बड्डी गांवः सुरक्षित नहीं दलितों का मान-सम्मान

  • 10 अप्रैल 2014
सासाराम संत रविदास मंदिर

बिहार के शहर सासाराम से लगभग बीस किलोमीटर दूर बसा है बड्डी गांव.

रोहतास ज़िले के शिवसागर प्रखंड के कोनकी पंचायत का यह गांव 2013 में राष्ट्रीय स्तर पर तब चर्चा में आया था, जब यहां स्वतंत्रता दिवस के दिन झंडा फहराने के नाम पर हुए विवाद में एक दलित की मौत हो गई थी.

घटना में दर्जनों दलित घायल भी हुए थे. इसके एक महीने बाद एक और घायल व्यक्ति की मौत हो गई थी.

घटना के बाद गांव के रविदास टोले के दलित कई बदलावों से रूबरू हो रहे हैं. साथ ही उनमें यह भी एहसास घर कर गया है कि उनका मान-सम्मान अब सुरक्षित नहीं है.

काशीनाथ राम कहते हैं, "हमें अब गांव में उचित सम्मान नहीं मिलता. जमींदार हमें नीच दृष्टि से देखते हैं."

घटना के बाद आए दूसरे बदलावों के बारे में बताते हुए वह कहते हैं कि छठ पूजा में दलितों के लिए तालाब में अलग घाट बनाकर पानी का भी बंटवारा कर दिया गया है.

उनका कहना है कि अब प्रशासन भी उन्हें परेशान कर रहा है और उन्हें रोज़गार की तलाश में पलायन भी करना पड़ रहा है.

पक्षधरता

इस गांव के मतदाता लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण में गुरुवार को अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे हैं.

चुनावी चहल-पहल के आइने में पिछले साल की घटना के प्रभावों को देखने से यह बात सामने आती है कि यहां के प्रमुख उम्मीदवार भी वोटों के गणित को ध्यान में रखते हुए ही दलितों से मिलने आ रहे हैं.

क्योंकि यह संसदीय क्षेत्र अनुसूचति जाति के लिए आरक्षित है. इसलिए सभी उम्मीदवार इसी वर्ग से हैं.

सासाराम दलित

ग्रामीण छोटेलाल राम बताते हैं कि भाजपा के छेदी पासवान चुनाव प्रचार के दौरान गांव आने पर रविदास टोले में नहीं आए.

वह कहते हैं भाजपा उम्मीदवार को यह आशंका रही होगी कि ऐसा करने से राजपूत जाति का वोट उन्हें नहीं मिलेगा जो इस बार उनके प्रमुख प्रतिद्वंदी कांग्रेस की मीरा कुमार से नाराज़ बताए जाते हैं.

गौरतलब है कि बड्डी घटना के बाद मीरा कुमार ने 'दबंग वर्ग' के लोगों की आलोचना की थी. इसके बाद से ही उनके प्रति क्षेत्र में ऊंची जातियों के बीच नाराज़गी है.

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नोटिस

चुनाव के मौसम में रविदास टोले के कुछ ग्रामीण एक और परेशानी से जूझ रहे हैं.

पंद्रह ग्रामीणों को पुलिस प्रशासन ने नोटिस भेजकर दस हज़ार रुपये का बंध पत्र (बॉंड पेपर) जमा करने का आदेश दिया है. प्रशासन की नज़र में वे चुनाव-प्रक्रिया के दौरान या इसके बाद शांति भंग कर सकते हैं.

नोटिस के डर को बयां करते हुए केदार राम कहते हैं, "अब शायद ही कोई इस टोले से वोट डालने जाए."

साथ ही बॉंड भरने के लिए दस हज़ार रुपये की बड़ी राशि एकत्र करना भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती है.

घटना के बाद गांव का सामाजिक ताना-बाना और आर्थिक रिश्ते भी बिगड़े हैं. पहले शादी-ब्याह में सवर्ण जातियों के यहां रविददास टोले के लोगों को भी निमंत्रण मिलता था. अब ऐसा नहीं होता.

दूसरी ओर आमतौर पर खेतिहर मज़दूर के रूप में काम करने वाले दलितों को गांव के किसान अपने यहां मज़दूरी नहीं दे रहे हैं. इतना ही नहीं आस-पास के गांवों में काम की तलाश में जाने पर उन्हें आम तौर पर निराशा ही हाथ लगती है.

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भरोसा टूटा

सासाराम दलित महिला

इस संबंध में जितेंद्र राम कहते हैं, "हमने ही पिछले साल गांव के किसानों के खेतों में धान की रोपनी की थी लेकिन घटना के प्रभाव में कटनी के समय हमें काम नहीं मिला."

साथ ही रविदास टोले के दलित यह भी बताते हैं कि पड़ोस के गांव वाले भी अब अपने स्वजातीय किसानों की नाराज़गी का हवाला देते हुए काम देने से इनकार कर देते हैं.

इस सब का नतीजा यह है कि गांव में पलायन बढ़ा है. जितेंद्र जैसे कई युवा अब ज़्यादा संख्या में मुंबई, दिल्ली का रुख़ करने लगे हैं.

घटना के दौरान और इसके बाद पुलिस प्रशासन की भूमिका को देखते हुए गांव के दलित इस बात को लेकर अब आश्वस्त नहीं लगते कि सरकारी तंत्र के भरोसे वे सुरक्षित रह पाएंगे.

हालांकि घटना के तुरंत बाद रविदास मंदिर के पास ही एक पुलिस पोस्ट बना दी गई थी लेकिन रविदास टोले के सत्रह लोगों ने ज़िला प्रशासन से लाइसेंस के साथ बंदूक की मांग की है.

इस संबंध में विद्यार्थी राम बताते हैं कि अब तक ज़िला प्रशासन से न तो बंदूक मिली है और न ही लाइसेंस की अनुमति. उनके अनुसार अनुमति ही मिल जाए तो ग्रामीण अपने ख़र्च पर बंदूक ख़रीद लेंगे.

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आशंका

बड्डी में पिछले साल जो कुछ हुआ वह आज़ाद भारत में अपने आप में एक बड़ी घटना थी. चुनाव के समय यहां के दलित अपने को दूसरे दर्जे का नागरिक महसूस करते हुए घटना की चुनावी तपिश को महसूस कर रहे हैं.

चुनाव तो 10 अप्रैल को संपन्न हो जाएंगे, लेकिन घटना की आंच उन्हें आगे भी कई तरीक़े से परेशान करती रहेगी. गांव के दलित आगामी सात जून को होने वाले कार्यक्रम को लेकर आशंकित हैं.

सात जून को निशांत सिंह को अंग्रेजों ने तोप से उड़ाया था और उस दिन की आड़ में जातीय बैनरों तले निशांत सिंह का 'शहीदी दिवस' गांव में पहली बार बड़े पैमाने पर आयोजित करने की तैयारियां चल रही हैं.

सासाराम दलित विवाद, पुलिस

पिछले साल 13 अगस्त को विवाद की शुरुआत तभी हो गई थी जब स्वतंत्रता दिवस की तैयारी के सिलसिले में रविदास मंदिर के बाहर लगाई गई बांस-बल्लियों को राजपूत जाति के ग्रामीणों के नेतृत्व में लोगों को उखाड़ फेंका.

इस कार्रवाई को अंजाम देने वाले लोग अपने तरीक़े से उस ज़मीन पर निशांत सिंह को याद करते हुए झंडा फहराना चाहते थे.

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दलितों पर हमला

विवाद थाने तक पहुंचा तो दोनों पक्ष मौखिक रूप से इस बात पर सहमत हो गए कि वे 15 अगस्त को झंडा नहीं फहराएंगे.

रविदास मंदिर के महंत राजाराम कहते हैं कि रविदास टोले के लोगों के लिए यह फ़ैसला पीड़ादायक था कि उन्हें अपने तीन दशक पुराने कार्यक्रम को रोकना पड़ रहा था, लेकिन विवाद को देखते हुए उन्होंने पुलिस प्रशासन की बात मानना ही ज़्यादा उचित समझा.

लेकिन इसके बावजूद 15 अगस्त को राजपूत जाति के कई ग्रामीणों ने घटना स्थल पर निशांत सिंह की प्रतिमा के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराने की कोशिश की इसके बाद हुए संघर्ष में कई लोग घायल हो गए थे जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे.

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