रायगंज में जहां देवर भाभी हैं आमने सामने

  • 15 अप्रैल 2014
दीपा दासमुंशी

पश्चिम बंगाल में उत्तर दिनाजपुर ज़िले की रायगंज संसदीय सीट पर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है, लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में जहां प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार एक-दूसरे के ख़िलाफ़ लगातार जहर उगल रहे हैं, यहां तस्वीर एकदम उलट है.

यहां इन दोनों दलों के उम्मीदवारों ने अब तक एक-दूसरे के ख़िलाफ़ कोई निजी टिप्पणी तक नहीं की है. और करें भी कैसे? आख़िर यह दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वी देवर-भाभी जो हैं.

यहां पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी की राजनीतिक विरासत हासिल करने के लिए देवर-भाभी के बीच दिलचस्प जंग छिड़ी है.

राज्य में लोकसभा चुनावों के पहले दौर में इस सीट के लिए 17 अप्रैल को मतदान होगा.

रायगंज को कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी लंबे अरसे तक यहां से जीतते रहे हैं. उनकी बीमारी और इस्तीफ़े के बाद पिछली बार उनकी पत्नी दीपा दासमुंशी ने यह सीट जीती थी.

लेकिन तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने अब की बार दीपा के मुकाबले प्रियरंजन दासमुंशी के भाई सत्यरंजन दासमुंशी को मैदान में उतार कर मुक़ाबले को दिलचस्प बना दिया है. दासमुंशी बरसों से भले ही दिल्ली के अस्पताल में कोमा में हों, रायगंज में वही दो प्रमुख दलों - कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का सबसे बड़ा हथियार बन गए हैं.

कालाहांडी: बार-बार चढ़ती काठ की हांडी

विरासत की जंग

परिवार के बीच ही राजनीतिक जंग होने की वजह से दोनों एक-दूसरे के ख़िलाफ़ निजी हमलों से बच रहे हैं.

दीपा कहती हैं, ''यहां कांग्रेस और वाममोर्चा के बीच सीधा मुक़ाबला होता रहा है, लेकिन मैं तृणमूल उम्मीदवार के बारे में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहती.''

क्या सत्यरंजन के मैदान में उतरने से से उनकी जीत की संभावना कुछ कम हुई है? इस सवाल पर दीपा कहती हैं, ''यह लोकतंत्र है. सत्यरंजन बाबू को किसी भी पार्टी में शामिल होने का अधिकार है, लेकिन उन्होंने पूरे जीवन में कभी राजनीति नहीं की है.''

उनका आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस अपना राजनीतिक हित साधने के लिए ही दासमुंशी नाम का इस्तेमाल कर रही है.

सत्यरंजन दासमुंशी

ममता बनर्जी और दीपा के बीच छत्तीस का आंकड़ा रहा है. पिछले सप्ताह इलाक़े में अपनी चुनावी रैलियों में ममता बनर्जी ने कांग्रेस पार्टी और दीपा दाशमुंशी की जमकर बखिया उधेड़ी थी, लेकिन पार्टी उम्मीदवार सत्यरंजन दीपा के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कहते हैं.

सत्यरंजन कहते हैं, ''यह पारिवारिक लड़ाई है. रिश्ते में देवर-भाभी होने की वजह से हम एक-दूसरे के ख़िलाफ़ टिप्पणी से बच रहे हैं.''

दीपा पिछले लोकसभा चुनावों में दासमुंशी के भरोसे और नाम के सहारे ही जीती थीं. उससे पहले वर्ष 2006 में उन्होंने ज़िले की ग्वालपोखर सीट से विधानसभा चुनाव जीता था, लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने अबकी उनके मुकाबले दासमुंशी के भाई को मैदान में उतार कर इलाक़े में चुनावी समीकरण को दिलचस्प बना दिया है.

मोदी को बनारस के लोग नकार देंगे: अजय राय

आरोप प्रत्यारोप

मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी की ओर से यहां पूर्व सांसद मोहम्मद सलीम मैदान में हैं. उत्तर दिनाजपुर ज़िला कांग्रेस के अध्यक्ष मोहित सेनगुप्ता सत्यरंजन की तुलना प्रवासी पक्षी से करते हुए कहते हैं, ''दीपा से उनका कोई मुक़ाबला ही नहीं है.''

दीपा हों या सत्यरंजन, दोनों को अपनी जीत के लिए दासमुंशी के नाम का ही भरोसा है. यह सीट वर्ष 1999 से ही दासमुंशी परिवार के क़ब्ज़े में रही है.

सत्यरंजन कहते हैं, ''वर्ष 2009 में कांग्रेस ने प्रियरंजन की जगह चुनाव लड़ने के लिए पहले मुझसे ही संपर्क किया था, लेकिन मैंने अपनी जगह भाभी को टिकट देने का सुझाव दिया था.''

उनका आरोप है कि भैया यानी दासमुंशी के नाम के सहारे चुनाव जीतने के बावजूद भाभी इलाके में विकास का काम करने में नाकाम रही हैं.

''यह निजी नहीं बल्कि रायगंज के विकास के लिए राजनीतिक लड़ाई है. चुनाव का नतीजा चाहे जो भी हो, भाभी के प्रति उनका सम्मान जस का तस रहेगा.''

रायगंज में एम्स जैसा एक अस्पताल खोलना प्रियरंजन का सपना था, लेकिन बरसों से कांग्रेस और तृणमूल के बीच इस पर तलवारें खिंची हैं.

हाल में इलाके में एक चुनावी रैली करने वाली ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि इतने दिनों तक केंद्र की सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस ने इस अस्पताल के लिए जमीन के अधिग्रहण का कोई प्रयास नहीं किया.

वॉल राइटिंग

दूसरी ओर, दीपा इसके लिए ममता बनर्जी सरकार को ज़िम्मेदार ठहराती हैं. वो कहती हैं, ''मुख्यमंत्री की आपत्ति के चलते ही यहां एम्स की स्थापना का मामला आगे नहीं बढ़ सका है. जो पार्टी प्रिय बाबू के सपने को साकार करने की राह में सबसे बड़ी बाधा बन गई, वही अब उनके सपने पूरे करने की बात कर रही है. इससे ज्यादा हास्यापद स्थिति कुछ और नहीं हो सकती.''

दावे और गणित

इधर, माकपा उम्मीदवार मोहम्मद सलीम को दासमुंशियों की इस लड़ाई में अपना फ़ायदा नजर आ रहा है. वे कहते हैं, ''इस पारिवारिक लड़ाई की वजह से वोटर अबकी माकपा का ही साथ देंगे.''

सलीम कहते हैं, ''यहां कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस दोनों एक-दूसरे पर इलाके में विकास नहीं करने का आरोप लगा रहे हैं. इससे साफ़ है कि दोनों दलों ने विकास के नाम पर इलाके में कुछ भी नहीं किया है.''

इलाके में अल्पसंख्यक वोटरों की तादाद 45 फीसदी है. इसलिए तमाम दल उन्हें अपने पाले में लेने का प्रयास कर रहे हैं. दीपा कहती हैं, ''यहां मुसलमानों का समर्थन हमें ही मिलेगा. भाजपा को रोकने के लिए हमारे अलावा कोई विकल्प नहीं है.''

सलीम उनके इस दावे को खारिज करते हैं. वह कहते हैं, ''पहले मुसलमान वोट कांग्रेस और माकपा के बीच बंटे थे. अब कांग्रेस का असर घटने की वजह से ऐसे वोटर फिर हमारे पाले में लौटेंगे.''

इस सीट के नतीजे से साबित होगा कि कांग्रेस ने यहां अपना वोट बैंक सुरक्षित रखा है या फिर तृणमूल ने उसमें सेंध लगा दी है.

तृणमूल की सेंधमारी की स्थिति में माकपा को यहां अपना फायदा दिख रहा है. कुल मिला कर एक-दूसरे के वोट बैंक में सेंधमारी और अल्पसंख्यक वोटरों के समर्थन से ही इलाके का अगला सांसद तय होगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)