सुर्ख़ियों से क्यों ग़ायब हैं राहुल गांधी?

  • 13 अप्रैल 2014
राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी

ऐसा लगता है मानों 'मोदी-मस्त' भारतीय मीडिया अब राहुल गांधी से भी मस्ती लेने के मूड में भी नहीं है. क्या 27 जनवरी से 12 अप्रैल तक का समय एक लंबा अरसा होता है? अगर भारतीय मीडिया से पूछें तो हाँ.

27 जनवरी के दिन समाचार चैनल 'टाइम्स नाओ' पर राहुल गांधी के इंटरव्यू के बाद लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि 'शहज़ादे' में 'शहंशाह' बनने के गुण नहीं हैं, उनमें 'करिश्मा' नहीं है.

पारंपरिक मीडिया और न्यू मीडिया दोनों में राहुल बाबा मज़ाक और कॉमेडी का एक विषय बन गए.

सोशल मीडिया पर उनकी खिल्ली उड़ाने वालों ने उन पर बेरहमी से प्रहार किया.

लेकिन उस इंटरव्यू के कारण राहुल गांधी का सब से बड़ा नुकसान यह हुआ कि मध्यम वर्ग के मतदाताओं में मायूसी की एक लहर का दौड़ गई. उन्हें लगा राहुल एक दबंग नेता नहीं हैं. अपनी इस बिगड़ी छवि को सुधारने के लिए वो एक बार फिर टीवी पर लोगों से रूबरू हुए.

सुर्खियों की तलाश

12 अप्रैल को इंडिया टुडे ग्रुप के न्यूज़ चैनल आज तक और हेडलाइंस टुडे को दिए गए साक्षात्कार में राहुल ने मध्यम वर्ग के वोटरों तक पहुँचने की कोशिश की. इस बार उनका प्रदर्शन काफ़ी बेहतर रहा.

टुडे ग्रुप ने इंटरव्यू के फ़ौरन बाद सोशल मीडिया ट्विटर का एक जायज़ा लेते हुए कहा ट्विटर पर 66 प्रतिशत 'कमेंट्स' राहुल के पक्ष में थे

मीडिया में राहुल के इस इंटरव्यू की चर्चा लगभग नहीं के बराबर रही. द हिन्दू, टाइम्स ऑफ़ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस जैसे बड़े अख़बारों ने पहले पन्ने पर राय बरेली में राहुल के नामांकन पत्र दाखिल करने की ख़बर को तो जगह दी लेकिन सुर्ख़ियों में नहीं. सुर्ख़ियों में छाये रहे नरेंद्र मोदी.

सोशल मीडिया पर भी कुछ ऐसा ही हाल था. ट्विटर पर लोगों ने कमेंट्स तो किए लेकिन जिस तेज़ रफ़्तार से 27 जनवरी वाले इंटरव्यू पर टिप्पणियाँ आ रही थीं उसके मुक़ाबले इस बार ये रफ़्तार काफ़ी धीमी थी.

केजरीवाल बनाम मोदी

राहुल के मीडिया मैनेजर्स ने मुझे बताया था कि टाइम्स नाओ के इंटरव्यू के बाद अब भारतीय चैनलों को इंटरव्यू के लिए चुनते समय इस बात का ध्यान रखा जाएगा कि राहुल अपना पैग़ाम मध्यम वर्ग तक पहुंचा सकें और इससे नीचे वर्ग के लोगों पर भी असर हो.

लेकिन आज सुबह जब राहुल के मीडिया मैनेजर्स ने जब अख़बारों का जायज़ा लिया होगा तो उन्हें मायूसी ज़रूर हुई होगी.

नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल

आज सुबह के अख़बारों में भी मोदी छाए रहे. पिछले साल हुए पाँच राज्यों के चुनाव के समय से ही मोदी अख़बारों की सुर्ख़ियों में बने रहे रहे हैं.

कुछ हफ़्तों के लिए दिल्ली सरकार बनाने और फिर इसे छोड़ने तक आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने मोदी को सुर्ख़ियों से ज़रूर हटा दिया था लेकिन मोदी की सुर्ख़ियों में न केवल वापसी हुई है बल्कि अब उन्हें हटाना मुश्किल है.

ज़रा कल्पना कीजिए, सत्तारूढ़ कांग्रेस का उपाध्यक्ष, पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद का अनौपचारिक उम्मीदवार और सब से अहम गांधी परिवार का चिराग़ होने के बावजूद मीडिया ने उन्हें घास नहीं डाली.

'मोदी-मस्त' मीडिया

ऐसा मुमकिन है कि अगर वो वही ग़लतियां करते जो अपने पहले इंटरव्यू में किया था तो वो पहले पन्ने पर नमूदार ज़रूर होते.

राहुल और उनके सलाहकार हैरान होंगे कि सुर्ख़ियों में आने के लिए अब क्या करें? भारतीय मीडिया के इस रूखेपन से साफ़ ज़ाहिर होता है कि अब 'मोदी-मस्त' मीडिया ये मान कर चल रही है कि चुनाव के बाद देश का सब से अहम नेता कौन होगा?

राहुल संजीदा हैं और वो जो बातें देश के बारे में कहते हैं वो दिल से कहते हैं. इस बात से शायद सभी सहमत होंगे. लेकिन वो मोदी नहीं हैं.

मोदी, मायावती, राहुल गांधी, नवीन पटनायक और अन्य नेता

मोदी एक विवादास्पद व्यक्ति हैं. वह 2002 के गुजरात दंगों के कारण अपने दामन में लगे दाग़ को साफ़ नहीं कर सके हैं.

अब तक अपनी पत्नी को सार्वजनिक रूप से स्वीकार न करने वाले मोदी अब एक बार फिर शादीशुदा हैं. इन सबके अलावा वह बोलने में माहिर हैं.

कौन है आकर्षक नेता?

नरेंद्र मोदी की भाषा राहुल के मुकाबले लोगों से अधिक जुड़ती है और सरल है. हर तरह से वह मीडिया के लिए राहुल से अधिक आकर्षक नेता हैं. तो ऐसे में शायद राहुल को मीडिया से मलाल नहीं होना चाहिए.

राहुल के इंटरव्यू अभी खत्म नहीं हुए हैं. उनके सलाहकारों ने हमें बताया कि उनकी कई इंटरव्यू देने की योजना है. राहुल गांधी को इस बात का श्रेय जाना चाहिए कि 27 जनवरी के इंटरव्यू की आलोचना के बावजूद वह आगे इंटरव्यू देने के लिए तैयार हैं.

कम से कम उन्हें इस बात का इत्मिनान होना चाहिए कि उन्होंने मीडिया को लंबे इंटरव्यू देने का साहस जुटाया.

केजरीवाल ने भी इंटरव्यू दिए लेकिन नरेंद्र मोदी की इस बात के लिए आलोचना हो रही है कि वो अब तक मीडिया में एक भी लम्बा इंटरव्यू देने का साहस नहीं कर पाए हैं. एक दो बार जब कोशिश भी की तो मीडिया के चुभते सवालों से रूठ कर वो मैदान छोड़ कर चले गए.

कम से कम मीडिया के सामने साहस जुटाने में राहुल मोदी से आगे हैं.

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