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'कश्मीर विवाद का फ़िलहाल कोई हल नहीं दिखता'

 शुक्रवार, 4 अप्रैल, 2014 को 08:39 IST तक के समाचार
कश्मीर

कोई भी व्यक्ति, जो पाकिस्तान जा चुका हो, उसने भारत-प्रशासित कश्मीर के बारे में बहुत सारी ख़बरें सुन रखी होंगी. 15 साल तक पाकिस्तान में घूमने के बाद मैं अच्छी तरह जानता हूं कि कश्मीर को लेकर पाकिस्तान का पक्ष क्या है.

लेकिन नियंत्रण रेखा के पार भारत प्रशासित कश्मीर की अपनी पहली यात्रा के बाद मुझे अपना निष्कर्ष निकालने का मौक़ा मिला कि आख़िर भारत प्रशासित कश्मीर में क्या चल रहा है.

आगे बढ़ने से पहले इसका थोड़ा इतिहास जान लेते हैं. साल 1947 में जब ब्रितानी शासकों ने इस उपमहाद्वीप को छोड़ा था तब कश्मीर का मामला हल नहीं हुआ था.

मुस्लिम बहुल आबादी वाले कश्मीर के हिंदू राजा ने पाकिस्तान और भारत में से किसी में भी शामिल नहीं होने का निर्णय लिया.

इस विवाद ने युद्धों को जन्म दिया और आज पाकिस्तान के पास कश्मीर का एक-तिहाई जबकि भारत के पास मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी समेत दो तिहाई हिस्सा है.

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समय घावों को नहीं भर पाया है. अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए भारत ने 4,00,000 सुरक्षाकर्मियों को भारत प्रशासित कश्मीर में तैनात कर रखा है.

हालांकि कश्मीर से संबंधित सभी आंकड़े विवादों में हैं, लेकिन यह कहना संभवतः सही होगा कि कश्मीरियों और भारत के बीच संघर्ष में अब तक 1,00,000 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं.

लेकिन यह इतिहास है - आज वहां क्या हो रहा है? यदि आप पाकिस्तानी पक्ष को सुनेंगे तो लगेगा कि भारत पाकिस्तान में मिलने या शायद आज़ाद होने की कश्मीरी लोगों की इच्छाओं का दमन कर रहा है.

भारतीय नज़रिया

कश्मीर

अगर भारतीय पक्ष को सुनेंगे तो लगेगा कि वो अपने इलाक़े को जिहादी चरमपंथियों से बचा रहा है, जो पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र की तरफ़ से भेजे जाते हैं.

मैं भारतीय पर्यटकों से भरे एक विमान से कश्मीर पहुंचा. कश्मीरी व्यवसायी उनका गर्मजोशी से स्वागत करते हैं.

अगर वे प्रमुख पर्यटन स्थलों से दूर जाते हैं तो गश्त लगा रहे भारतीय सेना के जवान उन्हें सुरक्षा का एहसास दिलाते हैं. लेकिन उनकी यात्रा का अधिकांश हिस्सा यहां के राजनीतिक उथल-पुथल से अछूता ही रहता है.

जो थोड़ी बहुत असुविधा उन्हें होती है, वो यह कि कश्मीर में उनमें से बहुतों के मोबाइल फ़ोन काम नहीं करते.

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भारत सरकार जानना चाहती है कि आख़िर कश्मीर के लोग क्या बातें कर रहे हैं.

यही कारण है कि कश्मीर के हालात के बारे में पर्यटकों और कश्मीरियों के नज़रिए में काफ़ी फ़र्क़ होता है.

तीन अचम्भे

भारतीय सेना

राजनीतिक हिंसा और भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों के साथ कश्मीरियों ने जीना सीख लिया है. अगर श्रीनगर के किसी कैफ़े में राजनीति पर चर्चा कर रहे हैं और बग़ल वाली टेबल पर कोई अजनबी बैठा है तो आप चुप हो जाएंगे.

अगर आप से कोई विदेशी पत्रकार पूछता है कि घाटी में कितने लोग पाकिस्तान के साथ विलय का समर्थन करते हैं तो अनौपचारिक रूप से आपका जवाब होता है 25 प्रतिशत, लेकिन औपचारिक रूप से आप इस आंकड़े को दुरुस्त कर के 10 प्रतिशत कर देंगे.

भारतीय सेना की कश्मीर में उपस्थिति एक लंबे अरसे से बनी रही है और उसे इतने बड़े पैमाने पर संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं कि इसने कश्मीरी समाज पर अपनी पकड़ बहुत मज़बूत बना ली है.

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ऐसी अटकलें हैं कि कश्मीर घाटी में अब चरमपंथियों की संख्या सिर्फ़ 100 रह गई है और वे एक ऐसी सेना के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं जो ना केवल सारी बातचीत की निगरानी करती है, बल्कि उनके पास वेतनभोगी मुख़बिरों का ऐसा व्यापक नेटवर्क है जिससे कश्मीर के कोने-कोने की ख़बर मिल जाती है.

तो भारत प्रशासित कश्मीर में किन चीज़ों ने मुझे हैरत में डाला? यहाँ मैं उन तीन चीज़ों का ज़िक्र करना चाहूँगा जिन्होंने मुझे हैरान किया.

पहली बात, मुझे इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि यहां उग्रवाद कितनी तेज़ी से कम हुआ है. 20 वर्षों से पाकिस्तानी टेलीविज़न शायद इस बात को बढ़ा कर दिखाता रहा है कि यहां भारतीय सेना और अलगाववादियों के बीच भारी संघर्ष जारी है.

आज़ादी और सहिष्णुता

कश्मीरी बच्चे

यहां आज भी छिटपुट संघर्ष जारी है, लेकिन इसकी भयावहता इतनी कम है कि सूरज ढलने के बाद भी श्रीनगर में चहलक़दमी करना संभव है.

अब श्रीनगर की अपेक्षा पेशावर या इस्लामाबाद में ज़्यादा चेकप्वाइंट हैं.

दूसरी बात यह कि भारत सरकार घाटी के लोगों का विश्वास जीतने में ख़ास तौर से नाकाम रही है. यहां तक कि भारत समर्थक नेशनल कांफ्रेंस को भी भारतीय शासन स्वैच्छिक की बजाए एक अनिवार्य सच्चाई लगती है.

दिल्ली या इस्लामाबाद का समर्थन करने वाली राजनीतिक विचारधारा से आने वालों को छोड़ घाटी के कुछ लोग ही हैं जो उत्साह के साथ आज़ादी की बात न करते हों.

श्रीनगर में ज़्यादातर छात्र इस बात पर दृढ़ हैं कि भारतीय शासन दमनकारी है और ज़रूरी हुआ तो वे पूरी ज़िंदगी प्रतिरोध करते रहना चाहते हैं.

और तीसरा अचम्भा? मैंने अक्सर पढ़ा है कि कश्मीर में असाधारण रूप से सहिष्णु राजनीतिक संस्कृति है. लेकिन यहां हिंसा के स्तर और विभाजन को देखते हुए यह दावा अकल्पनीय लगता है.

मुझे कोई ऐसी जगह नहीं दिखी जहां भिन्न राजनीतिक विचारधारा और धार्मिक विश्वास वाले लोगों में इतनी सहिष्णुता हो.

आप कश्मीर में कट्टर अलगाववादी के मुंह से कश्मीर के भारतीय सेना प्रमुख के बारे में अच्छे व्यक्ति होने की बात सुन सकते हैं.

जीने की कला

भारत प्रशासित कश्मीर में भारतीय सैनिक

ज़्यादातर कश्मीरी एक दूसरे से असहमत नज़र आते हैं. लेकिन वे ज़्यादातर समय बहुत सौम्य और सहिष्णु तरीक़े से अपनी बात रखते हैं.

यह एक ऐसा नज़रिया है जो कुछ हद तक अस्तित्व बनाए रखने की कला है. हर कोई जानता है कि निकट भविष्य में भारत कश्मीर मुद्दे पर कोई समझौता नहीं करने जा रहा है.

ब्रिटेन जैसी उत्तर साम्राज्यवादी ताक़तें जहां स्कॉटिश लोगों को आज़ादी देने की इच्छुक नज़र आती हैं, वहीं उभरती हुई ताक़तें अपने इलाक़े को गंवाना नहीं चाहतीं.

यदि इस बात की ज़रा सी भी गुंजाइश हो कि कश्मीरी आज़ादी को चुनना पसंद करेंगे तो उन्हें इस मुद्दे पर कभी भी अपना मत नहीं देने दिया जाएगा.

जब भी कश्मीर मुद्दे पर पश्चिमी राजनयिकों से बात होती है तो वे अपनी भौंहें चढ़ा लेते हैं और इसकी जटिलता को लेकर मज़ाक़ करने लगते हैं. मुझे हमेशा ही यह चिढ़ाने वाला व्यवहार लगता रहा है.

कश्मीर अभी भी दुनिया के महत्वपूर्ण विवादों में से एक है, जिसने लाखों ज़िंदगियों को प्रभावित किया है. लेकिन इस विवाद के बारे में एक ऐसी चीज़ है जिसपर कोई मतभेद नहीं है और वो ये कि फ़िलहाल इस समस्या का कोई अंत नहीं दिखता.

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