सागरनामा-18: क्या बंगाल को ममता से मोह हो गया है?

  • 8 अप्रैल 2014
तृणमूल कांग्रेस

हुक़ूमत और चरित्र दो अलग चीज़ें हैं. ये क़तई ज़रूरी नहीं होता कि एक बदले तो दूसरी भी बदल जाए. इसका एक उदाहरण पश्चिम बंगाल और उसकी राजनीति है.

क़रीब तीन साल पहले राज्य में तीन दशक से ज़्यादा पुरानी हुक़ूमत बदल गई. ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने वाममोर्चे का अभेद्य दिखने वाला क़िला नेस्तनाबूद कर दिया.

(ओडिशा की राजनीति)

सरकार बदल गई लेकिन अपने नेतृत्व पर बिना सवाल किए लंबे समय तक भरोसा करने का आम जनता का चरित्र नहीं बदला. पश्चिम बंगाल ऊपरी तौर पर नयापन स्वीकार करने वाला, परिवर्तनकामी और आंदोलनकारी दिखता है लेकिन वह एक झटके में चीज़ें उलट-पुलट देने का तरफ़दार नहीं लगता.

यह एक तरह का यथास्थितिवाद है, जो अपने फ़ैसले पर भरोसा करने और उसे कामयाब या विफल होने का वक़्त देने में नज़र आता है. बंगाल हड़बड़ी में नहीं रहता, नहीं होता और यही उसका मूल चरित्र है.

राज्य की आम सोच का यही ढंग, उसका यही चरित्र, 2014 के आम चुनावों को भी प्रभावित कर सकता है. वाममोर्चे से उसका मोहभंग होने में तीन दशक लगे थे.

ममता सरकार

ममता बनर्जी को सत्ता में आए अभी पूरे तीन वर्ष भी नहीं हुए हैं तो फिर इतनी जल्दी मोहभंग कैसे हो सकता है.

(दक्षिण में बढ़िया सड़कें)

ये कहना ग़लत होगा कि तृणमूल कांग्रेस का सत्ता में आना और रहना केवल इसी वजह से है. ममता बनर्जी और उनकी सरकार ने काम किए हैं और लोग काम परखने के बाद उन्हें थोड़ा और वक़्त देने को ग़लत नहीं मानते.

संभवतः यही सोच है, जो तृणमूल सरकार की कमियों, ख़ामियों और ग़लतियों को देखकर अनदेखा करती है. ऐसी कई बड़ी घटनाएं ममता सरकार के कार्यकाल में हुई हैं, जिनसे उसकी छवि ख़राब हुई लेकिन लोग अब भी लोकसभा चुनाव में उनके पक्षधर दिखते हैं.

इतने आक्रामक ढंग से पक्षधर कि हो सकता है यह चुनाव तृणमूल के लिए सीटों की संख्या के हिसाब से ऐतिहासिक हो जाए. पिछले चुनाव, सन 2009 में, तृणमूल कांग्रेस को 19 सीटें मिली थीं.

राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि यह संख्या इस बार 30 तक पहुँच सकती है. वाममोर्चा, संभव है पाँच-सात सीट तक सिमट जाए और बाक़ी की सीटें कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में बँट जाएं.

सकारात्मक पक्ष

ममता सरकार के अच्छे काम में लोग जंगल क्षेत्र में सड़कों का जाल, पेयजल की योजनाएँ, बीस हज़ार आदिवासी युवकों को नौकरी, गोरखालैंड समस्या का समाधान और माओवादी हिंसा पर नियंत्रण को मानते हैं और यह ग़लत भी नहीं है.

(जगनमोहन को चुनौती?)

लेकिन इसी सरकार के कार्यकाल में ज़हरीली शराब काँड, शारदा चिटफ़ंड घोटाला, सरकारी अस्पतालों में बच्चों की मौत और पार्क स्ट्रीट, मध्यमग्राम और बीरभूम में बलात्कार के मामले भी हुए हैं. लोग इन मामलों को याद तो करते हैं लेकिन सरकार के सकारात्मक पक्ष पर उनका ज़ोर ज़्यादा होता है.

राजनीतिक दल इन आपराधिक मामलों में सरकार के ख़िलाफ़ प्रभावी ढंग से आवाज़ नहीं उठा सके जबकि ममता बनर्जी ने तापसी मलिक बलात्कार कांड का विरोध करते हुए ख़ुद को विपक्ष के प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित कर लिया था.

तृणमूल कांग्रेस

विश्लेषकों का मानना है कि तमाम विवादों के कारण सरकार की छवि पर असर पड़ा है लेकिन उसकी साख पर असर नहीं हुआ. छवि इतनी ख़राब नहीं हुई कि पार्टी के प्रदर्शन पर उसका प्रभाव पड़े.

संभावित कामयाबी

दरअसल लोकसभा चुनावों में ममता बनर्जी की संभावित कामयाबी अपनी सरकार की उपलब्धियों के साथ विपक्ष के बिखराव और विफलता की भी कहानी है. सरकार एक के बाद एक विवादों में उलझती रही पर विपक्ष उनमें से किसी को मुद्दा बनाकर उसे घेर नहीं पाया.

(क्या दे गया वास्को डी गामा?)

कांग्रेस पार्टी राज्य में लगभग पूरे सफ़ाये की ओर है, वाममोर्चा में अब पहले वाला दम-ख़म नहीं रहा और भारतीय जनता पार्टी अब तक राज्य में घुटनों के बल ही चल रही है. इसका फ़ायदा ममता बनर्जी को निश्चित तौर पर हुआ है.

पश्चिम बंगाल, सागरनामा

इसके अलावा राज्य में 27 प्रतिशत मत अल्पसंख्यकों के हैं और, सूबे के दूसरे लोगों की तरह उनका भी तृणमूल से मोहभंग नहीं हुआ है. ऐसा लगता है कि कांग्रेस पार्टी सार्वजनिक विमर्श से ग़ायब हो गई है और भाजपा उसी रास्ते अंदर आने की कोशिश कर रही है.

वाम मोर्चा अपनी कमज़ोर स्थिति के बावजूद विमर्श में बना हुआ है, जिसका एक नमूना पश्चिम मेदिनीपुर ज़िले के सोनाकनिया गाँव में देखने को मिला जहाँ घर में देवरानी और जेठानी में इस बात पर बहस हो गई कि तृणमूल और वाममोर्चे में कौन बेहतर है.

वोट प्रतिशत

भारतीय जनता पार्टी को 2009 में छह प्रतिशत वोट मिले थे लेकिन एक भी सीट नहीं मिली थी. इस बार, संभवतः नरेंद्र मोदी के कारण, उसका वोट प्रतिशत दोगुना हो जाए. भाजपा का उत्साह जंगीपुर लोकसभा उपचुनाव में मिले 11 फीसदी वोटों पर आधारित है लेकिन मोदी के नाम के अलावा ज़मीन पर भाजपा का कोई आधार नहीं है.

(मैं, हम और आप)

सागरनामा, पश्चिम बंगाल

तृणमूल को पिछली बार 32 प्रतिशत वोट के साथ 19 सीटें मिली थी जबकि इस बार वोट प्रतिशत 35 से 37 प्रतिशत तक जा सकता है. इसका एक कारण उत्तर बंगाल में बढ़ा उसका प्रभाव है, जो पारंपरिक ढंग से कांग्रेस को वोट देता रहा है. दक्षिण बंगाल पहले से तृणमूल का समर्थक है.

वाम मोर्चे को पिछले आम चुनावों में 15 सीटें मिली थीं जो इस बार घटकर इकाई के आँकड़े में भी आ सकती हैं. उसका वोट प्रतिशत भी घट सकता है.

पश्चिम बंगाल की 42 सीटों के लिए 17 अप्रैल से 12 मई तक पाँच चरणों में मतदान होना है. प्रेक्षक मानते हैं कि इन चुनावों में तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व क़ायम रह सकता है और ममता बनर्जी को उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी बढ़त मिल सकती है.

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