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अप्रवासी मज़दूरः न मुद्दे, न मतदान

 रविवार, 4 मई, 2014 को 15:33 IST तक के समाचार
प्रवासी मजदूर

देश में चुनाव हैं, लेकिन सबके लिए नहीं. उन लोगों के लिए तो बिलकुल भी नहीं जो अपना घर-गांव छोड़कर दूसरे राज्यों में रोज़गार की तलाश में पहुंचे हैं.

केंद्रशासित प्रदेश दमण के शांत बस स्टैंड पर कई दिनों से खाली कुछ हाथ काम तलाश रहे हैं. कुछ आँखें हैं जो क़रीब आते हर शख़्स में ग्राहक देखती हैं और न मिलने पर उदास हो जाती हैं.

यूपी के गाज़ीपुर से आए 25 वर्षीय दीवान इन खाली हाथों और उदास आंखों की आवाज़ बनते हैं और बताते हैं, "रंगाई-पुताई का काम करते हैं, लेकिन पगार ही नहीं पड़ती है. काम के लिए खड़े हैं लेकिन दमण में इतनी महंगाई हो गई है कि काम ही नहीं मिलता. क्या करेगा, वापस यूपी भागना पड़ेगा."

महंगाई की मार

दीवान और उनके पांच साथी एक हज़ार रुपए महीने किराए के एक छोटे कमरे में रहते हैं, जिसमें पानी नहीं आता. काम की तंगी और खाने-पीने की चीज़ों की बढ़ती क़ीमतों ने उनके सस्ते कमरे को भी महंगा कर दिया है.

काम मिले तो दीवान और उनके साथी एक दिन में तीन सौ रुपए कमा लेते हैं. लेकिन आजकल काम महीने में सात-आठ दिन ही मिलता है. बाक़ी दिन बेकारी में बीतते हैं. इसके बावजूद वे यहां पिछले तीन साल से डटे हैं. रोज़ काम तलाशते हैं, मिलता है तो सब खुश, नहीं मिलता तो अगले दिन से उम्मीद लगा लेते हैं.

प्रवासी मजदूर

विजय चौहान 1994 में गोरखपुर से दमण आए थे. तब से यहीं हैं. मज़दूर से छोटे ठेकेदार तो बन गए हैं, लेकिन वोटर नहीं बन पाए हैं. महेंद्र गुप्ता 20-22 साल पहले यूपी से दमण आए थे और अब बच्चों के साथ यहीं बस गए हैं. साल में एक बार यूपी जाते हैं, लेकिन वोट डालने नहीं जाते. कहते हैं, 'हमें काम से मतलब है, राजनीति या वोट से नहीं.'

वोट न डालने का मलाल नहीं

मुश्ताक़ का परिवार क़रीब 20 साल पहले यूपी से दमण आया था. रंगाई-पुताई का काम करने वाले मुश्ताक़ की दिलचस्पी भी काम तक सीमित है. चुनाव के बारे में सोचना वे ज़रूरी नहीं समझते.

चुनावी मौसम में ये लोग चुनाव की बातें नहीं करते. सिर्फ़ वोट डालने के लिए वापस गांव जाना इन सबके लिए समझदारी नहीं है. इनमें से किसी को वोट न डाल पाने का मलाल भी नहीं. हां, इस बात का मलाल ज़रूर है कि अपने प्रदेश में काम न होने के कारण उन्हें अपने घर-परिवार से दूर होना पड़ा.

बीएन साहू 17 साल पहले बिहार के दरभंगा से मज़दूरी करने दमण आए थे. अब वे दमण और गुजरात की सीमा पर दुकान चलाते हैं. साहू की चुनाव में दिलचस्पी है, लेकिन वे वोट नहीं डाल पाएंगे. दमण में उनका वोट बन नहीं पाया है और वोट डालने वे बिहार जाएंगे नहीं.

गोली कौन खाए?

साहू कहते हैं, 'बिहार में बेरोज़गारी है, कमाने की कोई व्यवस्था नहीं है. नेता कुछ करते नहीं हैं.' वोट डालने के सवाल पर साहू कहते हैं, 'मेरा वोट बिहार में है, लेकिन मैंने आज तक वोट नहीं डाला है. बिहार में गुंडागर्दी है. मैं गोली खाने बिहार नहीं जाऊंगा.'

दमण का कार्ड बन गया होता, तो साहू वोट ज़रूर डालते. साहू कहते हैं, 'मैं देश का नागरिक हूं, लेकिन सक्रिय वोटर नहीं हूं. सरकार को उन लोगों के बारे में भी सोचना चाहिए जो घर से बाहर रहकर काम करते हैं.'

प्रवासी मजदूर

हालांकि साहू ने इस बार कार्ड बनने के लिए आवेदन कर दिया है. यदि उनका कार्ड बन गया, तो वे मतदान ज़रूर करेंगे.

उत्साहित वोटर

दादरा नगर हवेली की राजधानी सिलवासा की तस्वीर इस मामले में थोड़ी जुदा है. 1991 में आर्थिक उदारीकरण के दौर में सिलवासा में रोज़गार के अवसर बढ़े थे. उस ज़माने में यहां आए अधिकतर मज़दूर अब वोटर बन गए हैं और मताधिकार को लेकर उत्साहित हैं. यहां बिजली 24 घंटे रहती है और पानी की भी कमी नहीं है.

गुजरात के अमरेली से सिलवासा आकर बसे मोहम्मद भाई रिटायर्ड हैं और पेंशन पर गुज़ारा करते हैं. मोहम्मद भाई कहते हैं, 'सिलवासा में शांति है, लोग मतदान को लेकर उत्साहित हैं.'
केरल के तटीय इलाक़े में बसा माहे केंद्रशासित प्रदेश पुड्डुचेरी का हिस्सा है.

यहां भी ज़्यादातर मज़दूर बाहरी हैं. 18 साल के गौतम अगर अपने घर कोलकाता में होते, तो इस साल पहली बार वोट डालते.

गौतम बताते हैं, 'महीने में सात-हज़ार कमा लेता हूँ. कुछ दिन पहले ही माहे आया हूं. अब वोट डालने तो घर नहीं जा सकता और किसकी सरकार बने इससे हमारी ज़िंदगी पर फ़र्क भी क्या पड़ना है. हमें तो रोज़ मेहनत करनी है, रोज़ पेट भरना है.'

वोट के बहाने मां से मुलाक़ात

गुवाहाटी से आए 18 साल के ही आशिक रहमान भी उसी होटल में काम करते हैं, जिसमें गौतम को रोज़गार मिला है. लेकिन आशिक वोट डालना चाहते हैं. वो वोट डालने के बहाने अपनी मां-बहन से मिलना चाहते हैं.

दमण, सिलवासा और माहे में काम करने वाले ज़्यादातर मज़दूर यूपी, बिहार या अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों से आए हैं. यहां गुजरात या केरल के कम ही मज़दूर दिखाई देते हैं. सबके आने की वजह एक ही है, गृहराज्य में काम के अवसर न होना.

और इन प्रवासी मजदूरों में से अधिकतर को लगता है कि उनके वोट डालने से उन्हें घर के क़रीब रोजगार नहीं मिलेगा. शायद यही वजह है कि चुनावी मौसम में उनके लिए वोट डालने से ज़रूरी पेट की आग बुझाना हो गया है.

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