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नीतीश के 'विकास की साइकिल' की हवा निकली?

 गुरुवार, 8 मई, 2014 को 15:11 IST तक के समाचार
नीतीश कुमार

नीतीश कुमार ने जब बिहार की सत्ता संभाली थी तो उनके सामने राज्य को विकास के रास्ते पर लाने की कठिन चुनौती थी. बिहार तरह-तरह की समस्याओं से जूझ रहा था. बिजली, पानी, सड़कों की स्थिति ख़राब थी. क़ानून-व्यवस्था पर सवाल थे, शिक्षा व्यवस्था में समस्या थी.

नीतीश ने अपने कार्यकाल में कई योजनाओं की शुरुआत की. उनकी कई महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक थी छात्राओं को साइकिल देना. नीतीश की इस योजना ने सबका ध्यान खींचा. इस योजना की काफ़ी सराहना हुई. राज्य में सड़कें बनीं, लोगों ने सराहना की. मुख्यमंत्री के रूप में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीतीश की ख़ूब वाहवाही हुई.

साइकिल योजना को बिहार में विकास का पहिया कहा गया. लेकिन पिछले एक साल के दौरान चुनावों का असर कहें या फिर भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन टूटने का, बिहार में विकास की चर्चा एकाएक होनी बंद सी हो गई.

चुनावी मौसम में जहाँ बिहार में इस विकास का झंडा सत्ताधारी जनता दल (यू) भी नहीं उठा पा रहा है और अब उसके विरोध में खड़ी भारतीय जनता पार्टी नीतीश सरकार की आलोचना का कोई मौक़ा नहीं गँवा रही.

'विकास है मुद्दा'

बिहार

पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में जब मैंने ये सवाल पूछा कि इन चुनावों में विकास मुद्दा क्यों नहीं बना, तो नीतीश कुमार का जवाब था, "हमारी समझ से विकास सबसे बड़ा मुद्दा है. जो काम हुआ है, उस काम को लोग देख रहे हैं. दूसरे लोग जो सपना दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, उससे लोग सतर्क हैं. हमारा बुनियादी मुद्दा है हम विकास में एक और छलांग लगा सकते हैं. बिहार में विकास ही सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है."

नीतीश कुमार ने कहा कि उनके विपक्षी दोनों गठबंधन यही चाहते हैं कि वो विकास के मुद्दे को बाहर कर दें. चलिए बिहार में विकास के दावे के बीच नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से साइकिल योजना का जायजा लेते हैं.

"हमारी समझ से विकास सबसे बड़ा मुद्दा है. जो काम हुआ है, उस काम को लोग देख रहे हैं. दूसरे लोग जो सपना दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, उससे लोग सतर्क हैं. हमारा बुनियादी मुद्दा है हम विकास में एक और छलांग लगा सकते हैं. बिहार में विकास ही सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है"

नीतीश कुमार, मुख्यमंत्री, बिहार

पटना से सटे सकरैचा गाँव की ज्योति कुमारी को साइकिल का पैसा तो मिला, लेकिन उन्होंने साइकिल ख़रीदी नहीं. पैसा उनके पिताजी ने खाते में रख लिया है. बहुत सकुचाते हुए ज्योति ने बताया, "साइकिल तो नहीं साइकिल का पैसा मिला था. साइकिल के लिए 2500 रुपया मिला था. लेकिन साइकिल थी, इसलिए हमने साइकिल नहीं ख़रीदी."

ज्योति की माँ कहती हैं कि जब उनकी बेटी आठवीं क्लास में गई, तभी उन्होंने साइकिल ख़रीद ली थी जबकि इस योजना के तहत लड़कियों को दसवीं कक्षा में पहुँचने तक ही साइकिल के लिए पैसा मिल पाता है.

ग़ैर सरकारी संगठन गौरव ग्रामीण महिला विकास मंच चला रही प्रतिमा कहती हैं कि पहले लड़कियों को साइकिल दी जाती थी, लेकिन बाँटने में समस्या आने के कारण सरकार ने सीधे पैसा ही देना शुरू कर दिया.

साइकिल योजना की समस्या

प्रतिमा

प्रतिमा बताती हैं, "इस योजना की एक बड़ी समस्या ये है कि साइकिल के पैसे लेने से पहले वाउचर देना होता है. अब कोई साइकिल ख़रीदे बिना वाउचर कैसे लाए. लेकिन आप कह रहे हैं पहले कैशमेमो दो. अब साइकिल स्टोर वाले कैशमेमो बनाने के लिए 500 रुपए लेते हैं. लेकिन कई लोग वाउचर देने के बाद साइकिल नहीं ख़रीदते. उसे जमा कर देते हैं या फिर अन्य कामों में लगा देते हैं."

उसी गाँव की गुड़िया कुमारी का मामला तो और भी रोचक है. गुड़िया की बड़ी बहन के लिए साइकिल योजना के तहत साइकिल ख़रीदी गई. लेकिन गुड़िया की बड़ी बहन की अब शादी हो गई है. अब गुड़िया और गुड़िया की अन्य बहनें उसी साइकिल का इस्तेमाल करती हैं. उनके घर में एक साइकिल पहले से भी थी.

"इस योजना की एक बड़ी समस्या ये है कि साइकिल के पैसे लेने से पहले वाउचर देना होता है. अब कोई साइकिल ख़रीदे बिना वाउचर कैसे लाए. लेकिन आप कह रहे हैं पहले कैशमेमो दो. अब साइकिल स्टोर वाले कैशमेमो बनाने के लिए 500 रुपए लेते हैं. लेकिन कई लोग वाउचर देने के बाद साइकिल नहीं ख़रीदते. उसे जमा कर देते हैं या फिर अन्य कामों में लगा देते हैं"

प्रतिमा, एनजीओ

गुड़िया कहती हैं, "दीदी की शादी हो गई. साइकिल नहीं मिली थी हमें. साइकिल का पैसा मिला था." यानी एक और मिलती-जुलती कहानी. यहाँ भी लड़की को साइकिल के पैसे तो मिले, लेकिन साइकिल नहीं ख़रीदी गई. क्योंकि घर में पहले से ही साइकिल मौजूद है और जिनको वो साइकिल मिली थी, उस लड़की की शादी हो गई.

लेकिन गुड़िया की एक शिकायत भी है. गुड़िया का कहना है, "साइकिल हम लोगों को पहले ही देनी चाहिए. हम लोग 10वीं में पहुँच जाते हैं तब साइकिल मिलती है. नौवीं में मिलती तो अच्छा रहता. क्योंकि दसवीं में जाने के बाद एक ही साल तो साइकिल का इस्तेमाल हो पाता है."

इस्तेमाल

बिहार साइकिल

एनजीओ से जुड़ी प्रतिमा बताती हैं कि दरअसल ये योजना तो नौवीं से ही लागू होती है, लेकिन प्रक्रिया पूरी होते-होते बच्चियाँ दसवीं में पहुँच जाती हैं और वे सिर्फ़ एक साल ही साइकिल से स्कूल जा पाती हैं. वैसे जिनके पास पहले से साइकिल है, वे तो इसका इस्तेमाल पहले से ही करती हैं.

पास ही एक और गाँव में हमारी मुलाक़ात मानती कुमारी से हुई, जो विकलांग हैं. उन्हें साइकिल चलाना नहीं आता. लेकिन उन्हें साइकिल का पैसा मिल गया है.

चूँकि वो साइकिल नहीं चला पाती, उन्हें पैदल ही स्कूल जाना पड़ता है. यानी सरकार ने योजना लागू करते समय इस पहलू पर ध्यान नहीं दिया. मानती कुमारी कहती हैं, "हम पैसा लिए थे साइकिल के लिए. लेकिन साइकिल नहीं ख़रीदी गई. पैसा रखा हुआ है."

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की इस महत्वाकांक्षी योजना से जुड़ा एक और मामला सामने आया. जब पता चला कि कई लड़कियों के स्कूल बहुत नज़दीक हैं, इस कारण वे भी पैसा लेकर साइकिल नहीं ख़रीदती. क्योंकि मुश्किल से पाँच मिनट में ही वो स्कूल पहुँच जाती हैं. पूजा कहती हैं कि जब स्कूल इतना नज़दीक है, तो पैसा ख़र्च करने की क्या आवश्यकता.

'सकारात्मक पहल'

साइकिल, स्कूल

पास ही के पलंगा स्कूल के प्रधानाचार्य मोहनानंद झा कहते हैं कि वो तो सिर्फ़ सरकारी योजनाओं को क्रियान्वित करते हैं.

उन्होंने बताया, "सरकार हमसे छात्र-छात्राओं की संख्या पूछती है. संख्या के अनुरुप आवंटन राशि आती है. फिर हम रसीद लेकर राशि देते हैं." ये पूछे जाने पर कि क्या ये अजीब नहीं है कि साइकिल ख़रीदने से पहले ही रसीद मांगी जाती है.

इसके जवाब में मोहनानंद झा कहते हैं, "थोड़ा अजीब तो है ये और हमें रसीद इकट्ठा करने में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ती है. हम उनसे ये कहते हैं कि पहले वो ख़ुद से साइकिल ख़रीद लें और फिर रसीद देकर पैसा ले जाएँ." लेकिन रसीद वाले मामले में परेशानी उन परिवारों के साथ होती है, जिनके पास पैसा नहीं होता. कभी-कभी स्कूल ऐसे छात्र-छात्राओं को इसमें छूट देता है.

"ये पढ़ाई की ललक हो या फिर साइकिल लेने की, लेकिन उपस्थिति में ज़रूर बढ़ोतरी हुई है. ये भी सच है कि लड़कियों में स्वच्छंदता और उन्मुक्तता आई है और वे अपने को लड़कों के बराबर समझने लगी हैं. "

मोहनानंद झा, प्रधानाचार्य, पलंगा स्कूल

लेकिन असली समस्या रसीद देकर पैसा ले लेना और फिर साइकिल न ख़रीदना है. पलंगा स्कूल के प्रधानाचार्य का कहना है कि उनका आधार तो रसीद है और वो ये ज़रूर ये जानने की कोशिश करते हैं कि रसीद पक्की है या नहीं.

वे ये ज़रूर मानते हैं कि इस योजना से छात्रों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है. उन्होंने कहा, "ये पढ़ाई की ललक हो या फिर साइकिल लेने की, लेकिन उपस्थिति में ज़रूर बढ़ोत्तरी हुई है. ये भी सच है कि लड़कियों में स्वच्छंदता और उन्मुक्तता आई है और वे अपने को लड़कों के बराबर समझने लगी हैं. यह मनोविज्ञान तो बढ़ा है."

गौरव ग्रामीण महिला विकास मंच चला रहीं प्रतिमा भी कहती हैं, "हम जब ख़ुद भी उस उम्र में थे और साइकिल चलाते थे, तो अच्छा लगता था. आज अगर स्कूटी चलाते हैं और जो स्कूटी नहीं चलाते हैं उनसे ज़्यादा सशक्त महसूस करते हैं. हम ये भी महसूस करते हैं कि हम मर्दों से कम नहीं. उनके बराबर हैं. ऐसे कार्यक्रम की ज़रूरत है, लेकिन उसे और कंक्रीट बनाने की आवश्यकता है."

सर्वेक्षण

बिहार की सड़क

इस मुद्दे पर बिहार के शिक्षा मंत्री पीके शाही कहते हैं, "हम सर्वेक्षण कराते हैं और ये योजना 92 प्रतिशत तक सफल है. पाँच से आठ प्रतिशत अपवाद देखे गए हैं, जिसे मैं स्वीकार करता हूँ. लेकिन ये इतनी बड़ी योजना है. हम सात लाख लड़कियों को साइकिल देते हैं और अगर ये 92 प्रतिशत सफल है, तो मेरे हिसाब से ये 100 प्रतिशत सफल है."

"जहाँ बिजली के नंगे तार पर लोग कपड़ा सुखाते थे, वहाँ अब लोगों को बिजली मिल रही है. अब तो ज़िला मुख्यालय में बिजली 20-24 घंटे पहुँच गई है. अब लोग बिहार में बिजली की प्रशंसा कर रहे हैं. पहले लोग सड़क और अन्य चीज़ों की प्रशंसा तो करते ही थे अब उसमें बिजली जुड़ गई है"

नीतीश कुमार, मुख्यमंत्री, बिहार

लेकिन वे ये भी मानते हैं कि कुछ परिवारों में ऐसा होता है कि अगर एक लड़की को साइकिल मिल गई, तो अन्य के लिए वे पैसा तो ले लेते हैं, लेकिन साइकिल नहीं ख़रीदते. पीके शाही ने कहा, "एक परिवार में अगर तीन बच्चियाँ हैं, दो बच्चियों को साइकिल मिल चुकी है. तो शायद उनके माता-पिता के मन में ये लोभ हो कि इस पैसे का बेहतर सदुपयोग हो."

तो ये रही नीतीश कुमार की बहुचर्चित साइकिल योजना की सच्चाई. योजना की सभी सराहना करते हैं और इसका असर भी साफ़ दिखता है. लेकिन सरकार ने इसके क्रियान्वयन में गंभीरता नहीं दिखाई और उसी स्तर पर इस योजना में कई समस्याएँ दिखती हैं.

नीतीश के कार्यकाल में विकास की चर्चा ख़ूब हुई. सड़कें बनीं और बिजली व्यवस्था में भी सुधार हुआ है. लेकिन कई इलाक़ों में अब ये सड़कें टूटने लगी हैं. लोग फिर से शिकायत करने लगे हैं. शहरी इलाक़ों में लोग बिजली-पानी की भी शिकायत करते हैं.

बिजली और सड़क

बिहार में बिजली

बिहार और बिजली के नाम पर कई चुटकुले हैं. कहा ये भी जाता है कि बिहार में बिजली आना ख़बर है. लेकिन नीतीश इन आरोपों से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, "जहाँ बिजली के नंगे तार पर लोग कपड़ा सुखाते थे, वहाँ अब लोगों को बिजली मिल रही है. अब तो ज़िला मुख्यालय में बिजली 20-24 घंटे पहुँच गई है. अब लोग बिहार में बिजली की प्रशंसा कर रहे हैं. पहले लोग सड़क और अन्य चीज़ों की प्रशंसा तो करते ही थे अब उसमें बिजली जुड़ गई है."

"मुद्दा ये नहीं है कि विकास हुआ, मुद्दा ये है किस प्रकार का विकास हुआ. अगर मॉल बनाना विकास की शर्त है और अगर आठ लेन की सड़कों को, जो केंद्र की मदद से बनी है, उसे आप दिखाएँ, तो नामीबिया में दस लेन की सड़कें हैं, लेकिन बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. यहीं पर मशरख जैसी घटनाएँ होती हैं, यहीं पर फारबिसगंज जैसी घटनाएँ होती हैं. मैं समझता हूँ कि संगठित भ्रष्टाचार अगर गुजरात के बाद कहीं सबसे ज़्यादा है, तो वो बिहार में हैं. और यही नीतीश जी और मोदी जी में समानता है. इसलिए विकास से बड़ा विकास में भ्रष्टाचार की जो बयार बह रही है, वो बड़ा मुद्दा है"

मनोज झा, प्रवक्ता, राष्ट्रीय जनता दल

लेकिन राष्ट्रीय जनता दल को नीतीश कुमार के विकास के मॉडल में गुजरात मॉडल की बू आती है. पार्टी के प्रवक्ता मनोज झा का कहना है कि बिहार का विकास मॉडल भी गुजरात की तरह प्रचार-प्रसार पर आधारित है. हालाँकि वे मानते हैं कि राज्य में विकास हुआ है, लेकिन वे इसके लिए केंद्र सरकार को श्रेय देते हैं.

मनोज झा ने कहा, "मुद्दा ये नहीं है कि विकास हुआ, मुद्दा ये है किस प्रकार का विकास हुआ. अगर मॉल बनाना विकास की शर्त है और अगर आठ लेन की सड़कों को, जो केंद्र की मदद से बनी है, उसे आप दिखाएँ, तो नामीबिया में दस लेन की सड़कें हैं, लेकिन बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. यहीं पर मशरख जैसी घटनाएँ होती हैं, यहीं पर फारबिसगंज जैसी घटनाएँ होती हैं. मैं समझता हूँ कि संगठित भ्रष्टाचार अगर गुजरात के बाद कहीं सबसे ज़्यादा है, तो वो बिहार में हैं. और यही नीतीश जी और मोदी जी में समानता है. इसलिए विकास से बड़ा विकास में भ्रष्टाचार की जो बयार बह रही है, वो बड़ा मुद्दा है."

एक समय जनता दल यू के वरिष्ठ सदस्य रहे शिवानंद तिवारी भी बिहार में विकास के पैमाने पर सवाल उठाते हैं. वे कहते हैं, "चंद्रबाबू नायडू ने भी कहा था कि विकास के नाम पर क्लिंटन उनसे हाथ मिलाने गए थे. क्या हुआ चंद्रबाबू नायडू का. बिहार में ग़रीबी कितनी घटी. प्रति व्यक्ति आय में कितनी बढ़ोतरी हुई. विकास के बारे में नए ढंग से सोचना होगा. इस विकास नीति में आदमी को उपभोक्ता बना दिया गया है."

नीतीश कुमार की सरकार जिन क्षेत्रों में सुधार का दावा करती है, वो हैं....

  • क़ानून व्यवस्था की स्थिति में सुधार. आपराधिक मामलों के निपटारे के लिए अतिरिक्त न्यायालय का गठन
  • सड़कों का निर्माण. नीतीश सरकार का दावा कि उसने हज़ारों किलोमीटर सड़कें बनाई और बिहार का नक्शा बदल दिया.
  • महिला सशक्तिकरण. महिलाओं को पंचायती राज में 50 प्रतिशत आरक्षण. स्कूली लड़कियों को मुफ़्त साइकिल और पोशाक.
  • शिक्षा के क्षेत्र में सुधार. स्कूली बच्चियों और बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी. शिक्षकों की बड़ी संख्या में नियुक्ति.
  • स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार, सरकारी अस्पतालों की स्थिति सुधरी

बिहार में विकास को लेकर दावे-प्रतिदावे के बीच इतना तो ज़रूर सच है कि वहाँ लोकसभा चुनाव में व्यक्ति केंद्रित प्रचार ज़्यादा दिख रहा है और विकास के नाम पर वहाँ की जनता नीतीश की सरकार और उनकी पार्टी को कितने नंबर देगी, ये 16 मई को पता चलेगा.

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