सागरनामा-16: दक्षिण में बढ़िया सड़कें, ढिंढोरा नहीं

  • 6 अप्रैल 2014
गुजरात सड़कें

इस बात पर बहस हो सकती है कि रफ़्तार को विकास का समानार्थी माना जाए या नहीं पर इतना तय है कि वह एकमात्र समानार्थी शब्द नहीं है.

ज्ञात इतिहास के लिए ये कोई मुद्दा नहीं है. पहिए के अविष्कार से लेकर विमानों और रॉकेटों तक, वह हमेशा रफ़्तार के पक्ष में खड़ा रहा है और आगे भी रहेगा.

पठनीय लिखित इतिहास से ठीक पहले, सिंधुघाटी सभ्यता काल निर्धारण की बहस भी अंततः रफ़्तार और घोड़ों पर जाकर टिक जाती है. इस तर्क के साथ की वहां घोड़े पालतू जानवर की तरह मौजूद नहीं थे. होते तो उस सभ्यता की मुहर पर बैल नहीं, घोड़ों का चित्र होता. इसका संतोषजनक जवाब किसी के पास नहीं है कि सिंधुघाटी के लोग सभ्य थे तो रफ़्तार के हामी क्यों नहीं थे. घोड़े थे तो बैल प्रतीकचिह्न क्यों था?

घोड़ों के पास गठा हुआ बदन था, सुंदरता थी, रंग और आकर्षण था. इन सबसे बड़ी बात उनकी रफ़्तार थी. अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त के घोड़ों की तरह, जो धूल उड़ाते सरपट दौड़ते थे. या, बहुत बाद में, राजस्थान के महाराणा प्रताप के चेतक की मानिंद, पलभर में यहां से वहां.

सोच का फ़र्क

गुजरात सड़कें

आधुनिक सभ्यताओं में विकास को परिभाषित करने के मानक मोटे तौर पर उसे रफ़्तार के समानांतर रखते हैं. दीगर मापदंड भी हैं पर रफ़्तार सतह पर दिखती है इसलिए नज़र सबसे पहले उसी पर टिकती है.

गुजरात की सड़कों के क़सीदे पढ़ने वाले कहते हैं कि किसी को ज़रूरी काम से वडोदरा से वलसाड जाना हो तो वह अपने वाहन से तीन-साढ़े तीन घंटे में पहुंच जाता है. लगभग ढाई सौ किलोमीटर जाने के लिए अब एक दिन पहले नहीं चलना पड़ता.

पश्चिमी समुद्र तट पर दक्षिण भारत के पहले राज्य कर्नाटक में बसें इस रफ़्तार से चलती हैं कि उडुपी से 65 किलोमीटर दूर मंगलोर एक घंटे में पहुंच जाती हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि यही दूरी कार से तय करनी हो तो सवा घंटा लग सकता है.

यह गुजरात और कर्नाटक की सड़कों और सोच का फ़र्क है. एक जगह बड़े शहरों के बीच की सड़कें अच्छी हैं तो दूसरी जगह सड़क के साथ सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था भी, जिसका गुजरात में अभाव दिखता है.

कच्छ से लेकर सौराष्ट्र के बड़े क्षेत्र में स्थानीय परिवहन ज़्यादातर पुरानी मोटरसाइकिलों से बनीं फटफटिया पर निर्भर है. बसें कम हैं. इस मोटरसाइकिल फटफटिया पर पच्चीस से तीस लोग तक, कुछ खड़े-कुछ लटके, यात्रा करते हैं. महिलाओं और बच्चों को भी इसी तरह यात्रा करनी पड़ती है.

दक्षिण भारत के चारों राज्यों- कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और नवगठित सीमांध्र में बड़ी सड़कें वाक़ई अच्छी हैं. कहीं गुजरात के बराबर, कहीं बेहतर. पर प्रचार की रफ़्तार में उनका ज़िक्र दब जाता है और वे अचर्चित रह जाती हैं क्योंकि कोई उनका ढिंढोरा नहीं पीटता.

घर में बोइंग

केरल सड़कें

केरल को इसका अपवाद माना जा सकता है लेकिन इसके कारण भिन्न हैं. देश में सर्वाधिक आबादी घनत्व वाले इस राज्य में चौड़ी सड़कें बन नहीं सकती थीं. उनके दोनों तरफ़ घनी बस्तियाँ पूरे राज्य में कहीं भी साथ नहीं छोड़तीं. इसलिए रफ़्तार घट जाती है.

इन्हीं बस्तियों के कारण केरल की सड़कें संकरी हैं, और दिखती हैं लेकिन नियमों का पाबंदी से पालन करने वाले इस राज्य में ट्रैफ़िक कभी नहीं रुकता, बाधित नहीं होता. अन्य राजमार्गों की तरह वह कम गति से ही सही, चलता रहता है.

अंदरूनी सड़कों का हाल सागरनामा के रास्ते में आने वाले राज्यों में कहीं भी बहुत अच्छा नहीं है. लेकिन दक्षिण भारत, ऐसा लगता है, उस तरफ़ भी ध्यान दे रहा है. उसके लिए रफ़्तार के मानी बड़ी सड़कों के साथ ख़त्म नहीं हो जाते. मसलन, सीमांध्र में नेल्लोर से ओंगोल के बीच एक पतली सड़क साढ़े पांच किलोमीटर दूर आठ सौ की आबादी वाले गांव रामायापटनम को जोड़ती है.

सड़क पक्की है और उस पर गड्ढे नहीं हैं, बावजूद इसके कि ये इलाक़ा सुनामी से हुई तबाही का शिकार था. तब सब कुछ नष्ट हो गया था. जनजीवन, घर, सड़क से लेकर वनस्पतियों तक. उस पतली सड़क ने उन्हें रफ़्तार देकर फिर देश से जोड़ दिया है.

तमिलनाडु में मामल्लापुरम की सड़क ठीक है. हालांकि उसके ठीक होने की वजह महाबलिपुरम के संरक्षित स्मारक हो सकते हैं, जिन्हें देखने दूर-दूर से लोग आते हैं. सातवीं-आठवीं शताब्दी के बीच पल्लव शासकों के काल में बने ये स्मारक भी एक तरह से रफ़्तार के ही स्मारक हैं-अपने पांच विश्व प्रसिद्ध रथों के साथ.

मामल्लापुरम में रफ़्तार क़स्बे में इस तरह घुस आई है कि एक व्यक्ति ने बोइंग विमान लाकर अपने घर के बगल में खड़ा कर लिया है. यह हवाई जहाज उड़ता नहीं लेकिन पांडवों का रथ देखने आने वाले उसमें बैठकर आराम कर सकते हैं. यह एक रेस्त्रां है.

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