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ये है इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का पोस्टमार्टम

 रविवार, 6 अप्रैल, 2014 को 19:33 IST तक के समाचार

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यूं तो कभी विवादों से मुक्त नहीं रही लेकिन भारत के चुनाव आयोग ने हमेशा इसे सुरक्षित और सही माना.

भारत की जनता भी चुनाव आयोग से सहमत है. यदा-कदा राजनेता चुनावों में ईवीएम के ख़िलाफ़ बोलते रहे हैं लेकिन किसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी ने इसके ख़िलाफ़ कोई बड़ा कदम नहीं उठाया है.

हर ईवीएम के दो हिस्से होते हैं. एक हिस्सा होता है बैलेटिंग यूनिट जो कि जो मतदाताओं के लिए होता है. दूसरा होता है कंट्रोल यूनिट जो कि पोलिंग अफ़सरों के लिए होता है.

ईवीएम के दोंनो हिस्से एक पांच मीटर लंबे तार से जुड़े रहते हैं. बैलेट यूनिट ऐसी जगह रखी होती जहाँ कोई वोटर को वोट डालते समय देख ना सके.

इसके अलावा संवेदनशील पोलिंग बूथ पर वोटिंग का सीधा प्रसारण होता है जो कि कहीं से भी देखा जा सकता है. ईवीएम पर अधिकतम 64 प्रत्याशी तक दर्शाए जा सकते हैं. किसी लोकसभा क्षेत्र में 64 से ज़्यादा प्रत्याशी होने पर चुनाव आयोग कागज़ के बैलट का इस्तेमाल करने के लिए बाध्य है.

ईवीएम अंदर से

ईवीएम : कुछ रोचक तथ्य

  • 2004 के आम चुनावों में पहली बार पूरे भारत के वोटरों ने ईवीएम के ज़रिये वोट डाले थे.
  • ईवीएम इस तरह से बनाई गई है कि बिना पढ़े-लिखे वोटर भी चुनाव चिन्ह के आगे लगे बटन को दबा कर वोट डाल सकें.
  • हर ईवीएम के अंदर एक छह वोल्ट की अल्कलाइन बैटरी होती है जो बिजली ना होने पर भी मशीन को चालू रखती है.
  • एक ईवीएम अधिकतम 3840 वोट दर्ज़ कर सकती है. सामान्यतः किसी भी पोलिंग बूथ पर 1500 से अधिक वोटर नहीं होते.
  • ईवीएम पर अधिकतम 64 प्रत्याशी तक दर्शाए जा सकते हैं.
  • किसी लोकसभा क्षेत्र में 64 से ज़्यादा प्रत्याशी होने पर चुनाव आयोग कागज़ के बैलट का इस्तेमाल करने के लिए बाध्य है.
  • पहली बार हर ईवीएम में अंतिम बटन 'नोटा' या 'ऊपर दिए नामों में से को कोई नहीं' ही होगा.
  • ईवीएम के अंदर 10 सालों तक परिणामों को सुरक्षित रखा जा सकता है.

1) मतदाता वाले हिस्से पर प्रत्याशियों के नाम और उनका क्रमांक या सीरियल नंबर लिखा होता है. नाम एक दो या तीन भाषाओँ में लिखे जाते हैं. जिस इलाके में जो भाषा प्रचलित है उस भाषा का इस्तेमाल होता है. नाम के साथ ही प्रत्याशी का चुनाव चिन्ह भी होता है. चुनाव चिन्ह उन वोटरों को ध्यान में रख कर बनाए गए हैं जो पढ़ लिख नहीं सकते . चुनाव चिन्हों को लेकर चुनाव आयोग के नियम बेहद सख़्त है. मसलन कोई भी प्रत्याशी या पार्टी 'सूअर' या 'नोट की गड्डी' के चिन्ह पर चुनाव नहीं लड़ सकता.

क्लिक करें एक ही नाम के एक से ज़्यादा उमीदवार होने पर नाम के आगे ब्रैकेट में उम्मीदवार के घर या पेशे के बारे में लिखा जाता है ताकी मतदाता चकराये ना. पहली बार हर ईवीएम में अंतिम बटन नोटा या ऊपर दिए नामों में से कोई नहीं ही होगा

2 ) नाम के आगे एक नीला बटन होता है जो वोट देने के लिए दबाया जाता है. जिस खाते में वोट दर्ज हुआ है उस नाम के सामने लगी एक छोटी सी बत्ती भी चमक उठती है. नंबर पहली बार हर ईवीएम पर ब्रेल में नीले बटन के ही बगल में ब्रेल लिपि में उम्मीदवार का सीरियल नंबर लिखा गया है. जो नेत्रहीन उमीदवार ब्रेल नहीं जानते वो अपने साथ किसी सहायक को ले जा सकते हैं.

3 ) कंट्रोल यूनिट जहाँ वोट दरअसल दर्ज होते हैं. ईवीएम का यह हिस्सा पोलिंग ऑफ़िसर के पास होता है. किसी भी वोटर के वोट देने के पहले पोलिंग अफ़सर बैलट बटन दबा कर मशीन को वोट दर्ज़ करने के लिए तैयार करता है. बैलट बटन के ऊपर एक ढक्कन के अंदर तीन बटन बंद होते हैं. पहला होता है 'क्लोज़' का. इस बटन को दबाने के बाद मशीन नए वोट दर्ज़ करना पूरी तरह से बंद कर देती है.

ये बटन केवल एक ही बार दबाया जा सकता है. इस बटन को या तो वोटिंग ख़त्म होने के बाद शाम को या फिर बूथ कैप्चरिंग की हालत में दबाया जा सकता है.

क्लोज़ के बटन के बगल में एक अलग खाने में दो बटन होते हैं जो वोटों की गिनती के वक़्त हर प्रत्याशी को मिले मिले वोटों की संख्या बताते है. इन परिणामों का प्रिंट आउट भी लिया जाता है और ये परिणाम बैलट यूनिट के ऊपर लगी एक स्क्रीन पर भी देखे जा सकते हैं.

बैलट यूनिट में बटन वाले हिस्से के ऊपर ढक्कन के अंदर छह वोल्ट की अल्कलाइन बैटरी बंद होती है जिसकी मदद से ईवीएम उन इलाकों में भी काम करती हैं जहाँ बिजली नहीं होती.

हर बैलट बटन के पास एक स्पीकर भी होता है जो की हर वोट के सही ढ़ंग से दर्ज होने के बाद तेज़ आवाज़ करता है.

4 ) चुनाव आयोग ये दावा कभी नहीं करता की इस मशीन के अंदर मौजूद सॉफ़्टवेयर के साथ छेड़ छाड़ नहीं की जा सकती. लेकिन चुनाव आयोग ये दावा ज़रूर करता है कि छेड़-छाड़ करने के लिए ईवीएम किसी के हाथ में नहीं लग सकतीं. चुनाव आयोग का कहना है कि इस मशीन को पूरी प्रक्रिया सुरक्षित बनाती है ना की केवल कोई एक पुर्जा.

सुरक्षा के इंतज़ाम

वोटिंग के पहले और बाद में हर मशीन को कड़ी निगरानी में कैद रखा जाता है. वोट डलने के बाद शाम को कई लोगों की मौजूदगी में पोलिंग अफ़सर इस मशीन को सील बंद करता है. हर वोटिंग मशीन को एक खास कागज़ से सील जाता है. ये कागज़ करंसी नोट की तरह ही खास तौर पर बने होते हैं. करंसी नोट की ही तरह हर कागज़ के ऊपर एक ख़ास नंबर होता है.

कई लोग सवाल करते हैं कि जब करंसी नोट नकली बन सकते हैं तो ये कागज़ क्यों नहीं. ये विशेष कागज़ सुरक्षा की अंतिम कड़ी नहीं होते. इन कागज़ों से सील करने के बाद भी इस मशीन को एक सैकड़ों साल पुराने तरीके से सील किया जाता है. हर मशीन के परिणाम वाले हिस्से में एक छेद होता है जिसे धागे के मदद से बंद किया जाता है और उसके बाद उसे कागज़ और गर्म लाख से एक ख़ास पीतल की सील लगा कर बंद किया जाता है.

सील करने के बाद हर पोलिंग मशीन को किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की तरह की सुरक्षा के घेरे में मतगणना केंद्र तक लाया जाता है.

मतगणना केन्द्रों पर हर मशीन मई 16 तक कड़े पहरे में रहेगी. मई 16 को एक साथ सुबह 6 बजे पूरे देश में वोटों की गिनती होगी.

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