बिहार: चलेगी नीतीश की सोशल इंजीनियरिंग?

  • 31 मार्च 2014
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

बिहार में रामविलास पासवान दलित राजनीति का एक बड़ा चेहरा है लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दलितों को लेकर वो प्रयोग किया है जो पूरे देश में देखने को नहीं मिलता है.

उन्होंने दलितों में अति पिछड़ी जातियों को महादलित का नाम और पहचान दी है और उनके लिए अलग से नीतियां और योजनाएं तैयार की हैं.

बिहार सरकार अपने इस क़दम को सबसे वंचित तबक़ों तक विकास पहुंचाने की दिशा में अहम क़दम बताती है तो उसके आलोचक इसे 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तौर पर देखते हैं.

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नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू भाजपा से 17 साल पुराना रिश्ता तोड़ने के बाद आम चुनाव में पहली अपने दम पर उतरी है. तो क्या उसे महादलित सोशल इंजीनियरिंग का फ़ायदा मिलेगा?

बिहार में दस करोड़ से ज़्यादा की आबादी है जिसमें दलितों की हिस्सेदारी 15 फ़ीसदी है. राज्य में मोटे तौर पर दलित 22 जातियों में बंटे हैं जिनमें से प्रारंभिक तौर पर सबसे कम विकसित 18 जातियों को महादलित वर्ग में शामिल किया गया.

लेकिन बाद में तीन और जातियों को इसमें शामिल कर दिया. अब सिर्फ़ पासवान जाति दलित है जबकि बाक़ी 21 जातियां महादलित हैं.

बांटों और राज करो

बिहार अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष विद्यानंद विकल कहते हैं कि महादलित जातियों में काफ़ी समय से मांग थी कि उनके सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के लिए अलग से क़दम उठाए जाएं.

वो कहते हैं, “महादलित बनाने के बाद सबसे कम विकसित जातियों को विशेष पैकेज़ दिया गया जिससे उनके बीच जागृति आई है. उनकी शिक्षा से लेकर रोज़गार तक की समस्याओं पर ध्यान दिया गया है.”

लेकिन रामविलास पासवान की लोकजन शक्ति पार्टी (एलजेपी) का कहना है कि महादलित बनाने से कम विकसित जातियों का कोई भला नहीं हुआ है बल्कि यह विशुद्ध रूप से वोटों की राजनीति है.

एलजेपी के उपाध्यक्ष रामचंद्र पासवान कहते हैं, “महादलित बनाने के पीछे नीतीश का यही इरादा है कि वोट बांटो और राज करो. बिहार में जो दलित वर्ग की ताक़त थी, उसे नीतीश कुमार ने कमज़ोर करने की कोशिश की. लेकिन अब दलित और महादलित इस बात को समझ रहे हैं. केंद्र से उनके नाम पर मिलने वाला पैसा न दलित को मिल रहा है और न ही महादलित को.”

लोक जनशक्ति पार्टी अब भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन का हिस्सा है. नीतीश कुमार की जेडीयू 17 साल तक इस गठबंधन में रही, लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने के मुद्दे पर उन्होंने भाजपा से दूरी बना ली और अकेले चुनाव में उतरे हैं और उन्हें अपने विकास के एजेंडे पर भरोसा है.

महादलित का विस्तार

विद्यानंद विकल का कहना है कि नीतीश कुमार हमेशा सामाजिक समरसता और वंचितों को आगे बढ़ाने के लिए क़दम उठाते हैं. वो दलितों में महादलित बनाने को चुनावी राजनीति से जोड़ कर नहीं देखते हैं.

वो कहते हैं, “प्रोन्नति में आरक्षण केंद्रीय स्तर पर बंद है. बिहार सरकार देश की पहली सरकार है जिसने प्रोन्नति में आरक्षण को लागू किया है. इसका फ़ायदा दलित और महादलित दोनों वर्गों को मिल रहा है जबकि पूरे देश में ऐसा कहीं नहीं हो रहा है.”

इसके अलावा वो कहते हैं कि नीतीश सरकार ने दलितों के लिए और भी कई काम किए हैं जिनमें दलितों के उत्पीड़न को रोकने के लिए अनुसूचित जाति पुलिस थानों का निर्माण और पांच स्पेशल कोर्ट बनाना शामिल है.

दूसरी तरफ राजनीतिक कार्यकर्ता महेंद्र सुमन सवाल उठाते हैं कि अगर नीतीश कुमार महादलित को लेकर राजनीति नहीं करना चाहते हैं तो फिर उन्हें इसके विस्तार की ज़रूरत क्यों महसूस हुई.

वो कहते हैं, “पहले महादलित में सबसे कम विकसित 18 जातियां थी लेकिन अब पासवान जाति को छोड़ कर सभी 21 जातियां महादलित हैं. नीतीश ने सिर्फ़ राजनीतिक फ़ायदे के लिए इसे गड्डमड्ड किया है. उन्होंने सोचा जब चुनावी रूप से अहम जाति इसमें शामिल ही नहीं हैं तो फिर इसे बनाने का क्या फ़ायदा. इसलिए उन्होंने महादलित की अवधारणा को हल्का कर दिया.”

कितने अहम महादलित वोट

पटना में वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर मानते हैं कि नीतीश कुमार को महादलित बनाने का चुनावी फ़ायदा हुआ है, लेकिन उन्होंने इन जातियों के लिए काम भी किया है.

बिहार में दलित
बिहार में दलितों की आबादी एक करोड़ से ज़्यादा है

वो कहते हैं, “पासवान जाति के वोट ठोस रूप से रामविलास पासवान के साथ जुड़े हैं. लेकिन इस बात में संदेह नहीं है कि महादलितों को जो भी मिला वो नीतीश के रहते ही मिला है. इसलिए उनका आकर्षण स्वाभाविक रूप से जेडीयू की तरफ़ है.”

सुरेंद्र किशोर कहते हैं कि महादलित इस स्थिति में तो नहीं है कि वो चुनावों में हार जीत में निर्णायक भूमिका अदा कर सकें, लेकिन कहीं वो अहम हो सकते हैं. वो कहते हैं, “जिस तरह दूध को जमाने में दही की भूमिका होती है, उसी तरह महादलित कहीं-कहीं सहयोगी वोट बैंक की भूमिका निभाते हैं.”

(अंग्रेज़ी बोलने वाले मुसहर बच्चे)

बिहार में इन आम चुनावों में जिस तरह त्रिकोणीय मुक़ाबला है, उसे देखते हुए एक-एक वोट की अहमियत होगी. दिलचस्प बात ये है कि दलितों के वोटों पर सब दावेदारी जता रहे हैं.

रामविलास पासवान को साथ लेने के बाद एनडीए जहां अपने खाते में दलित वोट आने की उम्मीद कर रहा है तो ख़ुद को सामाजिक न्याय का प्रतीक कहने वाले लालू प्रसाद यादव उन्हें लुभाने का पूरा प्रयास कर रहे हैं.

ऐसे में ये चुनाव नीतीश की दलित और महादलित सोशल इंजीनीयरिंग के लिए एक परीक्षा हैं.

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