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कश्मीर में फिर नाराज़गी की झाँकी दिखेगी?

 मंगलवार, 29 अप्रैल, 2014 को 13:21 IST तक के समाचार
कश्मीर बीबीसी हैंगआउट में छात्रों की राय

हॉल में तक़रीबन दो-ढाई सौ छात्र-छात्राएँ. आगे की कुर्सियों पर बैठे लोगों की आँखों में उत्सुकता और हाव-भाव में एक अकुलाहट अपनी बात रखने की.

भारत प्रशासित कश्मीर के बारामूला में एसएसएम कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड टेक्नॉलॉजी में क्लिक करें बीबीसी कैंपस हैंगआउट के तहत बात होने वाली थी. विषय था- "क्या कश्मीर की आवाज़ दिल्ली तक पहुँचती है?"

अभी कार्यक्रम शुरू होने में कुछ समय था. हम आम चुनाव को लेकर उनकी राय जानने को उत्सुक थे. प्रस्तुतकर्ता विनीत ने कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत से पहले माहौल को समझने और हल्का करने के लिए बातचीत शुरू की.

पहला सवाल पूछा, "आपमें से कितने लोग इस बार वोट देने वाले हैं." मेरी भी जवाब जानने में दिलचस्पी थी. उस छात्र समूह की ओर देखा तो पाया कि एक भी हाथ ऊपर नहीं था.

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नाराज़ग़ी

मैंने और विनीत ने एक दूसरे की ओर देखा. हमें मालूम था कि लोगों की भावनाएँ क्या हैं मगर हम इस एकतरफ़ा जवाब की अपेक्षा नहीं कर रहे थे.

अभी हम इस पर कुछ प्रतिक्रिया दे पाते कि सामने से आवाज़ें आनी शुरू हो गईं. 'हम किसके लिए वोट करें, गोली खाने के लिए. हमें यहाँ क्या सुविधाएँ मिली हैं. हम भारत के साथ रहना ही नहीं चाहते.'

हमने उन्हें आश्वस्त किया कि उन्हें कार्यक्रम में अपनी बात रखने का पूरा मौक़ा दिया जाएगा. हम किसी की आवाज़ नहीं दबाएँगे.

इसके बाद लगभग सवा घंटे के कार्यक्रम में जब छात्र-छात्राओं ने अपनी बात रखी तो उनका ग़ुस्सा, उनका दर्द और उनकी खीझ सामने आई.

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चुनाव का बहिष्कार

कश्मीर बीबीसी हैंगआउट में छात्रों की राय

अनम ने पहली ही लाइन में कहा, "मैं 21 साल की हूँ और मैं वोट करने नहीं जा रही." फिर उन्होंने इसकी वजह भी बताई. बोलीं, "भारत कहता है कि कश्मीर उसका अटूट हिस्सा है मगर वो ऐसा मानता नहीं है. देखिए हमें सुविधाएँ कितनी कम दी गई हैं."

अनम का कहना था, "मैं चार साल बाद एक कंप्यूटर इंजीनियर बनूँगी तो यहाँ मेरे लिए रोज़गार के मौके ही नहीं होंगे. मुझे तो टीचर बनना पड़ेगा मगर मुझे वो नहीं चाहिए. यहाँ वो सुविधाएँ क्यों नहीं दी जाती कि हमें यहीं रोज़गार मिले."

उन्होंने कहा कि कश्मीर में बेरोज़गारी की वजह से युवा परेशान है और वोट करने के बारे में सोचना भी नहीं चाहता.

राबिया ने भी रोज़गार का मसला उठाया, "हमने उमर अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाया, ये सोचकर कि वह युवा हैं कुछ बदलाव लाएँगे. मगर वह क्या लाए- ज़ुबिन मेहता. हमें ज़ुबिन नहीं डेल और विप्रो चाहिए."

सेना की मौजूदगी

बहस गर्म हो रही थी. ऐसे में कश्मीर में सेना की मौजूदगी पर भी सवाल उठे. मगर सवाल एक घटना से जोड़कर पेश किया गया.

जुनैद ने कहा, "हम सिर्फ़ अपना हक़ चाहते हैं. मुंबई में आतंकी हमले होने के बाद वहाँ तो सड़कों पर सेना नहीं घूमती, तो यहाँ हमले के बाद सेना क्यों हर जगह आ जाती है. हम कश्मीर से बाहर जाएँ तो हमें हमेशा शक़ की नज़र से देखा जाता है."

कश्मीर बीबीसी हैंगआउट में छात्रों की राय

एक अन्य छात्रा हुदा की आवाज़ में ग़ुस्सा था. उन्होंने कहा, "मैं वोट नहीं करूँगी. मैं उनके लिए वोट क्यों करूँ, जिन्होंने मेरे भाइयों को गोली मार दी, मेरी बहनों का बलात्कार किया. गाँवों में जाइए तो देखेंगे कि बड़ी तादाद ऐसी औरतों की है जो या तो बेवाएँ हैं या उन्हें पता भी नहीं कि उनके शौहर कहाँ हैं."

हुदा का कहना था, "हमें अपना भविष्य ही पता नहीं. दिल्ली में गैंगरेप करने वालों को तो फाँसी मिली मगर यहाँ जो सेना के लोग बलात्कार करते हैं उनका क्या?"

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'वोट किसके लिए?'

ताबिंदा ने कहा, "मैं बॉयकॉट की बात नहीं करती. मैं वोट डालना चाहती हूँ, मगर मुझे पता ही नहीं कि मुझे वोट किसे करना है. अगर मैंने पिछले 21 सालों में देखा होता कि किसी मंत्री ने काम किया है, तो मैं सोचती कि मैं वोट ज़रूर दूँगी."

ताबिंदा सुरक्षा का मसला उठाते हुए बोलीं, "मैं अगर वोट देना भी चाहूँ तो वहाँ इतने पुलिस वाले होते हैं कि कर्फ़्यू जैसे माहौल में मैं कैसे जाऊँ वोट देने. दिल्ली में तो जब मतदान हुआ था तो वहाँ माहौल सामान्य था मगर यहाँ क्यों कर्फ़्यू जैसी स्थिति हो जाती है?"

नादिया ने पहली ही लाइन में कहा, "मैं मतदान नहीं करूँगी. हमारे जो अहम मुद्दे हैं वे बरक़रार हैं. जब हमारे भाई सड़कों पर निकलते हैं तो उनसे पहचान पूछी जाती है, सेना हमें कहीं भी रोककर पूछताछ करती है."

हामिद ने आज़ादी की माँग उठाई. बोले, "कश्मीरियों के लिए भारतीयों का रवैया ठीक नहीं है. कश्मीर के युवा की माँग आज़ादी है. भारत के पढ़े-लिखे लोग भी हमारी भावनाएँ नहीं समझते."

इलियास अहमद ने अब तक के चुने हुए प्रतिनिधियों के काम को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया. इलियास बोले, "चुनाव में हम अपने लोग चुनते हैं, वो बंदा जो हमारे मसले हल करेगा. मगर जो सरकार एसएमएस पर से प्रतिबंध भी नहीं हटा सकती वो हमारा प्रतिनिधित्व क्या करेगी?"

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धारा 370 का पहलू

कश्मीर हैंगआउट में बीबीसी संवाददाता विनीत खरे

चूँकि बहस का मुद्दा ये था कि दिल्ली तक कश्मीर की आवाज़ पहुँचती है या नहीं तो लाज़िमी था कि दिल्ली में मौजूद युवाओं से भी पूछी जाए उनकी राय.

जामिया के छात्र ज़मर्रूद मुग़ल ने कहा, "ग़लती सिर्फ़ सरकार की ही नहीं है. मैं पिछले 5-6 साल से दिल्ली में हूँ और मेरे भाई-बहन जो सोचते हैं कि कश्मीर से बाहर जाने वालों के साथ बुरा बर्ताव होता है तो वे ग़लत सोचते हैं."

ज़मरूद ने सिक्के का एक दूसरा पहलू भी सामने रखा, "आपने कहा कि ज़ुबिन मेहता आए तो कश्मीर बंद हो गया. और हुर्रियत कांफ़्रेंस की माँग पर 10-15 दिन जो कश्मीर बंद रहता है उसका ज़िम्मेदार कौन है?"

उन्होंने बेरोज़गारी का मसला भी उठाया, "बेरोज़गारी का जो हाल कश्मीर में है, वो पूरे भारत में है. आप कहते हैं कि वहाँ बाहर की कंपनियाँ नहीं आतीं और फिर जब धारा 370 हटाने की बात होती है तो गिलानी साहब का बयान आता है कि ऐसा नहीं होना चाहिए, तो बाहरी कंपनियाँ आएँगी कैसे?"

बहस उत्तेजक हुई तो कभी भावुक भी. छात्रों में रोष दिखा तो कुछ की आँखों में आँसू भी आए, आवाज़ काँपी भी. मगर जो संदेश उन्होंने वहाँ मुखर होकर दिया वो ये था कि वे वोट देना नहीं चाहते.

इतने छात्रों और वोट न देने की बहुमत वाली राय के बीच हो सकता है चुनाव का समर्थन करने वाली कुछ आवाज़ें खुलकर सामने न भी आ पाई हों.

मगर कार्यक्रम के बाद मन में सवाल बरक़रार था कि क्या कश्मीर में बचे हुए चरणों के मतदान में इसी नाराज़ग़ी की झाँकी दिखने वाली है?

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