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क्या दलित वोटरों को लुभा पाएगी भाजपा?

 शनिवार, 3 मई, 2014 को 11:53 IST तक के समाचार
भाजपा समर्थक

रामविलास पासवान के नेतृत्व वाली लोक जन शक्ति पार्टी के साथ गठबंधन और उत्तर प्रदेश से आने वाले दलित नेता उदित राज को पार्टी में शामिल किया जाना, भाजपा की अपने परम्परागत सवर्ण जाति वाले जनाधार में विस्तार की एक कोशिश है.

यह सही है कि भाजपा के परम्परागत जनाधार के बाहर शहरी उच्च जातियों और शहरी मध्य वर्ग में विस्तार हुआ है, लेकिन अभी भी पार्टी पर्याप्त संख्या में दलित मतदाताओं को लुभाने में सफल नहीं हो पाई है.

चुनाव सर्वेक्षणों के मुताबिक़ यहां तक कि क्लिक करें गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ या राजस्थान जैसे प्रदेशों में, जहां भाजपा ने हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में बहुत महत्वपूर्ण जीत हासिल की है, दलित मतदाता कांग्रेस और भाजपा के बीच बंटे रहे.

गुजरात में, जहां भाजपा पिछले कई वर्षों से सत्ता में रही है, अधिकांश दलितों ने क्लिक करें भाजपा की अपेक्षा कांग्रेस को वोट देना पसंद किया.

बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में दलितों का भाजपा की ओर झुकाव और कम रहा है, क्योंकि एक बड़ी संख्या में दलित मतदाता उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी को और बिहार में लोक जन शक्ति पार्टी को अपना मत देते हैं.

गठबंधन का तीर

मोदी पासवान

राष्ट्रीय स्तर पर भी यह कहानी अन्य राज्यों से अलग नहीं है. राष्ट्रीय स्तर पर केवल 12 से 14 प्रतिशत दलित मतदाताओं ने भाजपा को मत दिया.

उत्तर प्रदेश और बिहार में दलितों के बीच पैठ बना पाने में आ रही मुश्किलों को देखते हुए भाजपा ने बिहार में लोक जन शक्ति पार्टी और उत्तर प्रदेश में उदित राज की पार्टी के साथ गठबंधन करने फ़ैसला लिया.

भाजपा उम्मीद कर रही है कि गठबंधन से पार्टी को इन दोनों राज्यों में क्लिक करें दलित मतदाताओं की एक अच्छी संख्या मिलने में मदद मिलेगी.

लेकिन, क्या दलित वोट भाजपा के लिए इतने महत्वपूर्ण हैं? असल में बिहार और उत्तर प्रदेश में दलित मतदाताओं की बड़ी संख्या बेहद महत्वपूर्ण है.

बिहार में इनकी संख्या 16 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में कुल मतदाताओं के ये 21 प्रतिशत हैं. दलितों की इतनी बड़ी संख्या, कई चुनाव क्षेत्रों में उम्मीदवारों का भाग्य तय करने के लिए काफ़ी है.

उत्तर प्रदेश में ऐसे 44 लोकसभा क्षेत्र हैं, जहां दलितों की संख्या 20 प्रतिशत से ज़्यादा है. इसके अलावा 27 लोकसभा क्षेत्रों में दलितों की संख्या 15 से 20 प्रतिशत है.

सफलता मिल पाएगी?

दलित नेता उदित राज

उत्तर प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा केवल 10 सीटें ही जीत पाने में सफल रही और उसे 17.5 प्रतिशत वोट मिले.

उन लोकसभा क्षेत्रों में जहां दलितों की संख्या ज़्यादा है और यहां दलितों के लिए सीटें आरक्षित हैं, भाजपा को 16 प्रतिशत मत मिला था.

भाजपा को वोट में अपनी हिस्सेदारी में एक बड़ी वृद्धि की ज़रूरत है, ताकि इनमें से कुछ सीटों को जीता जा सके.

सीएसडीएस (सेंट्रर फॉर दि स्टडी ऑफ डेवेलपिंग सोसाइटीज़) के सर्वेक्षण से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे चल रही है.

इसकी संभावना अधिक है कि अन्य दलों के मुक़ाबले उत्तर प्रदेश में भाजपा सबसे ज़्यादा सीटें जीतने में सफल हो सकती है, लेकिन अब तक 57 सीटें जीतने के अपने सबसे उम्दा प्रदर्शन का रिकॉर्ड तोड़ने के लिए भाजपा को सवर्ण जाति के गढ़ वाले इलाक़ों के अलावा जाति आधारित समुदायों, ख़ासकर दलित मतदाताओं के वोटों की सख़्त ज़रूरत है.

भाजपा बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर झुकाने का सपना नहीं देख सकती. यहां तक कि यादवों को भी अपने पक्ष में लाना मुश्किल भरा काम है क्योंकि क्लिक करें समाजवादी पार्टी के पक्ष में उनका ध्रुवीकरण दिखता है.

इन परिस्थितियों को जानते हुए भाजपा ने उत्तर प्रदेश में उदित राज को अपनी पार्टी में शामिल कर एक दलित कार्ड खेला है.

दलित कार्ड

मायावती

सीएसडीएस की तरफ़ से कराए गए एक सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि 2012 के विधानसभा चुनावों में दलितों का एक वर्ग बसपा से दूर छिटक गया है. यह सही है कि उत्तर प्रदेश में उदित राज शायद ही कोई जनाधार रखते होंगे और यूपी के दलितों पर उनका कोई असर हो.

मुमकिन है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को इससे कोई फ़ायदा न मिले लेकिन यह भी सही है कि इस रणनीति से शायद ही उसे कोई नुक़सान उठाना पड़े.

इसी तरह, बिहार में लोकसभा की सात सीटें हैं, जहां दलितों की आबादी 20 प्रतिशत से ज़्यादा है और अन्य 23 लोकसभा क्षेत्रों में इनकी तादाद 15 फ़ीसदी है.

बिहार में संभावित त्रिकोणीय मुक़ाबले (भाजपा, कांग्रेस-राजद और जदयू) में अतिरिक्त मतदाताओं का कुछ प्रतिशत, दल या गठबंधन की जीत के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है. सवर्ण जाति के मतदाताओं में भाजपा का मज़बूत जनाधार है और वो पिछड़ी जातियों के मतदाताओं को भी आकर्षित करने में सफल रही है.

सीएसडीएस के हालिया सर्वेक्षणों से पता चलता है कि यादव एवं कुर्मी जातियों के मतदाताओं में कुछ विभाजन हुआ है, जो क्रमशः लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के मज़बूत समर्थक रहे हैं.

लोजपा का प्रभाव

नीतीश कुमार

जनता दल (यूनाइटेड) सरकार के बिहार में दलितों के लिए चलाई गईं तमाम कल्याणकारी योजनाओं से दलितों के बीच क्लिक करें जदयू का आधार बढ़ा है लेकिन दुसाध जाति के मतदाताओं में पासवान के प्रति झुकाव देखा गया है क्योंकि पासवान ख़ुद इसी जाति से हैं.

पिछले 2009 के लोकसभा चुनावों में लोक जनशक्ति पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी, लेकिन दुसाध समुदाय से जुड़े मतदाता राम विलास पासवान के वफ़ादार बने रहे.

बिहार में दलित जातियों में सबसे प्रभावी दुसाध जाति से राजद-लोजपा गठबंधन को 55 प्रतिशत मत मिले, जबकि भाजपा-जदयू गठबंधन को इस समुदाय से 21 प्रतिशत मत मिले.

बड़ी संख्या में दलित मतदाताओं ने निर्दलीय या छोटे दलों के उम्मीदवारों को वोट दिया.

दलितों के बीच पासवान की लोकप्रियता, ख़ासकर दुसाधों के बीच बहुत ज़्यादा है और उनमें अपने मतदाताओं को अन्य पार्टियों की ओर मोड़ देने की बड़ी क्षमता है.

इस स्थिति में उन लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा को लाभ मिल सकता है जहां दलितों की संख्या ज़्यादा है, ख़ासकर दुसाध मतदाताओं की.

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