‘कुत्ते को जीने का हक़ है, किन्नर को क्यों नहीं?’

  • 2 मई 2014

शबनम मौसी का नाम देश की पहली किन्नर विधायक के तौर पर इतिहास में दर्ज हो चुका है, अब से 14 साल पहले पूरे भारत में उनके नाम की चर्चा थी लेकिन अब वो बिल्कुल अकेली और उदास हैं.

ये अकेलापन और उदासी उनकी ज़िंदगी में पहली बार नहीं आई है बल्कि ज़िदगी का हिस्सा रही है. महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुईं शबनम मौसी के पिता आईपीएस अधिकारी थे लेकिन उन्हें आदिवासियों ने पाला.

वो चाहती हैं कि अगले जन्म में वही आदिवासी उनके माता-पिता बनें. शबनम मौसी दूसरी दिशा में सिर घुमाकर कहती हैं, “मैं अपने माता-पिता के बारे में कुछ नहीं जानती. जब उन्होंने ही मुझे प्यार नहीं दिया तो हम उनके बारे में क्या सोचें और क्या जानें?”

फ़रवरी 2000 में हुए उपचुनाव में जब शबनम मौसी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मध्य प्रदेश के सोहागपुर विधानसभा क्षेत्र से खड़ी हुईं तो देशभर में शोर मच गया.

चुनाव परिणाम आने तक यह चुटकुलेबाज़ी का दौर चला लेकिन जब नतीजे आए तो बड़े-बड़े सूरमा चौंक गए.

जनता ने शबनम मौसी पर भरोसा जताया और वे 18 हज़ार से भी अधिक वोटों से जीत गईं.

साल 2003 में जब फिर से चुनाव हुए तो यह शबनम मौसी का ही असर था कि सिर्फ़ मध्य प्रदेश में 108 किन्नर चुनाव मैदान में थे लेकिन सारे किन्नर हार गए, शबनम मौसी भी.

चुनाव हारने के बाद एक-एक कर लोग हटते चले गये. शबनम मौसी अकेली रह गईं.

मौसी का जलवा

शबनम मौसी जब विधायक थीं तो उनके आगे-पीछे लोगों की भीड़ रहती थी. मध्य प्रदेश के विधायक, मंत्री और अधिकारी उनसे घबराते थे.

शबनम मौसी किसी दफ़्तर में सामने के दरवाज़े से घुसतीं तो उनके काम में टाल-मटोल करने वाले मंत्री-अधिकारी पिछले दरवाज़े से यह कहते हुए निकल जाते थे कि मौसी से कौन उलझे. हर तरफ़ शबनम मौसी का शोर था.

विधानसभा और उसके बाहर शबनम मौसी के क़िस्से तैरते रहे. किस अधिकारी ने मौसी को देखते ही झटपट काम कर दिया और किस अधिकारी को मौसी ने जाने किन-किन भाषाओं में खरी-खोटी सुनाई.

लेकिन विधायकी गई तब से हर तरफ़ सन्नाटा है. मंदिर से बाहर गर्मी की इस दोपहरी में यह सन्नाटा और गहरा जाता है.

साईं बाबा का यह मंदिर शबनम मौसी ने ही बनवाया है और अब वे वहीं अकेली रहती हैं.

शबनम मौसी बताती हैं कि वे चुनाव हार गईं क्योंकि विपक्षी दलों ने जनता को दारू, मुर्गा और पैसों से अपनी ओर खींच लिया. हालांकि उन्हें उम्मीद है कि जनता जब इन ‘गंदे’ नेताओं से ऊबेगी तो उन्हें फिर याद करेगी. वे लोकसभा का चुनाव तो नहीं लड़ रहीं लेकिन उनका फिर से विधानसभा चुनाव लड़ने का इरादा है.

नेताओं को गंदा कहने के पीछे उनका तर्क है. वे कई नेताओं और धर्म गुरुओं का नाम लेते हुए कहती हैं, “उनके चरित्र गंदे हैं. ग़रीबों की मजबूरी का फ़ायदा उठाते हैं, उन्हें वासना का शिकार बनाते हैं. उनकी हत्या कर देते हैं.”

तिरस्कार की नज़र

मंदिर के छत की ओर देखती हुई शबनम मौसी कहती हैं, “जहाँ भी किन्नर हैं, वहाँ उनको सम्मान की नज़र से देखना चाहिए. वो भी इंसान हैं. उनके शरीर में दिल धड़कता है.”

शबनम मौसी कहती हैं कि किन्नरों को थर्ड जेंडर का दर्जा और आरक्षण देने का फ़ैसला करने वाले जजों का नाम स्वार्णाक्षरों में दर्ज किया जाना चाहिए.

शबनम मौसी कहती हैं, “लोग अपने कुत्ते को पालते हैं. उसको कितनी इज़्ज़त देते हैं. कितने प्यार से उसको खाना खिलाते हैं. गाड़ियों में बिठाते हैं. उसको बिस्तर पर सुलाते हैं. वो तो एक कुत्ता है. जब आप उसे जीने का अधिकार देते हैं तो एक किन्नर को क्यों नहीं?”

बचपन के दिनों के बारे में कुरेदने पर वे कहती हैं, “मैं बचपन से किन्नरों के साथ रही हूं. मुझे पहली याद ये है कि मैं नाचती थी और किन्नर लोग मुझे उठा कर अपने साथ ले गए थे. बड़ी-बड़ी जगहों पर हमारा सम्मेलन होता था, उन जगहों का नाम मैं नहीं जानती थी.”

वे कहती हैं, “हमको कोई काम पर रखता नहीं था. हमें अच्छा नहीं समझते थे, बुरा समझते थे. गंदी निगाह और तिरस्कार की नज़र से देखते थे, जैसे हम छूत की बीमारी हों.”

हिम्मत करके उनसे पूछता हूँ कि कई किन्नर तो देह व्यापार के पेशे में भी हैं? इस पर वे कहती हैं, “असली किन्नर सेक्स के धंधे में नहीं रहते हैं. दो तरह के किन्नर हैं, एक असली और एक नकली. नकली किन्नरों का बाज़ार बहुत बड़ा है.”

शबनम मौसी बताती हैं कि कई बार लोगों ने उनके साथ ‘ग़लत काम’ करने की कोशिश की. वे कहती हैं, “उम्र के इस पड़ाव तक आते-आते मैंने क्या-क्या झेला है, क्या बताऊँ? ”

तालियाँ अब भी बजती हैं

बचपन से अब तक नवजात शिशुओं वाले घर में जाकर बधाई गाने और उन्हें आशीष देने का पेशा शबनम मौसी ने कभी नहीं छोड़ा.

विधायक बनने के बाद कई लोगों ने उन्हें सलाह दी कि अब ये नाचना-गाना बंद कर दें लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं हैं.

वे कहती हैं, “जब विधायक थी, तब विधायक होने की ड्यूटी निभाई, लेकिन ये तो मेरी स्थाई ड्यूटी है. आदमी को अपनी औक़ात नहीं भूलनी चाहिए. अब विधायक नहीं हूं तो अपने पुराने पेशे में हूं. मैं अपना काम क्यों छोड़ूँ?”

वे अकेली ही घरों में जाती हैं. चेले थे लेकिन शराबख़ोरी और दूसरी आदतों के कारण उन्होंने सारे चेलों को भगा दिया.

अब पहले जैसी मुखिया-चेले परंपरा की बात भी नहीं रही, जब चेले अपने गुरु के साथ रहते थे और गुरु के इशारे पर जान देने को तैयार रहते थे. शबनम मौसी कहती हैं, “अब वे साथ नहीं रहते. अपना हिस्सा लेकर अपने-अपने घर चले जाते हैं.”

शबनम मौसी को कहीं बाहर जाना है. मंदिर में पूजा कैसे होगी और घर पर कौन रहेगा, इसका इंतज़ाम करने के लिए पहचान वालों को फ़ोन लगा रही हैं.

बात ख़त्म होती है तो वे थोड़े इत्मीनान से हेडफ़ोन लगाकर गाने सुनती हैं. इशारे से कहती हैं- इसे सुनिए.

मोबाइल से जुड़े हेडफ़ोन पर बेग़म अख़्तर की आवाज़ आ रही है, “अब छलकते हुए सागर नहीं देखे जाते, तौबा के बाद ये मंज़र नहीं देखे जाते.”

मैं शबनम मौसी से विदा लेकर मंदिर की सीढ़ियाँ उतरता हूँ. जूते के फीते बाँधते हुए बेग़म अख्तर की आवाज़ कान में गूंज रही है. गली में सन्नाटा पसरा है.

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