दिहाड़ी पर लाशों की चीरफाड़

  • 23 मार्च 2014
शव विच्छेदर गृह

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के ज़िला अस्पताल में काम करने वाले राजेश कैवर्त को हमेशा किसी मुर्दे का इंतज़ार रहता है.

उन्हें लगता है कि जब तक वे किसी शव का पोस्टमॉर्टम न करें, उनका दिन अधूरा रहता है.

शव परीक्षागृह के एक कमरे में टीवी रिमोट में उलझे राजेश तक जब मैं पहुंचा तो उन्होंने सीधे पूछा, "किसकी लाश है?"

राजेश छत्तीसगढ़ के उन सैकड़ों लोगों में हैं, जो पोस्टमॉर्टम करते हैं. कहने को तो पोस्टमॉर्टम का काम किसी डॉक्टर का होता है.

मगर हक़ीक़त यह है किसी संदिग्ध मौत के बाद लाश की चीरफाड़ और उसके एक-एक अंग की शुरुआती पड़ताल राजेश जैसे लोग ही करते हैं. डॉक्टर पोस्टमॉर्टम के वक़्त निर्देश देते जाते हैं और उनके सहायक के तौर पर काम करने वाले ये दैनिक वेतनभोगी शरीर के अलग-अलग हिस्से की चीर-फाड़ करते हैं.

(मजदूरों का अस्पताल)

राजेश अपने गले की तरफ़ इशारा करते हुए बताते हैं, "जैसे ऑपरेशन होता है न, हम लोग भी वैसा ही करते हैं. ऑपरेशन में वो लोग थोड़ा सा फाड़ते हैं, हम लोग पूरा फाड़ देते हैं. ट्रैकिया से लेकर नाभी तक फाड़ते हैं. महिलाओं को नाभी से नीचे तक फाड़ते हैं क्योंकि उसमें यूटरस देखना पड़ता है कि महिला गर्भवती तो नहीं है."

'हाथ कांप रहा था'

राजेश कैवर्त

27 साल के राजेश पिछले छह साल से पोस्टमॉर्टम का काम कर रहे हैं और इन छह सालों में उन्होंने लगभग छह-सात हज़ार शवों का पोस्टमॉर्टम किया है. छोटे बच्चों से लेकर वृद्ध तक. सड़क दुर्घटना में होने वाली मौत से लेकर पानी में पड़े-पड़े सड़ गई लाशों का भी. कभी-कभी किसी भ्रूण का भी परीक्षण उन्हें करना पड़ता है.

(स्वास्थ्य सेवा मुफ्त नहीं)

लेकिन पोस्टमॉर्टम के बाद वे सब बातें भूल जाते हैं. अब तक उनके जीवन में एक बार ऐसा अवसर आया था, जब उन्हें अस्पताल में ही काम करने वाले अपने एक साथी का पोस्टमॉर्टम करने की नौबत आई.

वे कहते हैं, "मैंने मना कर दिया. हम दोनों एक साथ उठने-बैठने, खाने-पीने वाले थे. इसलिए अच्छा नहीं लगा. फिर हमारे दूसरे साथी ने उसका पोस्टमॉर्टम किया."

राजेश ने कुछ दिन छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान में चार-पांच दिन पोस्टमॉर्टम होते देखा और फिर वे एक दिन पोस्टमॉर्टम के लिए तैयार हो गए. जीवन में पहली बार जब उन्होंने एक लाश को अपने चाकूनुमा ब्लेड से चीरा तो पल भर के लिए उनके हाथ कांप गए.

राजेश कहते हैं, "जब मैं पहली बार बॉडी को चीरना चालू ही किया था, तो थोड़ा सा हाथ मेरा हिल गया था बस. हाथ कांप रहा था. उसके बाद कभी आभास ही नहीं हुआ. कभी डर भी नहीं लगा."

'पापा डॉक्टर हैं'

सूरज पारचे

उनके घर वाले हालांकि उन्हें यह काम छोड़ने को कहते हैं लेकिन उनका कहना है कि मेरे पास एक रोज़गार है और अब तो यह काम भी उन्हें अच्छा लगने लगा है.

उनके दोस्त भी उनसे मिलते-जुलते हैं और साथ में खाना-पीना भी होता है. अब तक उन्हें इस पेशे के कारण किसी किस्म की सामाजिक या सांस्कृतिक छुआछूत का शिकार नहीं होना पड़ा है.

(मेडिकल जाँच तक नहीं...)

हालांकि बिलासपुर के ही अस्पताल में पोस्टमॉर्टम करने वाले सूरज पारचे के ख़ास दोस्त उन्हें पोस्टमॉर्टम करने के कारण कभी-कभार चिढ़ाते हैं पर अधिकांश लोग उनके काम को महत्व देते हैं. उनका बेटा ज़रूर कहता है कि उसके पापा डॉक्टर हैं.

दसवीं पास सूरज ने दो साल पहले जब पोस्टमॉर्टम करना शुरू किया, तो उनकी पत्नी हर रोज़ घर लौटने पर पूछती थीं कि आज तबीयत कैसी लग रही है, मन कैसा लग रहा है.

सूरज को अपना काम करते कभी डर नहीं लगता. सूरज हंसते हुए कहते हैं, "अस्पताल में काम करते हुए डेड बॉडी तो देखता ही था. समझ लीजिए कि मेरा प्रमोशन हो गया और मैंने पोस्टमॉर्टम करना शुरू कर दिया."

सबसे पहले उन्होंने एक बुज़ुर्ग की लावारिस लाश का पोस्टमार्टम किया था. पहले दिन तो हिचकिचाहट हुई लेकिन फिर सूरज को इसकी आदत पड़ गई.

सूरज अपने काम से संतुष्ट हैं और इसे हिम्मत वाला काम भी बताते हैं. लेकिन 30 साल के सूरज लगभग सात सौ-आठ सौ शवों का पोस्टमॉर्टम करने के बाद भी आज तक किसी बच्चे का पोस्टमॉर्टम करने की हिम्मत नहीं जुटा सके हैं.

साले का पोस्टमॉर्टम

मृत शरीर (फाइल फोटो)

जब भी किसी बच्चे के पोस्टमॉर्टम का मामला सामने आता है तो वे अपने सहयोगी को आगे कर देते हैं.

वे कहते हैं, "मुझे बच्चों से बहुत प्यार है." किसी भी संदिग्ध मौत में पोस्टमॉर्टम को ज़रूरी बताने वाले सूरज को आत्महत्या करने वालों का पोस्टमॉर्टम करने में बहुत दुख होता है.

(देर से बच्चा पैदा करो और इनाम पाओ)

वे कहते हैं, "बहुत दुख होता है कि जिनको ज़िंदगी मिली, उन्होंने उसकी क़द्र नहीं की और कई लोग ऐसे हैं, जो बीमारी से जूझ रहे हैं, उनके पास ज़िंदगी नहीं है, मगर वे जीना चाहते हैं."

सूरज के सामने एक मौक़ा ऐसा भी आया, जब उन्हें अपनी पत्नी के छोटे भाई का पोस्टमॉर्टम करना पड़ा था.

रेल दुर्घटना में मौत के बाद जब पोस्टमॉर्टम करना पड़ा तो उन्होंने बिना वक़्त गंवाए अच्छे से पोस्टमॉर्टम के काम को अंजाम दिया. सूरज इस घटना को कभी भूल नहीं पाते. वे कहते हैं, "जब भी रजिस्टर खुलता है, मुझे अपने साले की याद आ जाती है."

'पुण्य का काम'

डिजिटल शवपरीक्षण (फाइल फोटो)
दुनिया के कुछ देशों में बिना किसी चीर फाड़ के भी शव परीक्षण का काम आधुनिक तकनीक से किया जाता है.

सूरज विस्तार से पोस्टमॉर्टम के काम में आने वाले औज़ारों का विवरण देते हैं, "24 नंबर ब्लेड लगता है, ब्लेड स्टैंड लगता है, चाकू लगता है, सुई-सूजा लगता है, बॉडी सिलने के लिए. स्टीच के लिए नायलॉन का धागा लगता है और एडहेसिव टेप से पैक-वैक करने के बाद बढ़िया से बैक करके बॉडी दे देते हैं."

शराब न पीने वाले सूरज का दावा है कि पुरानी पीढ़ी के लोग शराब पिए बिना किसी शव को पोस्टमॉर्टम के लिए हाथ नहीं लगाते थे. अब पढ़े-लिखे लोग इस पेशे में हैं और शराब पीकर शव का पोस्टमॉर्टम करने के दिन लद गए.

उन्होंने कभी यह काम छोड़ने के बारे में नहीं सोचा. उन्हें यह 'पुण्य का काम' लगता है. लेकिन वे चाहते हैं कि सरकार उन्हें नियमित कर्मचारी के बतौर अस्पताल में नियुक्त करे.

छत्तीसगढ़ के अधिकांश अस्पताल में पोस्टमॉर्टम का काम करने वाले दैनिक वेतनभोगी ही हैं और उन्हें बतौर मानदेय तीन हज़ार रुपए महीना मिलता है.

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