सुकमा के लिए सड़क कभी सीधी नहीं जाती

  • 14 मार्च 2014
बाइक सवार एसपीओ

सड़क कहीं से भी सुकमा की तरफ जाती हो, उस पर सफ़र हमेशा जोखिम भरा ही है. चाहे वो आंध्र प्रदेश के खम्मम ज़िले से कोंटा होते हुए सुकमा आती हो या बस्तर संभाग के मुख्यालय जगदलपुर से. या फिर दंतेवाड़ा से होते हुए सुकमा जाती हो.

सुकमा के लिए गाड़ी मुड़ी नहीं कि चेहरों पर तनाव साफ़ झलकने लगता है.

यहां रहने वाले लोगों ने इन सबके बीच ही जीना सीख लिया है. बस थोड़ा रास्ता बदलकर चलने की आदत डालनी पड़ती है.

11 मार्च को जब झीरम घाटी में माओवादियों ने सुरक्षा बलों पर हमला कर के 15 जवानों को मार गिराया तो लोग जगदलपुर से सुकमा ना जाकर, दंतेवाड़ा से होते हुए सुकमा जाने लगे. सब को पता था कि जगदलपुर से सुकमा को जोड़ने वाले इस 90 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग पर अगले कई दिनों तक सन्नाटा रहने वाला है.

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लंबा सफ़र

घटना के बाद सिर्फ़ और सिर्फ़ पुलिस के अधिकारियों और मीडिया वालों की गाड़ियां ही इस सड़क पर चल रही हैं. आम लोगों के लिए जगदलपुर से सुकमा का सफ़र थोड़ा लंबा हो गया है.

अब उन्हें पहले 80 किलोमीटर तक दंतेवाड़ा का सफ़र तय करना पड़ रहा है और फिर दंतेवाड़ा से 100 किलोमीटर और तय करने पड़ रहे हैं.

चाहे वो सवारी ढोने वाले वाहन हों या फिर माल ढोने वाले. अब इस घटना को तीन दिन बीत चुके हैं.

सलमान रावी

(ख़ूनी सड़क और माओवादियों का ख़ौफ़)

केशलूर मोड़ पर कुछ एक ढाबों पर भी रौनक ख़त्म हो गयी है. यही वो जगह है जहां से सुकमा के लिए मुड़ा जाता है.

कई किलोमीटर तक हमें लगा कि सिर्फ़ हम ही हैं जो इस सड़क पर जाने की ज़ुर्रत कर रहे हैं. फिर दरभा थाने के कुछ पहले एक एम्बुलेंस को आते देखा तो लगा ज़िंदगी चल रही है. मगर तोंगपाल तक का आगे का सफ़र तन्हा कटने वाला था.

'वानर सेना'

तभी हम वहां पहुंचे जहां सड़क के निर्माण में लगे वाहनों को माओवादियों ने सुरक्षा बलों के जवानों की हत्या करने के बाद आग के हवाले किया था.

कई दिनों बाद भी वाहनों से निकलता धुआं गवाही दे रहा था कि आग कितनी भयानक रही होगी.

सड़क पर दूर-दूर तक किसी का साया नहीं था. अलबत्ता कुछ बंदर नज़र आये जिन्होंने भी दूरी बनाए रखना ही बेहतर समझा हो जैसे. वैसे अमूमन जब ये बंदर सड़क के किनारे बड़ी तादाद में नज़र आया करते थे तो ऐसा लगता था कि जैसे कोई 'वानर सेना' वहां तैनात हो. मगर आज उनमे भी ख़ौफ़ साफ़ झलक रहा था.

(ये सड़क सुकमा तक जाती है...)

सड़क के आस-पास के टूटे पेड़, किनारों में बारूदी सुरंगों को बिछाने के लिए खोदे गए गड्ढे और जली हुई गाड़ियों की राख गवाही दे रहे थे उस दिन की जब इस इलाक़े में मौत का खेल खेला गया था.

मगर ये खेल भी इस सड़क के लिए कुछ नया नहीं है. पिछले पांच सालों में इस सड़क पर कई धमाके हुए और कई लाशें बिछीं. पिछले साल कांग्रेस के नेताओं के काफ़िले पर हुए हमले का स्थान इस जगह से सिर्फ एक किलोमीटर की दूरी पर है. उस हमले में भी 31 लोग मारे गए थे.

ख़ौफ़

माओवादी हमला

इस वीरानी की ख़ामोशी को दूर से आती एक मोटरसाइकल की आवाज़ चीरती हुई चली आ रही थी. ये एक नौजवान था जो शाम ढलने से पहले अपने घर सुकमा लौटना चाह रहा था.

पहले दूर से हमें खड़ा देखकर वो सहम सा गया. मगर उसे लगा कि हम ख़बर वाले हैं. हिम्मत जुटाकर वो हमारे पास से गुज़रने लगा तो मैंने उसे टोक कर पूछा कि क्या उसे इस लंबी सड़क पर तन्हा सफ़र करते हुए डर नहीं लग रहा है?

वो नौजवान बोला, "डर तो लग रहा है लेकिन क्या करूं? दंतेवाड़ा से होते हुए जाता तो 190 किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता. अभी तो सिर्फ 90 किलोमीटर ही है. शाम भी ढल रही है. मेरे घर वाले मेरा इंतज़ार कर रहे हैं."

नौजवान ने बताया कि इस पूरे सफ़र में एक एंबुलेंस के सिवा उसने दूसरी गाड़ी सिर्फ़ हमारी देखी है.

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