चौबीसों घंटे धमाकों का डर

6 मई 2014 अतिम अपडेट 00:18 IST पर

करगिल से सिर्फ़ 50 किलोमीटर दूर है भीमभट्ट गांव. उन गांवों में एक जिसने करगिल युद्ध के दौरान ज़बर्दस्त बमबारी झेली है. यहां के रहने वाले अब इन धमाकों के आदी हो चुके हैं.
कश्मीर, लद्दाख, करगिल, भीमभट्ट, क़तार के आख़िरी
तोलोलिंग पहाड़ के ठीक सामने और टाइगर हिल के दाहिने जिसके बाएं है प्वाइंट 4875. करगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की ओर से आए चरमपंथियों ने इन्हीं चोटियों पर कब्ज़ा कर लिया था.
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क़रीब दो महीने चली लड़ाई के बाद चरमपंथियों को हटाया जा सका. द्रास स्थित करगिल मेमोरियल पर उस दौरान मारे गए 562 भारतीय जवानों और अफ़सरों के नाम दर्ज हैं.
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भीमबट्ट गांव के लोग बताते हैं कि बमबारी से क़रीब आधा गांव तबाह हो गया था और सात लोग मारे गए थे. मिट्टी के उस घर की खिड़कियों के टूटे शीशे 1999 की बमबारी की याद आज भी ताज़ा करते हैं.
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करगिल से क़रीब 50 किलोमीटर दूर भीमभट्ट वह गांव है, जो सबसे ज़्यादा बमबारी का शिकार हुआ. हालांकि बटालिक, काकसर जैसे इलाक़ों में भारी नुक़सान हुआ था.
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भीमभट्ट में करगिल युद्ध का स्मारक भी मौजूद है, जहां हर साल 26 जून को पाकिस्तान पर विजय की यादगार में कार्यक्रम होता है. भीमभट्ट गांव के लोगों की मानें तो वो दुनिया के दूसरे सबसे ठंडे इलाक़े में रहते हैं.
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मान्यताओं के मुताबिक इस गांव का नाम एक पत्थर के नाम पर पड़ा है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह असल में पांडव भाई भीमसेन का शरीर है जो पत्थर का हो गया था.
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लड़ाई के बाद बीते दिनों का आबाद गांव, लहलहाते खेतों का रंग, नक्शा बदल चुका था. घर वाले क़रीब एक महीने के बाद वापस आए, तो उनका घर तो बचा था लेकिन दूसरे कई घर तबाह हो चुके थे. ज़िंदगी को दोबारा पटरी पर लाने में उन्हें सालों लग गए.
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ग़ुलाम रहीम कहते हैं कि उनके गांव ने तबाही की क़ीमत तो चुकाई, लेकिन सरकार की ओर से नाममात्र की ही भरपाई हुई है.
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ग़ुलाम रहीम बताते हैं, "सबसे ज़्यादा डर इस बात का था कि अगर एक भी गोला हमारे घर पर गिर गया तो क्या होगा.. हम कैसे रहेंगे कड़कड़ाती ठंड के दिनों में. लगता था, अब मरे, तब मरे. आखिरकार ख़ुदा ने हमारे घर को बचा लिया."
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ग़ुलाम रहीम के 35 वर्षीय पुत्र शाहनवाज़ अली उन दिनों को याद करते हैं, "उस वक़्त रात को दिन जैसा माहौल था. रात में इतने गोले आते थे कि रात में दिन की तरह हर चीज़ नज़र आती थी. भयानक माहौल था. लोग अपने घरों के लिए तरस रहे थे."
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इसी गांव के रहने वाले 83-वर्षीय साथी हाजी ग़ुलाम रसूल शिकायत करते हैं, "हमारे लिए कुछ नहीं बदला, क्योंकि किसी को हमारी फ़िक्र नहीं. नेता सिर्फ़ सिर्फ़ वोट लेने आते हैं."
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लोगों की शिकायत है कि जितना नुक़सान इलाक़े को हुआ, उस लिहाज़ से लोगों तक मदद नहीं पहुंची. 1999 के बाद विकास हुआ है. सड़कें बनीं हैं. यह जगह पहले गुमनाम थी लेकिन जितनी तरक्की होनी चाहिए थी, उतनी नहीं हुई. बाज़ार में कुछ नहीं मिलता इसलिए लोग चावल-दाल खाने को मजबूर हैं.
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मेजर जनरल (रिटायर्ड) अशोक मेहता के मुताबिक़ घुसपैठिए चाहते थे कि वो लेह से करगिल जाने वाली सड़क पर निगाह रखने वाली चोटी के ऊपर क़ब्ज़ा करें जबकि भारत उन्हें रोकना चाहता था.
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भीमभट्ट गांव के बाशिंदों के लिए 1999 की यादें आज भी उतनी ही ताज़ा हैं जितनी उन दिनों थीं. उन दिनों की याद कर वे आज भी सिहर उठते हैं.
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बेरोज़गारी और सर्दियों में सब्ज़ियों, ईंधन की कमी से जूझ़ने वाले गांव भीमभट्ट की तक़लीफ उस जोज़िला दर्रे से भी बढ़ती है, जो साल में सात महीने बंद रहता है.
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कारगिल युद्ध 20 मई 1999 को शुरू हुआ था और 26 जुलाई को खत्म हुआ था.