संघ को आँख दिखाकर बच पाते जसवंत सिंह?

  • 25 मार्च 2014
जसवंत सिंह

भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज जसवंत सिंह को अगर यह ग़लतफ़हमी थी कि वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आँखें दिखाकर पार्टी में बने रह सकते हैं और मनचाही जगह से टिकट पा सकते हैं, तो वह अब दूर हो गई है.

आख़िर कौन बीजेपी नेता है, जो यह कहने की हिम्मत कर सके कि सरसंघचालक की बात कोई ईश्वर की वाणी नहीं है कि उसे मान लिया जाए?

जसवंत सिंह ने नवंबर 2013 में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि पूर्व सरसंघचालक प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह उर्फ़ रज्जू भैया की बात “कोई श्रीकृष्ण उवाच, ईश्वर की वाणी नहीं है...मैं (उनकी बात से) सहमत नहीं हूँ”?

संदर्भ था साल 1999 में एअर इंडिया के विमान का अपहरण जिसे चरमपंथी कंधार ले गए थे. तब रज्जू भैया ने कहा था कि हिंदू डरपोक होता है और विमान में सवार हिंदू युवकों को इकट्ठा होकर अपहरणकर्ताओं को क़ाबू कर लेना चाहिए था.

इस पर जसवंत सिंह ने कहा था कि वो दिवंगत आरएसएस प्रमुख की बात से सहमत नहीं है क्योंकि वो ईश्वर की वाणी नहीं है. संघ के वरिष्ठ नेता भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं पर कड़ी से कड़ी टिप्पणी करने से नहीं चूके हैं पर आम तौर पर भारतीय जनता पार्टी के नेता संघ के अधिकारियों पर कड़वी टिप्पणी करने से बचते हैं.

ख़ामियाज़ा?

पर जसवंत सिंह ने यह हिम्मत की और अब भारतीय जनता पार्टी ने बाड़मेर से लोकसभा चुनाव लड़ने की उनकी ख़्वाहिश को पूरा नहीं होने दिया. उनकी जगह काँग्रेस छोड़कर हिंदुत्ववादी पार्टी में आ पहुँचे कर्नल सोनाराम को टिकट दे दिया गया.

जसवंत सिंह

पार्टी महासचिव अरुण जेटली ने जसवंत सिंह को ‘एडजस्ट’ करने की बात कहकर जैसे उनके ज़ख़्मों पर नमक छिड़क दिया और सिंह ने कहा कि “मैं कोई मेज़ कुर्सी नहीं हूँ कि मुझे कहीं ‘एडजस्ट’ कर दिया जाए”.

जिस लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी, और दरअसल आरएसएस का सर्वस्व दाँव पर लगा हो, उससे ऐन पहले जसवंत सिंह ने आज़ाद उम्मीदवार के तौर पर बाड़मेर से पर्चा दाख़िल करके बग़ावत का बिगुल बजा ही दिया है.

यह पहले भी कई बार कहा जा चुका है कि 2014 का चुनाव भारतीय जनता पार्टी नहीं बल्कि आरएसएस लड़ रहा है. पिछले दस साल से संघ सत्ता की परिधि से बाहर रहा है और उसे इसका नुक़सान भी हुआ है. इसलिए इस बार वह चाहता है कि किसी भी क़ीमत पर केंद्र में स्वयंसेवकों की सरकार बने.

हालाँकि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के दौरान जब संघ और विश्व हिंदू परिषद जैसे आनुषांगिक संगठनों ने पर्दे के पीछे से सरकार पर नियंत्रण करने की कोशिश की थी तो वाजपेयी ने एक बार इस्तीफ़ा देने की धमकी तक दे डाली थी.

वाजपेयी जैसा बूता

उस दौर में बीजेपी और संघ के रिश्तों में इतनी खटास आ गई थी कि संघ के बुज़ुर्ग नेता दत्तोपंत ठेंगड़ी ने अटल बिहारी वाजपेयी की तुलना "घटिया राजनीतिज्ञ" से कर दी. तभी रामलीला मैदान में भारतीय मज़दूर संघ की एक रैली में ठेंगड़ी ने तत्कालीन वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा को खुलेआम अपराधी कहा था.

अटल बिहारी वाजपेयी संघ के कटाक्षों और हमलों के सामने खड़े रहे चूँकि वो अटल बिहारी वाजपेयी थे, और उस दौर में सरसंघचालक कोई क़द्दावर नेता नहीं बल्कि कुप्पहल्लि सीताराम सुदर्शन थे जिन्हें उनके कार्यकाल में ही हटा दिया गया था.

पर जसवंत सिंह हों या मुरली मनोहर जोशी या लालकृष्ण आडवाणी हों- इनमें वाजपेयी जैसा बूता नहीं है जो राजनीतिक परिदृश्य के हर रंग में अपने प्रशंसक पा सके.

इस समय आरएसएस के विचार और कार्यक्रम को कमर कसकर और पूरे उग्र भाव से लागू करने वाला अगर कोई नेता है, तो वो हैं नरेंद्र दामोदर मोदी.

इसलिए मोदी की राह में रोड़ा बनने वाले हर बाहरी या भीतरी तत्व को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बर्फ़ में लगाने में संकोच नहीं करेगा- जैसा कि मुरली मनोहर जोशी और आडवाणी को किया.

किसकी बीजेपी?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

बाड़मेर से जसवंत सिंह को टिकट न दिए जाने के एक से अधिक कारण हो सकते हैं. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को स्वीकार कर चुके पार्टी के नेता मानते हैं कि यह चुनाव लड़ने के लिए या अपना कोई तर्क सिद्ध करने के लिए नहीं बल्कि जीतने और केंद्र में सरकार बनाने के लिए लड़ा जा रहा है.

ऐसे में जीतने की संभावना वाले उम्मीदवारों को ही टिकट दिया जा रहा है और इसके कारण बड़े-बड़े महारथियों को रथ से या तो उतार दिया जा रहा है या फिर उन्हें समरक्षेत्र के अँधेरे कोनों में जाने को कह दिया गया है.

बाड़मेर में जिन सोनाराम को टिकट दिया गया है वह 1996, 1998 और 1999 में काँग्रेस से चुनाव जीत चुके हैं. सिर्फ़ 2004 के चुनावों में जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह ने यहाँ से लोकसभा चुनाव जीता. पिछले चुनावों में भी काँग्रेस प्रत्याशी ही बाड़मेर से जीते.

ये सभी जानते हैं कि जसवंत सिंह ने संघ की शाखाओं में राजनीतिक दीक्षा नहीं ली. पर बीजेपी में सुषमा स्वराज जैसे कई नेता हैं जो आरएसएस की परिधि से बाहर से राजनीति में आए और अब महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं.

आलोचना करने की हिम्मत

इनमें से कितने नेता हैं जो आरएसएस में “पूजनीय” समझे जाने वाले अधिकारियों की खुलेआम आलोचना करने की हिम्मत कर सकें? अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में था तो आरएसएस अरुण जेटली जैसे नेताओं से बहुत ख़ुश नहीं था. पर जेटली हमेशा संघ पर टिप्पणी करने से बचते रहे.

पर जसवंत सिंह ने न तो संघ के पुरोधाओं की परवाह की और न ही अब ये कहने में संकोच किया कि “राजनाथ सिंह और वसुंधरा राजे सिंधिया ने मेरे साथ ग़द्दारी की, मुझे धोखा दिया.”

साथ ही बाड़मेर में जसवंत सिंह के समर्थकों ने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की तस्वीरों वाले पोस्टर लगा दिए हैं– यानी संदेश सीधा है कि जिस भारतीय जनता पार्टी में जसवंत सिंह हैं उसके नेता नरेंद्र मोदी नहीं हैं.

जसवंत सिंह एक और संदेश दे रहे हैं कि नरेंद्र मोदी उस भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं जिसमें लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी या जसवंत सिंह जैसे क़द्दावरों की नहीं बल्कि आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने का आरोप झेल रहे (गुजरात के पूर्व गृहमंत्री और नरेंद्र मोदी के दाहिने हाथ) अमित शाह की चलती है.

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