रस निकालते थे और पैकेटों में भरकर बेचते थे. इसकी मांग धीरे-धीरे बढ़ने लगी, नए ग्राहक मिलने लगे. हरिद्वार में कुछ बड़े व्यापारी भी मिले.”

“कई बार आंवला कसने में हाथ छिल जाते थे, तो मैंने और मेरी पत्नी ने एक ऐसी मशीन बनाई, जिसमें आंवला, एलोवेरा, दूसरी सब्ज़ियों और जड़ी-बूटियों के सत्व निकाले जा सकते थे और वो भी बिना बीज तोड़े.”

इस मशीन को बनाने में कई मित्रों ने धरमवीर काम्बोज की मदद की और कुछ ने मुंह पर न भी कह दिया. बहरहाल काफ़ी मेहनत के बाद मशीन ने एक शक्ल अख्तियार कर ली.

इस मशीन की चर्चा सुनकर नेशनल इनोवेशन फ़ाउंडेशन के लोग भी काम्बोज के गांव पहुंचे और उन्हें सम्मानित करने के लिए दिल्ली बुलाया, जहां राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन्हें सम्मानित किया.

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पुराने दिन याद करते हुए वह कहते हैं, “हमारे पास रहने के लिए पक्का मकान भी नहीं था, अब घर तो है ही, साथ में एक प्रोसेसिंग प्लांट भी है. जहां कई लोग एक साथ काम कर सकते हैं. अब सालाना क़रीब 70 लाख रुपए सेल्स टैक्स चुकाता हूं.”

जब मर्ज़ी से चलानी हो व्हीलचेयर

ओडिशा के सुशांत पटनायक ने पैरालिसिस के मरीज़ों के लिए व्हीलचेयर पर लगने वाला एक उपकरण बनाया है.

इसके ज़रिए मरीज़ सिर्फ़ अपनी सांसों के इशारे से फ़ोन लगाने, व्हीलचेयर आगे-पीछे करने जैसे कई काम कर सकते हैं.

सुशांत कहते हैं, “यह ऐसा डिवाइस है, जो व्हीलचेयर पर लगता है और इस पर एक स्क्रीन लगा होता है. स्क्रीन पर दो-दो सेकंड के लिए ऑप्शन फ़्लैश किए जाते हैं और पैरालिसिस के मरीज़ जो ज़्यादातर मामलों में बोल या हिल-डुल नहीं पाते हैं, वो अपनी नाक के नीचे लगे सेंसर पर तेज़ी से सांस छोड़कर अपने मनमाफिक़ कुर्सी को घुमा सकते हैं.”

कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार पा चुके सुशांत पटनायक भोपाल के एक विश्वविद्यालय में बीटेक कर रहे हैं.

भविष्य में वो और भी आविष्कार करना चाहते हैं, दूसरों को वैज्ञानिक उद्यम के लिए प्रोत्साहित करना चाहते हैं और ख़ुद का व्यापार भी करना चाहते हैं.

नौकरी छोड़कर अड्डा खोला

डिजिटल म्यूज़िक उद्योग से संबंधित अभिषेक गुरेजा ने ख़ुद के लिए काम करने की योजना बनाई और एक अच्छी कंपनी के ऊंचे पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

उन्होंने कुछ दोस्तों के साथ अपनी कंपनी खोल ली.

उनकी कंपनी तरह-तरह के मोबाइल ऐप्स और गेम्स बनाती है.

हाल ही में उन्होंने ‘ऐप अड्डा’ नाम की एक सेवा शुरू की है, जिसके ज़रिए इंटरनेट के बिना भी मोबाइल उपभोक्ता ऐप्स और गेम डाउनलोड कर सकते हैं.

उन्होंने कहा, “ऐप अड्डा दरअसल एक डिवाइस से चलता है, जिसे मोबाइल की दुकानों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर लगाया जा सकता है. इस डिवाइस के नेटवर्क क्षेत्र में आते ही मोबाइल यूज़र्स को वाईफ़ाई पर ऐप अड्डा नेटवर्क दिखने लगता है जिसमें लॉगिन करने के बाद वो मोबाइल ऐप से लेकर गेम्स तक डाउनलोड कर सकते हैं. इसके लिए अलग से इंटरनेट की ज़रूरत नहीं होती.”

तेज़ी से मोबाइल हो रहे भारत के कई प्रमुख शहरों में इस उत्पाद को अभिषेक और उनकी टीम पहुंचा रही है. कई अन्य देशों में भी इसे ले जाने की तैयारी है.

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अभिषेक गुरेजा जैसे कुछ नए दौर के उद्यमी नौकरी छोड़ने का ख़तरा मोल लेकर अपना व्यापार शुरू कर रहे हैं. ऐसे में सरकार से मदद की भी उम्मीदें होती हैं.

हालांकि ख़ुद अभिषेक सरकार की मदद पर निर्भर नहीं रहना चाहते.

उन्होंने कहा, “चाहे कोई भी सरकार आए या जाए उद्यमियों को अपनी मेहनत और हिम्मत पर भरोसा रखना चाहिए और उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए.”

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